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सुख के सब साथी दुख में न कोय

Uncategorized संस्मरण

सुख के सब साथी दुख में न कोय

Priti Surana August 4, 2017
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बचपन से ही सुना था “सुख के सब साथी दुख में न कोय”
इसे समझने में थोड़ा वक्त लग गया।

मैंने बचपन से ही देखा था! पड़ोस में एक अम्मा रहती थी, जिसे सब गंगा काकी कहते थे। उनके तीन पुत्र व दो पुत्री थी। दोनों बेटियों व दो बेटों की शादी के बाद उनके पति ने उनका साथ छोड़ दिया। और फिर घर की जिम्मेदारियां उन पर आ गईं। बड़े बेटे को दूसरे राज्य में अनुकम्पा नियुक्ति मिली क्यूंकि उनके पति की नौकरी केन्द्रीय सरकार की थी। पर बड़े बेटे के तीन बच्चों का लालन पालन गंगा काकी ने ही किया। क्यूंकि दूसरे राज्य में भाषा की समस्या होती थी।
फिर छोटे पुत्र का भी विवाह हो गया और सब हंसी खुशी रहने लगे।
काकी बहुत ही मेहनती व कार्यकुशल थी इसलिए सब उनको खूब पूछा करते थे हेडली बेटी तो अधिकतर उसे अपने साथ ही रखती थी।
फिर अचानक जाने क्या हुआ कि उनकी छोटी बहू घर छोड़कर चली गई और उनका घर बिखरने लगा।
फिर कुछ समय बाद अचानक मुझे पुत्र की मृत्यु हो गई। अब उनका बड़ा पुत्र और उनका परिवार भी यहीं आकर रहने लगे और उनका जो पोते था वो भी नौकरी करने लगा पर उन लोगों ने फैसला कर लिया कि वे गांव में नहीं रहेंगे। और शहर में जाकर हुए लगे।
मुझसे बेटे का परिवार अब गंगा काकी कि जिम्मेदारी बन गई थी। उनके पेन्ट से जो कुछ भी आता उसी में अपना जीवन चला रहे थे।
एक दिन अचानक गंगा काकी को लकवा मार दिया और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। जब सास की ये हालत देखी तो धीरे से मंडली बहू भी शहर जाकर रहने लगी। अब गंगा काकी का पूरा परिवार शहर में रहता पर कोई अपने साथ उन्हें गांव न ले जाता। बेटियों की अपनी मजबूरियां थी।
फिर उनकी बेटियों ने आकर समाधान निकाला कि एक नौकर रखकर उनकी सेवा करवाई जाये और बीच बीच में हम आकर उन्हें देख लेंगे।

जब तक वो काम की थीं सब को वो भाती थीं जिसमें वो लाचार हो गईं अपनों ने भी मुंह फेरे लिया।

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