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​”खत लिख दे सांवरिया के नाम……”                

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​”खत लिख दे सांवरिया के नाम……”                

Priti Surana July 1, 2017
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​”खत लिख दे सांवरिया के नाम……”
                      आज रात सोई तो रही परन्तु किसी को नींद में गुगुनाने का आभास हुआ. प्रातः जब नींद खुली तो भगवान् का ध्यान करने की जगह फिर वही गाने की धुन अंतस में बजने लगी और जी कर रहा था पूजा अर्चना की बजाय उस गीत को  गुनगुनाऊँ _ खत लिख दे…
इस मोबाइल और नेट के जमाने में कौन किसको अब खत लिखता है….परन्तु यह भी सच था कि मैं हमेशा आप से जिद्द करते रहती थी, झूठ ही सही, मुझे आप पत्र लिखें. ताकि, मैं भी उन लम्हों को सोचूँ कि कैसे कोई पति अपने पत्नी को पत्र में क्या -क्या लिखते हैं, पर मेरी इन बातों को सुन आप मुस्कुरा जाते और टाल जाते.परन्तु सच्चाई तो यही कि आपके भी मन के कोने में  मेरी ही तरह ऐसे ख़याल आते होंगे और आस भी रही होगी ,लेकिन आपको तो जाहिर करना कभी आया ही नहीं.आज जब आप मेरे पास नहीं ,तो चलो, मैं आपकेे इस चाह को पूरा कर देती हूँ.
             बचपन में भाई -बहनों के संग रह यह पता ही नहीं लग़ा ‘लगाव ‘ या ‘जुड़ाव’ सही मायनों में होता क्या है . हमेशा ही हमने पूरा परिवार तबतक जीवन संग ही बिताया था और एक दिन ऐसा आया की बाबूजी का तबादला दिल्ली हो गया. हम भाई-बहनें पढ़ाई के उस मोड़ पर थे जहां बाबूजी का हमसे अलग रहना तय हो गया.बाबूजी घर के मुखिया थे और माँ सलज्ज भारतीय स्त्री ,जिन्होंने हमारे समक्ष अपनी भावनाओं से खुद को कमजोर प्रतीत होने नहीं दिया.
               बाबूजी की अनुपस्थिति खलती थी,तब भी भावनाओं को परिभाषित नहीं कर पाई. बाबूजी 4-6 महीने पर आया करते  और जब सामने होते तो मैं समझ नहीं पाती कि क्यों दो तीन दिन लग जाते मुझे अपने अश्रु धारा के प्रवाह को उनके समक्ष रोक पाने में.और तब भी मैं इस बात को समझ नहीं पाई कि आखिर मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा जबकि बाकि सभी सदस्य भावावेग से प्रभावित नहीं होते. माँ को कभी हमने आज के परिप्रेक्ष्य में पति-पत्नी के रिश्ते में देखा नहीं और कभी यह सोच नहीं पाए कि उनकी भी ऐसी कोई निजी जिंदगी  हो सकती. बाबूजी और बच्चों के वार्तालाप ,रोज की घटित सभी सदस्यों की बातें माँ के सामने पूरा जाहिर कर देना और उस पर माँ का वकीलों वाली प्रतिक्रिया.हालांकि प्रतिक्रियाएं जरुरी नहीं थी की हमें पसंद आये ही. फिर भी पता नहीं हममें से कोई भी अपनी बात घर से छुपा नहीं पाता. हर किसीकी कमी-बेसी सबों को पता  थी.शायद माँ बाबूजी ने हमारे जीने का तरीका यही तय किया था.
                आज जब इतने सालों बाद फिर से उसी मुकाम पर खड़ी हूँ  जहाँ आज एक पत्नी हूँ, माँ हूँ और अनेकों सामाजिक दायित्वों से बंधी हूँ. सात समंदर पार की बातें बचपन में बहुत आकर्षित करतीं थीं और काश….. को सोचती रहती.शायद आपकी सोच भी मुझ से मेल खाती हो, फिर ऐसा क्या हुआ कि तय तारीख के करीब आने से आप भी  अनजान बातों से घिरे थे और जाने के दिन शायद थोड़े बुझे-बुझे भी लग रहे थे.और इन सब के बीच मैं खुद को माहौल में संतुलन बनाये रखने की कोशिश कर रही थी. आज जब आप मेरे साथ नहीं और यह भी जानती हूँ की यह दूरी चंद  दिनों की है और इन सब के बीच मैं  ‘लगाव’, ‘जुड़ाव’और  माँ का वो मौन अहसास सभी समझ पा रही हूँ. आपके उस श्यामवर्णी चेहरे की रंगत को भी पढ़ सकती हूँ और यह भी कि आज आपका सात समंदर पार मुझ से दूर रहना क्यों नहीं भा रहा.परन्तु यह भी जानती हूँ की आप मुझ से ही जुड़े हुए नहीं ,बल्कि अपने माँ-बाबूजी के सपनों के किरदार भी हैं, साथ ही कुछ सामाजिक व्यवस्थाएं जिन से हो कर गुज़रना पड़ता है.
          और इन सब के बीच संतान , जो हमारे जीवन की धुरी होती है और चेहरे की मुस्कराहट भी.ऐसी परिस्थितयो में मेरा अपने बच्चे के साथ रहना मेरे लिए आप में एक सुरक्षा का आभास दे जाती है, उसकी बातें आपको बता -बता मैं आपके चेहरे की मुस्कराहट पढ़ने की कोशिश करते रहती हूँ. इन सब के बीच हैरान होते रहती हूँ कि प्रकृति का यह कैसा नियम और समाज का यह कैसा ताना-बाना कि परिस्थितियां चाहे जैसे भी हो चिर निरंतर चलते रहती है , शाश्वत है.
               चलो अब मेरे लिये सुबह के रोजगार का समय हो चुका है और अब आप भी अपने अस्थाई घोंसले का रुख कर चुके होंगे, सोने की तैयारियां भी हो रही होगी .शुभ रात्रि ,भगवान आपके साथ और हमारी दुआएं भी.
अपर्णा झा
(स्वररचित)

2 Comments

  1. Priti Surana July 1, 2017

    सुंदर रचना

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

    Reply

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