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हमारा हिस्सा

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हमारा हिस्सा

Priti Surana July 7, 2017
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रामपुर का रामू घर के सामने खड़ा होकर उनका बड़े ही बेसब्री से इन्तजार कर रहा था। उनका सेवा भगत करने के लिए कभी वह घर मे जाता था कि उनके खाने पीने रहने और बैठने की व्यवस्था देखने के लिए तो कभी बाहर आकर उनका बाट जोहता।

तभी रामू के पिता मनोहर लाल उसे कुछ दूरी पर दिखाई पड़े ।रामू खुशी से झूम उठा, वो क्या है कि आज उसके छोटे भाई श्यामू को देखने यानि शादी के लिए वरदेखुवा उसके घर आने वाले थे।
रामू की बहुरिया रीमा भी घर आँगन को सजाने – धजाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती थी क्योंकि उसके लक्ष्मण जैसे देवर की पत्नी यानि देवरानी उसे जो मिलने वाली थी और उसके साथ घर में हाथ बंटाने वाली आने वाली थी।

रीमा अपने देवर श्यामू को साबुन से नहलाने के बाद उसके बालों मे शैम्पू लगाकर उसे खूब अच्छी तरह से नहला धुला रही थी,मानो अपने मन की मैल छुड़ा रही हो। क्योंकि बहुत दिनों के बाद श्यामू को देखने फिर कोई वरदेखुवा जो आ रहा था। वह चाहती थी कि श्यामू इतना सुन्दर दिखे कि देखने वाले देखते ही रह जाँय और उसे इसबार जरूर पसंद कर लें।

रामू की नजर अचानक पिताजी के पीछे पड़ी तो उसने देखा कि उनके पीछे-पीछे दो सज्जन और आ रहे हैं।रामू के मन मे मानों लड्डू फूट पड़ा । दरअसल रामू के पिताजी उन्हें लाने के लिए गये हुए थे।

रामू दौड़ पडा। सबका पाँव छूकर उसने उन दोनों सज्जनों का नमस्कार किया। फिर घर के अन्दर ले जाकर तख्ते पर साफ बिछाये हुए चादर पर बैठा दिया । सबको मीठा पानी देकर सबका हाल चाल पूछ ही रहा था कि श्यामू भी दूल्हे की तरह सज धज कर आया और सबका पाँव छूकर बगल में बडे शालीनता के साथ खड़ा हो गया ।

दोनों सज्जनों में एक शायद जो कन्या के पिताजी ही थे श्यामू से पूछ बैठे कि – “तोहार का नाम हव बाबू ?”

“श्यामू “- श्यामू बडे शालीनता से बोला।
“बड़ा अच्छा नाम बा बाबू “-
लड़की के पिताजी ने कहा।

” केतना पढ़ले- वढ़ले बाटा बाबू तुँ ”
-कन्या के पिताजी के साथ आये दूसरे मेहमान ने पूछा ।

“कक्षा दस बस” –
श्यामू ने कहा।
“ठीक बा बाबू अब तुँ जा मे घर में जा सकेला “- कन्या के पिताजी ने कहा।

दोनों मेहमानों का सेवा सुश्रुषा रामू ने इस प्रकार किया कि जैसे उसके पर्ण कुटिया मे मानों भगवान राम खुद पधारें हों। रामू बडा होने के कारण घर की सारी जिम्मेदारी सम्भाल लिया था। उसके पिताजी अब वृद्धावस्था लाँघ चुके थे थोड़ा ऊँचा सुनते थे,सो उनकी हालत गुजराती ताला सी थी।

कन्या के पिताजी विदाई के समय जाते जाते कहा कि – “लड़िका हमके बहुत पसन्न बा”
श्यामू की शादी बडे धूमधाम से सम्पन्न हुई। श्यामू जब अपनी नई नवेली दुल्हन को लेकर गृह प्रवेश कर रहा था तभी श्यामू की भाभी दोनों को टोकते हुए कही कि -“पहिले हमें आरतिया त उतार लेवे द तब घर में हलिहा”
आरती उतारने के बाद उन दोनों को धीरे-धीरे घर में ले गई ।जैसे कोई नई गाडी को घर मे सम्भाल कर ले जाता है।
समय के साथ खुशी-खुशी के दिन व्यतीत होने लगे। रामू और उसकी पत्नी रीमा अब खेत खलिहान ही देखते थे क्योंकि अब खाना -दाना बनाने का झंझट खत्म हो गया था।

