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सुख के सब साथी दुख में ना कोय

Priti Surana 1 year ago
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आज मै हॉस्पिटल गई थी, बहुत बुरा लग रहा था।मेरी नन्द शशि , उनकी एक किडनी काम नही कर रही थी ।वो अकेली रहती थी, कोई नही था हमारे सिवा।मेरे मिस्टर उनके बड़े भाई थे।बहन को इस हालत में देख कर परेशान थे।दीदी ने सबके लिए बहुत किया है, बच्चों का ध्यान , उनकी पढ़ाई, घर के हर सुख दुख में आगे रहने वाली शशि दीदी, आज अकेली दुख से लड़ रही थी। यू तो मिलने सब आए, अपनी मुफ्त की सलाह दे गए, कोई केले दे गया , कोई अनार, ऐसी चीजें जो उन्हें नही खानी थी।आज उनकी छुट्टी हुई वो अपने किराये के घर में चली गई।अंदर से दुखी थी बहुत।हमारे घर जाने के लिए भी मना कर दिया। मेरे मिस्टर परेशान थे इस बात से।खैर, इस संकट के समय में कोई पैसे की मदद के लिए आगे नही आया, कोई फिर उनसे मिलने भी नही गया।कितने खुदगर्ज है हम , जब हमे उनकी जरूरत थी,हम शशि दीदी कहते हुए थकते नही थे। और आज, कोई आवाज़ भी नही देना चाहता । मै दीदी की हालत देख ये सोच में हूँ, की कितना सच कहा –“सुख के सब साथी दुख में ना कोय”। लेकिन मै इस कथन को जूठा साबित करना चाहती थी।। दीदी को अपने घर ले आई।सलाह नही सहयोग की जरूरत होती है।। ये बात मुझे महसूस हुई।।

— निधि–

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