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Priti Surana August 4, 2017
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“जब आप खुश होकर हंसेगें तो दुनियां आप के साथ हंसेगी, जब आप दुखी होगें तो स्वयं को अकेला पायेगें।” ये एक सच है। कहने की आवश्यकता नहीं हर व्यक्ति के पास इसको सच प्रमाणित करते जीवन के कटु सत्य अनुभव हैं।
एक अनुभव मेरी यादों में सदा आंसू बहाया करता है। बात मेरे ही घर की है दुख के साथ स्वीकारती हूं कि सच है।
उस दिन कालेज से लौटी तो देखा दादी सोफे पर गुस्से से बैठी थीं और पापा पास ही मां मां कहकर उन्हें मना रहे थे। मुझे मम्मी की बात याद आ गयी। मैं भांप गयी कि दादी वृंदावन वापस जाने की जिद पर अड़ी हैं। उन्होंने सुबह से पानी तक नहीं पिया था और बार-बार पापा से कहती मैं वृंदावन पहुंच कर ही कुछ मुंह में डालूंगी। हम बच्चों ने कुछ भी कहना चाहा तो मुंह खोलने से पहले ही डांट कर चुप करा दिया गया। अन्ततः पापा ने रोते हुए दोपहर की ट्रेन में बिठाने का कार्य किया।
दादी चली गयी और दादा चुप थे क्या कहते व्हील चेयर पर उदास से सोचते रह गये। दर असल दादाजी चौरानबे वर्ष की आयु में फुटपाथ पर से गिर गये थे और उनकी कमर की हड्डी टूटने के कारण चल फिर नहीं पा रहे थे।आपरेशन के बाद भी डर के कारण व्हील चेयर से नहीं उठ सके। मम्मी पापा सर्विस में होने के कारण और हम सब कालेज जाने वाले सो दिन में दादाजी के पास कोई नहीं होता था। यह दुखद हादसा होने के बहुत सालों पहले से दादा-दादी वृंदावन में रहते थे। मम्मी पापा की आर्थिक तंगी भी इसका एक कारण रही थी। उनके जाने के बाद मम्मी पापा की नौकरी लगी और कठिनाई से हम बच्चों को घर पर अकेला छोड़ बड़ा किया। दादाजी बड़े भैया के जन्मदिन पर घर आये तब ये हादसा हुआ। मम्मी पापा ने सोचा दादी साथ रहेंगी तो ठीक रहेगा पर दादी आयी और दो दिन में ही मुझसे भी कहा कि ये अब नहीं उठेंगे और मैं ना रहूं इते। और दादी जिद कर चली गयी। दादाजी फिर अपने पैरों न चल सके। हम लोगों ने यथासंभव सेवा की। दोपहर में उनकी पहुंच में पानी भर कर भर कर रख जाते मैं कालेज से जल्दी आ जाती। आखिर आठ माह बाद दादाजी स्वर्ग सिधारे ।
पति पत्नी के पवित्र और अटूट माने जाने वाले रिश्ते का एक रूप यह भी।जब दादाजी को सबसे ज्यादा जरूरत थी तब ही जीवन संगिनी जैसी चीज साथ छोड़ गयी।
रश्मि बंदवार नामदेव
पेण्ड्रा, बिलासपुर

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