रामू के पिताजी खा-पीकर मवेशियों को जंगल में चराने चले जाते थे।
शादी का लड्डू कुछ ही दिन मीठा लगता है उसके बाद उसमें तीखापन आना शुरू हो जाता है ठीक उसी प्रकार श्यामू अब अकेले घर में रहते अब ऊँफने लगा था,सो उसने भी गाँव के नजदीक एक शहर में एक कपड़े की दुकान पर साढे तीन हजार प्रतिमाह पर काम करने लगा था।

श्यामू जब शाम को घर आता तो उसकी पत्नी सीमा उससे बोल पडती कि-” आज हमरे लिए रऊवाँ का किनके लाईल हईं ?
“अरे !तोहरे लिए त हमार जान हाजिर बा। “श्यामू अपने पत्नी को खुश करने के लिए लहजे मे बडे प्रेम से कहा।
“देखींन हमार पायल बहुत पुरान हो गईल बा ओके नया बनवा दी न?” सीमा श्यामू से दुलराती हुई कही।
“अच्छा बाबा! कवनो बात क चिन्ता जनि करीं, हम अबकिर जब वेतन पाईब त तोहरे खातिर तोहफा में नया पायल जरूर ला देब समझलु, अब चला खाना लगावा ना ?

दिनोदिन सीमा की माँग इसी तरह बढती गई और धीरे-धीरे श्यामू उसके वश में होता चला गया।बात बात पर अब वह श्यामू को झझकारने भी लगी थी। श्यामू से झगडा करना तो अब उसके आदत में शुमार हो गई थी,श्यामू से थोडा ज्यादा पढने का नशा भी जो था।
कुछ दिन व्यतीत होने के बाद सीमा का हालचाल लेने के लिए सीमा के पिताजी उसके घर पहुँचे तो घर पर कोई नही था सिवाय सीमा के।
इसलिए उन्हें पानी दाना देने वाला भी घर मे कोई नही था।
पिताजी को मीठा पानी देने के लिए भी सीमा के घर में भूजा हुआ भाँग भी नही था।

कहते हैं कि गरीबी बडी ही खराब चीज होती है।कोई किसी की गरीबी को दिल से समझता है तो कोई किसी के गरीबी का गलत फायदा उठाने में अपने को शेर समझता है। और इसी का फायदा उठाकर सीमा ने अपने पिताजी से कहा कि -“रऊवाँ क भैया अऊर भाभी जी पता नाहीं खेतवा में का करलँ- धरलँ कि घर में आपके मीठा अऊर पानी देवेके खर- पतवार तक भी ना बा, बाबू जी।
हमें बडा शरम आगत बा! हमरे समझ मे कुछ भी ना आवत बा कि अब हम का करीं? ”
“हमरे समझ मे सब आवत बा बेटी” कन्या के पिता ने सीमा को उकसाते हुए कहा ।

“तोहरे का समझ में आवत बा बाबू जी,तनि हमहूँ के बतावा ना?हमहूँ जानी?”-सीमा अपने पिताजी से कौतुहलवश होकर पूछ पडी।
“इह कि ऊ दोनों परानी फसल क सारा पैसा बैंकवा में जमा करत होईहैं सन। त कहाँ से घरे दिहैं सन। अब समझलु बेटी” सीमा के पिताजी सीमा को ऊकसाते हुए कहा।

“हाँ बाबू जी,अब हम सब कुछ समझ गईनी”-सीमा ने बडे आत्म विश्वास के साथ अपने पिताजी से यह बात कही।

“समझले से अब काम ना चली। कबो श्यामू रामू से फसल क हिसाब किताब माँगलें कि नाहीं?”- सीमा के पिताजी ने सीमा के मन में आग लगाते हुए कहा।

“कबो नाहीं बाबू जी।रऊवाँ क भैया इनपर पता नाहीं कवन जादू टोना कई दिहलै बा न कि ओनके सामने ई हरदम सिर झुका के चललँ।”
सीमा ने कहा।

“तब त बहुत गडबड बा बेटी ! श्यामा के भलमनशाहत क फायदा ऊ दुनो खूब उठावत बाणे ” सीमा रूपी आग फिर खैर पतवार डालते हुए सीमा के पिता ने सीमा से कहा।

