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Uncategorized ग़ज़ल

तराने

Priti Surana 1 year ago
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जिन शब्दों से परिचय उनके अर्थ नहीं जाने।
नए वर्णों के सम्मेलन में सब अपने हुए बेगाने।।

बेमौसम आई पवन पर लिख डाले हमने छंद ।
अपनी सगी हवाओं पर दिल से मारे ताने।।

जिस टहनी पर विकसे महके फूल बने हम।
उस टहनी पर अमरबेल के लगते जयकारे।।

हरियाली को रौंद किया धरती का दामन तार ।
साँसें विधवा सी हुईं, विधुर हुए सपने शहजादे।

आदेशों निर्देशों पर नपती प्रगति की तरुणाई ।
सच्चाई के आगे रोते सिर नीचा किए बहाने ।।

‘शून्य’ स्वार्थ ने घुन डाले निजता के अनुबंध।
सूखी नदियाँ गाती हैं बह गए पानी के तराने।
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प्रदीप सोनी ‘शून्य

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