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वजह

Uncategorized कविता

वजह

Priti Surana July 4, 2017
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लगा कब का सावन,बरसे न बदरा
काटे सब कानन, वजह ढूंढते है।

उलझे रहे उलझनो में ही अपनी
क्यूँ अपने हुये कम, वजह ढूंढते हैं।

खत्म की बेटी, कोख में कितनी
वधू क्यूँ न मिलती, वजह ढूंढते हैं।

वृद्ध आश्रम मे रोते है,बाप महतारी
क्यूँ रूठा विधाता, वजह ढूंढते है।

चलो मुस्कुरा दो यूँ ही बेवजह तुम
वो बैठे फ़िर दिन भर वजह ढूंढते है।
कीर्ति प्रदीपवर्मा@

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