“ठीक बाद बाबू जी,अब लगत बा हमही के कुछ करे के पडी।” सीमा ने अपने पिताजी बडे आत्म विश्वास से कहा।

“अच्छा बेटी अब हमे अपने घरे जायेदा। तोहरे घरे क लोग आ जईहैं त सबकुछ गडबडा जाई। हमें इहां अईले क केहु के भनक न लगे पावे ।”
यह कहकर सीमा के पिताजी अपने घर चले गये।

शाम को जब श्यामू घर आया तो मानो सीमा कलियुग की कैकेयी बन चुकी थी। उसके मन में उसके पिताजी जो मंथरा का मंत्र भर गये थे।
उसके शरीर के सभी वस्त्र अस्त-व्यस्त थे।बाल बिखरे हुए थे।जैसे मैदानी नदिया घाटी मे गिरते वक्त शेर के पंजो की भाँति शिकार करने को व्याकुल हो उठती हैं।
श्यामू कुछ समझा नहीं।
वह सीमा के सिर पर स्नेह-हाथ फेरते हुए कहा कि-“तबीयत -वबीयत नाहीं ठीक बा का तोहार?”।

“तोहरे घर में भूजल भाँग भी नाहीं बा कि जेके खा के हम मरी पाईं? तोहार भैया ‘राम’ अऊर भाभी ‘सीता’ सब राजपाट त अकेले ही ले लिहलैं बाणन, हम सब एक- एक दाना क मोहताज हो गईल बाटीं ? ” सीमा फफक फफक कर रोते हुए कही। उसके आँखों से घडियाली आँसू की धारा बह रही थी।जैसे बरसात के समय झोपड़ी से पानी की बूँदे टपकती हैं।

“त तुम्हीं बतावा न हम का करीं ?हमरे समझ में कुछ नाहीं आवत बा, कि हम अब का करीं और धरीं ?”।श्यामू पागलों की भाँति बोल गया।

“त सुना? आज अऊर अबहीं अपने भोले भाले भैया से फसल क हिसाब किताब माँगा।अगर ऊ तनिको आना कानी करें त आपन खेत की हिस्सा लेकर ही रहिहा।हाँ।नाहीं त हम आज से न कुछ खाईब अऊर ना ही कुछ पीयब ? “।

कैकेयी अपना फैसला सुना चुकी थी।
*त्रिया का चरित्र जब राजा दशरथ नहीं समझ पाये तो* फिर श्यामू किस खेत का मूली था?होनी तो होकर ही रहती है।उसमे कहाँ किसी का वश चलता है?
शाम के समय जब रामू अपने एक काँधे पर हल और दूसरे काँधे पर कुदाल तथा जोठा मे जोठे दो बैलों को लेकर घर की ओर चला तो मन मे सोचने लगा कि श्यामू दौड़ते हुए हमारे पास आयेगा और हल अपने काँधे पर लेकर मेरे काँधे का भार हल्का कर देगा।
?
मगर आज क्यों नही आ रहा है,लगता है अभी उसकी दुकान बढी नही है?
मगर आज श्यामू भष्मासुर बन चुका था उसकी आँखों मे आज बडे भाई के लिए आँसू नहीं अंगारे भरी थीं ।
आज वह सब कुछ भष्म करने की भीष्म प्रतिज्ञा कर घर के चौखट पर बैठा था।
रामू घर पर पहुंचा तो देखा कि श्यामू का चेहरा लाल गुब्बारे की भांति फुला हुआ है।
उसने श्यामू से पूछा-“श्यामू आज तोहार तबीयत ठीक ना बा का?

“तबीयत त ठीक बा,बाकी कुछ भी ठीक ना बा !”
श्यामू पूरे रोब में बोल रहा था।

“हम कुछ समझलि ना,तुँ आज का कहत बाणा?
रामू बोला।

“आजु सब समझ जाबा भैया?पहिले फसल क पूरा हिसाब किताब द तब बाकी भी बता देब!
“फसल क कईसन हिसाब किताब? अरे! तोहे पललि पोसलीं,पढवलीं लिखवलीं; तोहार बियाह शादी कईलीं,पूरे परिवार के खियऊलीं-जियऊलीं,कपडा-लत्ता देहलीं नात-बात देखलीं,केतना बताईं हम तोहसें , तुँ खुद देखत रहला? अब हमसे काँहें पूछत बाणा भाई?”।
रामू रोते हुए कहा ।

