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सुख के सब साथी

Priti Surana 1 year ago
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बचपन से सुनती आ रही इस उक्ति को अनेक बार सत्य साबित होते देखा है ।
जीवन में सुख -दुख आते- जाते रहते हैं ।छोटे -छोटे दुख तो मनुष्य आसानी से सह जाता है ।मगर जीवन की दिशा ही बदल जाये , जीवन अस्त -व्यस्त हो जाये , ऐसे दुख को सहने के लिए वह किसी ऐसे अपने का संबल चाहता है जो उसे इस दुख से उबरने में सहायक हो ।दुख की घडी में उसका मददगार हो । बिरले ही ऐसे व्यक्ति होते हैं जो इस पर खरे उतरते हैं ।खुशियों में सभी आगे बढ -चढ कर सम्मिलित होते हैं ।पर आँसू पोंछने के वक्त सहानुभूति जता कर कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं । यहाँ तक कि परिवार वाले भी कन्नी काटने लगते हैं ।
मेरे एक परिचित के यहाँ पिता का देहान्त हो गया था । शोक का वातावरण था । स्वाभाविक ही था माँ का धीरज खोना ,अत्यधिक व्यथित होना ।इस तनाव से उनका स्वास्थ्य भी चिन्ता बढा रहा था ।सभी समझाते धैर्य रखने ।वे प्रयत्न भी करतीं पर अधिक देर स्वयं को रोक न पातीं ।उन्होंने अपना साथी सदा के लिए खो दिया था ।इससे दारुण दुख और क्या हो सकता है ।
सब रिश्तेदारों के जाने के बाद घर में उनके बेटा -बहू पोते- पोती ही रहे थे ।घर व्यवस्थित करने में व्यस्त बहू सासू माँ को समय पर चाय ,भोजन ,दवाऐं आदि देती ।बेटा भी सुख -सविधा का ध्यान रखता ।पर माँ की आँखों में आँसू देखते ही उन्हें सहारा बँधाने के स्थान पर अकेला छोड देते ।और एक दिन तो हद ही हो गई जब बेटे ने माँ के बात करते समय रुलाई आने पर बेटे ने कहा – माँ आप तो बार-बार रो कर दिखाती हो ।बच्चों का भी नहीं सोचतीं , कैसे सहम जाते हैं ।और माँ अन्दर ही अन्दर घुटतीं या फिर कमरा अन्दर से बन्द कर रो लेतीं ।बेटा -बहू यह समझने को तैयार ही नहीं थे कि माँ को सम्हलने के लिए परिवार के साथ की आवश्यकता है , न कि तन्हाई ।अजब है ये दुनियाँ ।
यह सब जान कर मेरा मन उनके बेटा -बहू के प्रति वितृष्णा से भर उठा ।काश वे समझ पाते कि वे अपने बच्चों को क्या शिक्षा , क्या संस्कार दे रहे हैं ।
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डाॅ चन्द्रकान्ति आदित्य त्रिपाठी

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