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Uncategorized कविता

सागर के मोती

Priti Surana 1 year ago
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सुनो!!
मैं गई थी
सागर के किनारे
दोहरा आई जिंदगी के
अनेक यादगार पल,..
मिलती है बहुत हिम्मत
सागर की आती जाती
लहरों को देखकर,..
होता है भान
सुख-दुख की
नश्वरता का भी,..

क्या हुआ
जो समंदर बहता नही,
पर लहरें बार बार
सिखाती है
समझाती है
जिससे
दिल और दिमाग की
समझ भी पुख्ता होती है
कि
समय गतिशील रहता है
रुकता नही,..

और हाँ!
किनारे की रेत
हथेलियों में उठाकर
छोड़ दिया वापस
उसमें से
छोटी छोटी मछलियों को
जी लेने के लिए जी भर
और
चुन लाई कुछ सुनहरे से मोती
छुपाकर अपनी मुट्ठी में
ताकि किसी की नज़र न लगे,..

सच
लोगों ने देखे
सिर्फ मेरे गीले पैर
और पैरों में लगी रेत
क्योंकि लोगों को
नही था अंदाज़ा
मेरे भीतर के हंस के
नीर-क्षीर के विवेक का
कि
चुन सकूँगी हंस की तरह
मोती जिंदगी के सागर से,…

प्रीति सुराना

 

13 Comments

  1. Pinky Paruthy Anamika July 6, 2017

    Wondeful combination of words , u r a masterpiece

    Reply
  2. बेहतरीन रचना प्रीति जी

    Reply
  3. बढ़िया..

    Reply
  4. UMESH KUMAR GUPTA July 6, 2017

    अच्छी रचना

    Reply
  5. सुंदर रचना…

    Reply
  6. Kishor srivastava July 6, 2017

    बहुत सुन्दर। बधाई।।।

    Reply
  7. Neerja Mehta July 6, 2017

    बहुत ही सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रीति जी

    Reply
  8. Shirin Bhavsar July 6, 2017

    Wahhh…..behad sundar rachna priti ji….nirashao ko prawahit kar aashaye chun lene ki prerna deti rachna …..bdhai☺️

    Reply
  9. बहुत खूब

    Reply
  10. लाजबाव रचना

    Reply
  11. Neelam Sharma April 29, 2018

    बहुत सुंदर

    Reply
  12. सार्थक रचना प्रीति जी

    Reply

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