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भूमि

Priti Surana 1 year ago
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कविता—

मन जो””भूमि””से बंजर हो गये हैं,
उनको फिर से सिंचित कर दें।
नये प्रयासों से फिर उनको,
हरा भरा होने का संबल दें।
जज्बातों के नये बीजों को,
फिर से उनमें रोपण कर दें।
मन——

उनके उदास सोये मन को,
हम नये खाद से अंकुरण दें।
प्रेम ज्ञान से अभिमंत्रित कर,
जीने के नये संस्मरण दें।
मन——

खुशियों की बालियां लहकें मन भूमि पर
उनको हम नई तरंगें दें।
कर्म ज्ञान की ज्योति जलाकर,
उनको हम नई तरंगें दें।
मन——

कौन आये आगे इस डर से,
कदम न अपने रुकने दें।
कदम से कदम मिलेंगे एक दिन,
कुछ तो हम सब नेकी कर लें।
मन——

किरण मोर कटनी

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