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सुख के सब साथी दुःख मे न कोय

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सुख के सब साथी दुःख मे न कोय

Priti Surana August 4, 2017
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भारत के इतिहास को में पलटता हूँ तो काफी ऐसे पात्र मिले जो दुख में साथ निभाने के लिए तत्पर रहे है।।
राम वनवास जा रहे थे तो लक्ष्मण राजमहल तथा धर्म पत्नी के जगह भाई के साथ वनवास जाने का फैसला किया, कृष्ण ने कर्ण को जब पांडव के साथ आने को कहा तो कर्ण मित्र दुर्योधन का साथ दिया।।
अंग्रेजी हुकूमत के समय भगत सिंह के साथ सुखदेव और राजगुरु ने भी हँसते-हँसते फाँसी झूलना स्वीकार किया चाहते तो जान बचा सकते थे अपनी-अपनी ।।
ऐसे कितने साक्ष्य है जो कथन के अर्थ को परिवर्तित कर देते है ।।

सुख में सब साथी का अर्थ यह है कि आप संपन्न है तो साथी बढते जाएंगे क्योंकि इंसान ज्यादातर महत्वकांक्षी होती है जिस कारण से वह संपन्नता में हीं सुख ढूंढते है क्योंकि संपन्नता में सुख आसानी से अनुभूति होती है क्योंकि यह बाहरी सुख है जिसे हम और कोई भी देख कर बता सकता है ।।
दुख में न कोय का अर्थ है संपन्नता से विहीन हीं दुख है इसमें साथ निभाना सबके बस की बात नही होती है इसमें वही इंसान साथ निभा सकता है जो त्याग तप या धैर्य में निपुण हो।। दुख शरीर को होता है आत्मा को न सुख और न हीं दुख होता है जो इंसान शरीर से उपर उठ चुका है आत्मा की चेतना से जागृत है वही व्यक्ति आपके दुख में भी साथ रहकर आनंद को प्राप्त करता है ।।
एक प्रसंग कि और ध्यान आकृष्ट कराना चाहूँगा न सुख और न दुख दोनो मे से कोई भी भावना बाहर मे नही है अंदर में है ।। यदि हम जैसा लेप लगाएंगे ऐनक वैसा हमें दिखाएगा ।। ठिक इसी तरह मन हमारा है जैसा लेप मन में लगाएंगे शरिर वैसा हीं दिखेगा ।।
इस कारण से सुख और दुख में शरिर हीं आपका साथी है मन को शुद्ध करने की आवश्यकता है चेतना को बुद्ध करने की आवश्यकता है ।।

आप किसी परिस्थिति में रहें साथी आपके सदैव साथ है ।।
#अनंत धीश अमन

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