“देखा भैया! हमसे ज्यादा नौटंकी जनि करा,कित त तुँ हमें पूरा-पूरा फसल क हिसाब देद ,नाहीं त खेत खलिहान घर दुआर सब मे हमार पूरा हिस्सा !”
श्यामू गरजते हुए कहा ।

“ठीक बा बाबू! तोहरे खुशी में ही हमार खुशी छिपल बा। जवन तुँ कहबा आज ऊह होई।बोला तोहें का का चाहीं?”
रामू भी आज भाई के लिए सबकुछ लुटाने को तैयार था।

“खेत खलिहान घर दुआर मे हमे आधा-आधा बाकी 5 मवेशी,घर मे रखल पचीस हजार रूपया तथा शहर के किनारे बारह ढिस्मिल जमीन पिताजी के दे द। जे ओनकअ सेवा सत्कार करी तेके ऊ आपन दे दीहैं।”
श्यामू चालाकी के साथ सबकुछ बँटवारा कर दिया था। कि अन्ततः पिताजी हमारे मे ही रहेगे और बाद मे सब हमारा हो ही जायेगा।

अब बारी पिताजी की थी कि वह किसके साथ रहेगें?

जब मनोहर लाल से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि “देखा बाबू! दोनों जनि अपन होखा ।हमरे लिए सभै बराबर बा। रामू त खेत खलिहान परिवार सब सम्भाल लिहैं बकिर श्यामू अबहीन बहुत छोट बाटन, अबहीन ओकरे बुद्धि नाही बा। ओकर मेहरारू घर से भी बाहर ना निकसेलें फिर ओकर खेत खलिहान घर दुआर के देखी?
हम श्यामू में रहब त जरूर कुछ दिन सम्भाल देब,फिर हमरे जिनगी क कवन ठिकाना बा?सब तोहन पचन क त होई न?

पिताजी अपना फैसला सुना चुके थे।

रामू और उसकी पत्नी सीमा को तनिक भी दुख नही था। क्योंकि उसके समझ मे भी श्यामू अभी भोहर ही था।

मगर सीमा और श्याम दोनों आज बहुत खुश थे कि पिताजी हमारे साथ आ गये
हैं तो हमे सबसे ज्यादा धन धरम मिल गया है।

सीमा और श्यामू पिताजी का तब तक खूब सेवा सत्कार खातिरदारी करते रहे जब तक उनके पास पैसा था।
सीमा और श्यामू दोनों धूर्त के साथ साथ बहुत ही स्वार्थी थे। काम धाम तो कुछ खास करते नही थे। जब पिताजी का पैसा खत्म हो गया तो वे एक एक मवेशी बेचते गये और पिताजी का सेवा- सत्कार और खातिरदारी भी त्यों -त्यों कम करते गये।

जब सभी मवेशी खत्म हो गये तो उसी दिन से पिताजी का भी हुक्का पानी बंद कर दिया गया ।

मनोहरलाल को पहले बैठे बैठे खाना पानी के साथ दूध व फल भी मिलता था।
अब अगर पानी माँग लेते तो सीमा तुंरत कह देती थी कि- “कहाँ तोहार नानी गाडी के धईले बाटीन कि हम तोहें पानी लाके दे देईं ?”

मनोहर लाल भी बडे जिद्दी स्वभाव के इनसान थे वह भले बूढे हो गये हड्डियों मे मांस झूल रही थी मगर गुस्सा उनका आज भी कम नही था।
वह डंडा उठाये और टेंगते टेंगते रामू के घर पहुँच गये।
सारा वाक्या रामू से कह सुनाया कि “-बाबू अब हम बिना खाये ही मर जाईब बकिर श्यामू के घर वापस ना जाईब !”

रामू ने कहा “आखिर कवन बात हो गईल बाबू जी?तोहँके के का कहलीस है हमे भी बतावा ना बाबू जी?

