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सुख के साथी

Priti Surana 1 year ago
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मनुष्य जीवन सदैव अनुकूल परिस्थितियों की चाह करता रहा है | यह परिस्थितियाँ कैसे निर्मित हों ? वह सदैव बस इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रयास रत रहता है |व्यक्तित्व की विलक्षणता प्रयासों को गति प्रदान करती है | लक्ष्य साधना के बाद उसे सुख के सब साधन उपलब्ध हो जाते हैं | वैभव ,सम्पन्नता और ऐश्वर्य मिल जाने के बाद वह समाज में अपना एक स्थान बना लेता है |
ऐसे व्यक्ति के पास जब सुख के साधन उपलब्ध हो जाते हैं तो उसका गुणगान हर कोई करने लगता है |उसके आसपास छोटे छोटे स्वार्थ सिद्ध करने वाले लोग जमा होने लगते हैं | संपन्न व्यक्ति को भी सारा जहाँ अपना लगने लगता है | चापलूसी लेकर हर कोई उसका वरद हस्त बनना चाहता है | वर्तमान में सत्ता पर विराजमान नेताओं के जन्म दिन की बधाई के लम्बे चौड़े फ्लेक्स बनबाना प्रतियोगिता सी हो गयी है | उनके आगमन पर भीड़ जमा होती है ,सह भोज होते हैं |इन नेताओं के सत्ता च्युत होते ही उनके आवासों पर फिर मक्खियाँ ही शेष रहती हैं |
समाज के रिश्ते नातों का भी लगभग यही हाल है | सहयोग मिलने तक जो संबंधों की दुहाई देते नहीं थकते थे वे विपन्नता के दिनों में उन्हें जानने तक में असमर्थता व्यक्त करते हैं |जो उनके आने के लिए आतिथ्य के लिए सदैव याचना करते थे वे उनके सामने पड जाने पर नज़र चुराने का प्रयास करते हैं |
जिसके जानने का सबसे ज्यादा जो दंभ भरते थे वे उसे ऐसें व्यवहारित करते हैं जैसे कभी जानते तक न थे |सुख के साधन होने पर जो व्यक्ति गुणी जान पड़ते थे | वे अब केवल दोषी ही जान पड़ते हैं |विषम परिस्थितियों में यदि सुख के साथी के यहाँ कोई चोरी या वारदात हो जाये तो साक्ष देने में भी भूमिगत हो जाते हैं लोग | हाँ यह सत्य है कि सुख के सब साथी होते हैं पर कुछ ऐसें भी हैं जो सदैव अनुगामी होते हैं |पर लोक जगत में तो वही चरितार्थ होता है जो अपवाद न हो |
गुलाब के पौधे के पास तब तक कोई नहीं जाता जब तक उसमें फूल न खिले हों | फूल न खिले न होने पर गुलाब के पौधे की तरफ जाना तो दूर देखते तक नहीं हैं | बादल जब तक पानी देते हैं तब तक बादल प्यारे लगते हैं अन्यथा बादलों को सभी कोसते नज़र आते हैं | सही कहते हैं लोग …………सुख के सब साथी दुःख में न कोय |
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प्रदीप सोनी ‘ शून्य ‘

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