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सुख के सब साथी दुख में न कोई

Priti Surana 1 year ago
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बात उन दिनों की है जब रामजी चाचा के बच्चे पढ़ रहे थे होनहार थे रामजी चाचा का कामकाज सरकारी नॉकरी मजे में चल रही थी भाई जिले के मालिक जो थे हमेसा कलेक्टर साहब की दस बीस आदमी साहब साहब कह घेरे रहते,,
रोज ही कोई न कोई रिश्तेदार पहुँचा रहता घर के नोकर तो बस मेहमानों की आने वाले तमाम मित्रों की सेवा में लगे रहते,हमेसा सातो दिन रौनक ही रौनक बनी रहती बड़े व्यस्त समय से चाचा भी समय निकाल लेते सबके लिए सबकी अपनी अपनी कहानी होती चाचा को सुनाने के लिए,सबके दुख दर्द को रामजी चाचा सुनते जो हो सकता करते सभी दोस्त, यार,रिश्तेदार,मातहत कर्मचारी सभी खुश रहते किसी को रामजी चाचा ने निरास नही किया कभी कभी तो बड़ी प्रशासनिक परेसानी भी उठानी पड़ती किसी के लिए,,धीरे धीरे समय ने अंगड़ाई ली बच्चे पढ़ लिख विदेश बस गये, सर्विस से भी रिटायर हो गए,शादी व्याह भी निपटा लिया,बस मियां बीबी घर मे बचे और वही एक पुराना रामदीन नौकर तमाम तरह की बीमारी ने भी कुछ साल पहले घर कर लिया था ,अब तो जैसे हावी हो गई है लोगों का आनाजाना बंद हो गया अब ना कोई यार,दोस्त ना ही कोई रिश्तेदार पूछते ,रामजी चाचा कहते जब अपने बच्चों से कोई उम्मीद नही तो दूसरों से क्या उम्मीद करना,हमेसा लोगों में घिरा व्यक्ति हमेसा बोलते रहने वाला व्यक्ति ऐसे व्यक्तित्व ने जैसे मौन धारण कर नियति के आगे जैसे नतमस्तक हो गया बस जैसे दिन रात काटना ही रह गया उसपर पिछले वर्ष चाची ने भी साथ छोड़ दिया,अकेले घर जैसे काटने को दौड़ता बेटे से गुहार लगाई अपने देश अपने घर आजाओ तो बेटे ने अपनी कामकाजी पोजिशन बेटे की पढ़ाई और हिन्दुसात के लोगों की तमाम बुराई बता किनारा कर लिया,बड़े दिनों बाद मेरा मिलना हुआ रामजी चाचा से बस यही कह चुप हो गए बेटा ज्यादा दिन नही बचे अब जिंदगी के बड़े दिनों बाद किसी अपने ने सुधि ली अच्छा लगा तुम्हारा आना ,अब तो तुम्हारी चाची के जाने के बाद बेटे ने भी मुँह ….दो शब्द उन्होंने जैसे तैसे कहे लेकिन चेहरे की अकथनीय पीड़ा ने वो सब कह दिया जो चाचा नही कहना चाहते थे मुझे समझ नही आया कि क्या कहूँ आगे और कौन और कैसा समाचार पुंछु उनसे ………उनको अपलक देखता उनके पुराने दिन चलचित्र की भांति आँखी के सामने से गुजर रहे थे ध्यान भंग तब हुआ जब बोले कि मुम्बई वापसी कब है तुम्हारी,परसों कह उठा प्रणाम किया औऱ एक बार जी भर देख सारी यादें समेटे दरवाजे की तरफ बढ़ गया रामजी चाचा वही चिरपरिचित अंदाज में जीते रहो बेटा वापस आना हुआ तो जरूर आना ,संभाल के जाना ,,कह रहे थे,,समझ नही पा रहा था कि क्या यही जीवन है जीवन की उपलब्धि है आज के दौर की…..

आनंद पाण्डेय”केवल”

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