“बेटा रामू! हम ऊ बात अब केहु से ना बताईब ऊ बात अब हमरे छाती मे धईल रही हमरे चिता के ही साथ जाई।”

“ठीक बा पिताजी हम तोहार सेवा सत्कार खूब करब, केकर भाग जे माई- दादा क सेवा करे के पावे? हमार चार धाम अब तुँही बाडा बाबू जी। अब हमके छोडीके जनि कही जईहा। वादा करा न बाबू जी ?”रामू के मुख से शब्द नही निकल रहे थे मानो वह भगवान का साक्षात्कार कर रहा हो।

रामू और उसकी पत्नी दिन भर खेत खलिहान मे ही रहते थे। उसने अपने बेटे धीरज को पिताजी के सेवा मे ड्यूटी लगा दिया कि तुम पिताजी को नहवाओगे धोवाओगे खाना घर से ले जाकर आपने हाथ से खिलाओगे और पिताजी के पास ही रहोगे और सोवोगे।

मै तुम्हे पिताजी को समर्पित करता हूँ।

जैसा बाप वैसा बेटा।
धीरज भी अपने दादाजी का खूब सेवा सत्कार करता था।उसने पिताजी के आज्ञा को शिरोधार्य कर पढाई भी छोड दिया ।

मनोहर लाल को लगा कि अब वह ज्यादा दिन के मेहमान नही है तो उन्होंने रामू को बुलाकर कहा कि “बेटा रामू!हमार एक इच्छा और बा! बोला पूरा करबा ना?
हमे आपन तीन बचा द , तब हम कहीं?”

“हाँ हाँ हाँ,हम तोहार अंतिम इच्छा भी पूरा करब बाबू जी।हम तोहार कसम खा के कहत बाडी। अब त बतावा बाबू जी?रामू अपने पिताजी के सिर पर हाथ रखकर कहा।

“शहरिया मे हमरे नाम से जवन बारह ढिस्मिल जमीनिया बा हम धीरज बेटवा के नाम से वसीयत रजिस्ट्री कईल चाहत बाटी, मरले से पहिले।”
मनोहरलाल काँपते हुए कहे।

“पिताजी ओहमें छः ढिस्मिल जमीन श्यामू क ह, हम इ पाप ना कर सकिलाँ।”

“बेटा अहमन कवनों पाप नईखे,श्यामू खुद कहले रहले कि-“जे बाबू जी क सेवा सत्कार करी ऊ जमीन ओही क हो जाई। फिर हम न तोहे देत बाँडी और न श्यामू के। हम धीरज के देत बाँडी जे हमार सेवा बुढऊती मे करत बाडनसन।” मनोहरलाल ने कहा।

रामू यह बात अपने छोटे भाई श्यामू से कह आया कि पिताजी बहुत गलत करने जा रहे हैं जो हमारे लिए किसी पाप से कम नही है।
श्यामू जब यह बात सुना तो मानो उसके पाँव की जमीन ही खिसक गई हो।

श्यामू तुरंत गाँव में पंचायत बैठाकर सारी बात पंच- परमेश्वरों से रोते – रोते कह सुनाया। दोनों पक्षों की बात ध्यानपूर्वक सुनने के बाद पंच- परमेश्वरों ने मनोहरलाल के बातों का समर्थन करते हुए कहा कि-“देखा श्यामू तुँ अपने पिताजी के पास रखल पचीस हजार रूपया और पाँचों मवेशी अकेले डकार गईल बाटा और फिर पिताजी क सेवा भी ना कईला? ऐसे ना, तोहार औरत तोहरे बाबू जी के गाली-गलौज कर घर से ताड़ दिहलीन जेसे मनोहर लाल के दिल पर बहुत ठेस लागल बा। अब पंचायत क इ फैसला बा कि शहर क बारह ढिस्मल जमीन न रामू के नाम से न श्यामा के नाम से बल्कि रामू के बेटे धीरज के नाम से, जे तोहरे बाबू जी क सेवा पूत नियन कईले बाडेन ओकरे नाम से वसीयतनामा रजिस्टी करावे क आदेश सर्व सम्मति से पारित कईल जाता यहाँ पर।”
फिर पंचायत के सभी सम्मानित सदस्यगण और गाँव के सभी लोग रजिस्ट्री पर अपना अँगूठा और हस्ताक्षर कर धीरज के हाथ मे थमा दिये ।
पंच-परमेश्वर का फैसला सुन दोनों का कलेजा निकल गया था।
रात के घनघोर अँधेरे में श्यामू और सीमा अपना मुँह लटकाये अपने कर्म पर रोते हुए भारी पैरों से घर ऐसे जा रहे थे मानों उनके हाथों से सबसे कीमती वस्तु छिन गई हो।

किसी ने ठीक ही कहा है कि-

*जैसी करनी वैसी भरनी।*
*पछताये न पाये धरनी।*

राम भवन चौरसिया

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