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गीत – राजकुमार महोबिया,उमरिया,म.प्र

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गीत – राजकुमार महोबिया,उमरिया,म.प्र

Priti Surana July 21, 2017
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1.

नए सबेरे के झाँसे में
हरदम रहे हुलास |

अंदर अनुमोदन नस्ती पर
बाहर “न” की टीप
जल, जंगल-रक्षार्थ मंच पर
बिसलरियाँ हैं ढीठ
आग बढ़ी तब “कुआँ-खोद” का
आयोजित अभ्यास

गौतम, गाँधी की सीखों पर
नित्य नए उपहास
कहते- नहीं, अहिंसा के दम
यह आज़ादी, हाथ”
नए सिरे से बंदर लिख्खें,
भारत का इतिहास.

उद्दण्डों के कर अर्जुन का
लक्ष्य-भेद संधान
जीवन भर जो रहे निकम्मे
उन पर सब अभियान
“नौ दिन ढाई कोस” के हाथों
गीता का अनुवाद.

हाथ पसारे भूखें बैठीं
मंचों के नजदीक
राशन दुकानों पचास का
बोरा उगले तीस
अंदर-अंदर छेद रहा है
प्रश्नों का संत्रास.

कीच-ताल अपने पानी को
कहते गंगाजल
खुद को दूध, कीट गैरों को
साबित करते दल
हहा ! रात करने उतरी
सूरज का पर्दाफ़ाश
—————

2.

अपने हित में अलग-थलग सब
ग्रंथों के अनुवाद …..|

हमें छूट प्रवचन-श्रवण तक
जोड़े अपने हाथ
साष्टांग जजमानी पर भी
श्री गुरुवर नाराज
धर्म-कर्म पर प्रश्न उठे तो
चुप्पी के ‘परसाद’……….|

हमको अपने मुख दिन को, दिन
कहने पर प्रतिबंध
उनका सारा झूठा-सच्चा
सत्य, कबीर छंद
हम पर बंदूकें तानें नित
तरह-तरह के वाद ………..|

चुप रहने की कायरता को
अपना ही मन डाँटे
स्वाभिमान के गुणा-जोड़ को
हमने रह-रह काटे
अपने हाथों, मन के अंदर
बढ़ता रहा विवाद ……..|

आदेशों के परिपालन में
अपना लहू निछावर
स्वर्ण-कलश अभिनंदन उनको
अपनी किस्मत “पाथर”
ले गए निरा निकम्मे सारे
अपने हक की दाद…………|

घर में कलह अभावों उपजी
गाल फुलाए बैठी
खुशी “मंगली जन्म कुंडली”
हाथ धरे है ऐंठी
‘मान-मनौव्वल’ पर घर बैठे
साँझ-सुबह अवसाद ……….|

दर्द हमारा उनकी भाषा
लिखने को मज़बूर
आंसू की अर्जी में पहले
लिखना पड़ा ‘हुजूर’
सही हाथ जाते-जाते सब
बदल गए संवाद……………|
————————————-

3.

‘सदा नीर’ का उद्गम तुमको
मेरे हाथ मरुस्थल

तुम्हें साधना सुविधाओं की
वृत मेरे सब “निर्जल”
तुम्हें शांति नैसर्गिक, मुझको
निपट कलह कोलाहल
तुम्हें भाव का, हर जल उत्तम
व्यर्थ मेरा गंगाजल ………….|

अनायास थीं शपथ तुम्हारी
‘कर्म, वचन, मन’ मेरी
फलीभूत सब अर्घ्य तुम्हारे
समिधा मेरी अधूरी
मुस्कानें तुमको प्रशस्ति की
मुझको हास भरा पल…………|

‘उदर-जन्म’ हम तुम दोनों के
कर्म विलग पर सारे
मुक्ति तुम्हें इस जन्म, मुझे हैं
जन्म जन्म के फेरे
तुम्हें मान के शीर्षासन थे
मुझे सदा ही पदतल………….. |

मुझे कर्म-फल का भय हरदम
दुर्निवार हर चिन्ता
नियति-लेख पर मैं संचालित
तुम थे स्वयं नियन्ता
निर्द्वंन्द्वों के सुख तुमको नित
मुझको आँसू छल छल…………|

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