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सुख के सब साथी

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सुख के सब साथी

Priti Surana August 4, 2017
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सुख के सब साथी
सुख में सुमिरन सब करें
दुःख में करे न कोय जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे का होय।
यह मानव स्वभाव है कि वह स्वार्थी होता है, वह ईश्वर को याद भी तभी करता है जब दुःखी होता है।हमेशा अच्छे का ही साथ देता है।मुझे एक घटना याद आती है
माधुरी ने मनीष के साथ माता पिता के विरुद्ध जाकर प्रेम विवाह किया, दोनों ने अपना अलग संसार बसाया।पहले नौकरी करी फिर अपना विद्यालय खोल लिया जो काफी अच्छा चल निकला।
अनाप शनाप पैसा आने लगा तो चार ऐब भी दबे पांव चले आये।मनीष मित्रों के साथ पार्टियां करने लगा और पीने पिलाने लगा।रात दिन मित्र मंडली आगे पीछे दुम हिलाते।
मनीषा के विरोध करने पर भी मनीष पर कोई असर नही हुआ और एक दिन वही हुआ जो नही होना था।
मनीषा गोदी की बच्ची के साथ दुनिया मे अकेली थी।अब वह अकेलीस्कूल संचालन घर और बेटी की जिम्मेदारी उठाने के लिए खुद को तैयार करने की हिम्मत जुटा ने लगी।नित्य आने वाले पति के अभिन्न मित्रों से मदद मांगी तो
धीरे धीरे सबने कन्नी काट ली।
आज वह अकेली अपनी लड़ाई लड़ रही है।
सही कहा हैसुख के सब साथी।
कीर्ति प्रदीप वर्मा

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