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सुख के सब साथी दुःख मे न कोय

Priti Surana 1 year ago
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वाकया 2013 का है, मेरी तबीयत अचानक ही खराब हुई, डॉक्टर्स की मेहनत और मेडिकल साइंस का कमाल पति और बच्चों की दुआ और माँ पिता के आशीर्वाद से मै लगभग तीन साल बाद मै अपने वास्तविक रूप मे आ सकी..!वह तीन साल मैंने अपने बच्चों और परिवार के साथ गुजारे और भावनात्मक तौर से हम चारो मेरे दोनों बेटे और पति देव एक दूसरे से जुड़े , एक डर एक समर्पण एक केअर शायद हम पहले से और ज्यादा करने लगे.. मेरी स्थिति तो हिलने की भी नही थी..
मुझे हर वक्त एक सहारे की जरूरत थी और वह मजबूत संबल मेरे ये बने..कुछ दिन रिश्तेदार आते रहे,पडोसी भी गाहे बगाहे आते रहे,अच्छे मित्र(शायद)जो जमघट लगाए रहते थे वे भी यदा कदा अब आने लगे ,तीन साल मे उनका काफी कम आना होने लगा,सब नदारद रहने लगे मै तरस जाती थी उन्हें देखने हर आहट पर चोंकती थी की अब फलाना सहेली आयगी,पर नाउम्मीदी हाथ लगती थी,पतिदेव और बच्चे पढ़ाई के साथ घर के काम निपटाते त्यौहार भी अकेले तीन साल छुट्टियाँ भी अकेले,बस मेरी मधु(बाई)एक ऐसी थी जो लगातार हर पल साथ थी, दुःख था और हम अकेले।
सम्बल और एक दूसरे को देखते हम लोग पार हुए म मै ठीक होने लगी, थोडा चलने लगी अपने काम करने लगी , स्वस्थ्य सुधरने लगा स्थिति नॉर्मल हुई दैनिक दिनचर्या वापस अपने मुकाम पर पहुंची अब सब मस्त है, ताज्जुब रिश्ते लौटने लगे फ्रेंड्स आने लगे ,पर अब मै पीछे हटने लगी ,इंसानी फितरत से मोहभंग हुआ और यह भी समझ आया की सुख के सब साथी दुःख मे ना कोय””आज हम चारो सेल्फ ओरिएंटेड तो हुए ही पर यह भी प्रॉमिस किया की अगर हम सुख मे किसी के साथ है तो दुःख मे भी जरूर साथ देंगे,हम ओरों की तरह व्यवहार नही करेंगे, और उस,समय से मेरे मित्र बने मेरी पढ़ने की रूचि और किताबें, आज किताबें मेरी अच्छी दोस्त है ..मेरी कविताएँ और कलम मेरे सुख दुःख के साथी…स्वरा

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