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धरती

Priti Surana 1 year ago
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एक तरफ हम है कहते
“धरती है मेरी माता ”
दूजे पल हम उससे ही आँख चुराते ।
आखिर हम करना क्या है?
चाहते, यह स्वयं नही है जानते।
ऐ धरती, गगन, सितारे
जीवन के आधार हमारे ।
एक दिन जीवन नही है
बिना इनके सहारे।
ऊसर जमीन पर बीज छिटकर
चाहे कितना भी छिट ले पानी।
वो भी अपनी जिद पर अड़ी हुई
करती है कभी-कभार मनमानी ।
भूमि की कीमत को लेकर कभी-कभी
हो जाता है कुछ लफड़ा।
देखते-देखते हो जाता है
भाई -भाई के बीच मे झगड़ा ।
इस जमीन को लेकर चलना
सब संकट सह कर बचाना।
बचपन से लेकर सुना सभी ने
जर , जोरू और जमीन की लड़ाई ।
बड़े -बड़ो की लुटिया डुबायी।
जान -माल की होती रही हानि
मगर दबंगो की छुटी नही मनमानी ।
भूमि है आदर के योग्य
जो करता है इसका अनादर,
उसका फल वो पाता है ।
दाना-पानी के लिए सभी होते
मोहताज ,लगाऐ रहते है आस।
भूमि की कीमत भी भूमिहीन
जानता है।
तन से पसीना बहाकर वो
सूरज की गर्मी सहकर ,
अन्न को तपकर उपजाता है।
मौन-मुक कोलाहल से दूर
अनजान डगर पर भूमि हीन
भूखे पेट बीच सड़क छटपटाताहै ।
माँ! जब कहते हो तो ,
उस की पीड़ा समझोगे ।
अपने इरादे बदल कर तुम
इस जमीन से नही भाग पाओगे।
सयाने के मुख सुन भूमि का मान बढा ।

पूनम आनंद

 

 

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