LOADING

Type to search

Uncategorized आलेख

मेरे मन की बात

Priti Surana 1 year ago
Share

धूप-छांव, जवानी-बुढ़ापा, लाभ-हानि, सुख- दुःख, ये सब हर प्राणी के जीवन के अभिन्न अंग हैं। हमारी मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है कि हम कितने दुःखी और कितने सुखी समझते हैं स्वयं को, क्योंकि कोई पैमाना तो है नहीं, इसको मापने के लिए, और सही बात तो यह है कि जो अति उत्साही और अति भौतिक होते हैं, वे ही दु:खी भी बहुत जल्दी होते हैं। दुःखी रहना, कोई नहीं चाहता क्योंकि आनंद की अनुभूति करना ही शरीर में जो आत्मा है, उसका प्राकृतिक गुण है।
दूसरा अपेक्षा और उपेक्षा भी दुःख का कारण होते हैं। हम स्वयं ये सोचें कि हम कितने सामाजिक हैं और हमने कितने लोगों के दुःख दूर करने की कोशिश की या कितना समय भलाई के काम करने में लगाया। दूसरे को समझाना या उपदेश देना आसान होता है और वास्तव में किसी का दुःख दूर करने में मदद करना बहुत मुश्किल होता है।
आज लोगों को अपने ही परिवार के लोगों को देने के लिए समय नहीं है। मशीनें इतनी हैं, कार्य को सरल बनाने के लिए और समय बचाने के लिए फिर भी समय नहीं रहता। कुल मिलाकर स्वार्थ पूर्ति, भौतिकता के प्रति झुकाव, नैतिक मूल्यों का पतन, असुरक्षा की भावना, बाहरी सुख की तलाश, आधुनिकीकरण, आदि , क्षणिक सुख के बाद , अधिक दुःख दायी हैं।
जरा सी भी कठिनाई आने पर मनुष्य संतुलन खो बैठता है। यह बात निश्चित है कि हर समस्या का समाधान है यदि शांति से हल ढूंढ़ा जाए, लेकिन वह तो अशांत होकर उलझता ही चला जाता है। परेशानी, समस्या या दुःख विराट हो जाते हैं। जिंदगी बोझ सी हो जाती है। फिर आती है अकेलेपन की शिकायत क्योंकि अब तक उसने जीवन में दुःख और परेशानी का अनुभव होने से खुद को वंचित रखा था।
तीसरा यह कि हम अपने दुखों का कारण भी किसी व्यक्ति विशेष या परिस्थिति पर डाल देते हैं। लोग कतराते हैं कि उन पर कहीं इल्ज़ाम न लग जाए मुफ्त में, दूसरे की परेशानी का।
वैसे दुःख या सुख किसी और के द्वारा दिए गए नहीं हैं बल्कि हमारे स्वयं के खरीदे हुए हैं। मेरी बात यहां सभी को अटपटी लगेगी लेकिन ये सौ प्रतिशत सही है। यह एक आकर्षण की शक्ति है जो विज्ञान की तरह काम करती है। आप चाहें तो आज़मा कर देख लीजिएगा। दुःख की बातें ज्यादा सोचेंगे तो दुःखी ही होंगे बल्कि लगातार दुःख आते भी जाएंगे, और सुख की सोचेंगे तो सुखी रहेंगे।
अब आती है बात दुःख या सुख में शामिल होने वाले लोगों की। यदि हम अपने निजी जीवन में किसी की दखलंदाज़ी पसंद नहीं करते हैं तो किसी को क्या पता चलेगा कि फलां फलां को ये तकलीफ़ है। इसी तरह सुख भी आदमी अकेले ही मनाने लगा है। शामिल लोगों की संख्या दोनों ही समय कम होती जा रही है।
दूसरा दुःख या सुख में क्या क्या आते हैं , ये श्रेणियां भी हमने ही बना रखी हैं। वास्तव में जो घटित हो रहा है वह हमें कुछ सिखाने के लिए हो रहा है।
गुब्बारा फूटना यदि एक बच्चे के लिए दुःख है तो यह भी सत्य है कि हर चीज नश्वर है, हांलांकि यह बात बड़ी है बच्चों को समझाने के लिए, लेकिन गुब्बारा फूटना भी उत्सव मनाने जैसा हो जाए और कहा जाए कि अरे वाह बच्चे ने तो बर्थ-डे मना लिया, अभी शाम को और ढ़ेर सारे ले आएंगे और चोट लगने पर उसे बहादुर या शेर बच्चा कहा जाए तो वह सकारात्मक सोच लेकर बड़ा होगा। मैंने पांच साल के बच्चे को बिना एनिस्थिशिया के आठ टांके आंख के पास लगवाते हुए देखा है।
तो अंत में यही कहूंगी कि सुख और दुःख में हमारे साथ कितने लोग खड़े हैं यह हमारे पर ही निर्भर करता है। लोगों के पास दोनों के लिए ही टाइम नहीं है आजकल।
मेरी बातों से कोई आहत हुआ हो तो क्षमा चाहूंगी। बच्चों को नैतिक शिक्षा देना मुश्किल है नामुमकिन नहीं।
************************
पिंकी परुथी “अनामिका”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *