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सुख के सब साथी दुख में ना कोय

Priti Surana 1 year ago
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मायके जाने की कितनी खुशी होती है। यह हर लड़की जानती है।
कुछ दिन जिम्मेदारी से मुक्ति और
फिर पुरानी सहेलियों से मिलना।
भतीजे का बारसा था सो गोंदिया
गई थी। बरसों पुरानी नाईन मिली तेल लगाने आई थी भतीजे को।
कैसे हो बेबी रानी।वह मुझे देख
कर खुश हो गई थी।
सबसे छोटी होने के कारण आज भी इसी तरह बुलाते हैं ।
मैं तो ठीक पर क्या बताऊँ बाबू
इन्तकाल हो गए। भाइयों ने निकाल
दिया।
पति पहले ही नहीं थे बच्चे थे नहीं
पिता के साथ रहती थी। चार घरों में
जाती जो भी पैसे मिलते पेट पालती।
अब कहाँ रहते हो।
श्मशान घाट के पास एक झोपड़ी
बनाई है वहां ।
ड़र नहीं लगता।
लगता तो है। पर सुख के सब साथी दुख में ना कोय।
बहुत दिन पहले कही यह बात
आज भी याद है।

डा राजलक्ष्मी शिवहरे

 

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