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वरदान

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वरदान

Priti Surana July 3, 2017
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क्या है ये???
ये भीगी आँखों में
मुस्कान दे रहा है…
सुप्त हुए ज़ज्बातों को
उड़ान दे रहा है….
प्रफुल्लित है हृदय
और *वजह* भी नही कोई …
ये क्या है जो क्षितिज से परे
आवाज दे रहा है ।

क्या है ये ???
ये सागर की लहरों को
उनवान दे रहा है …
ये पौ फटते वक्त सी
अज़ान दे रहा है…
जैसे आस पास बिखरी हो
निर्मल धूप सी कोई …
ये क्या है जो खंडर को
नव-निर्माण दे रहा है।

क्या है ये ???
ये अधीर हृदय को मेरे
मुरली तान दे रहा है ….
निष्प्राण हुई मछली में
फिर प्राण दे रहा है …
जैसे दूर घाटियों में
गुंजती हो घंटियाँ….
सब त्याग दो दुविधाएँ
आह्वान दे रहा है।

क्या है ये ???
ये थरथराती प्रत्यंचा को
कमान दे रहा है …
भटके हुए पथिक को राह
आसान दे रहा है …
जैसे आ रहें हो झुंड
बादलों के झूम के…
सूखे सहरा में बारिश का
सामान दे रहा है ।

क्या है ये ???
क्या आलौकिक प्रकाश पुंज
प्रभु वरदान है ये ???
जो खुद में खुद को पहचानने का
आह्वान दे रहा है
मेरी हर भटकती भावना को
शब्द-ज्ञान दे रहा है ..
हाँ ये आलौकिक प्रकाश पुंज
प्रभु वरदान दे रहा है ।

डाॅ सुषमा गुप्ता

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3 Comments

  1. व्व्व्वाह सुषमा जी व्व्व्व्वाह…लाजवाब सृजन…बधाई

    Reply
  2. Shirin Bhavsar July 6, 2017

    Wahh…badhiya rachna ji…shabd chayan

    Reply
  3. क्या बात है मैडम! गजब की अभिव्यक्ति है।शब्दों का चयन भी कमाल का है।

    Reply

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