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परस्परोपग्रहो जीवानाम्

Priti Surana 1 year ago
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परस्परोपग्रहो जीवानाम्

माता पिता ने जन्म दिया, पाला-पोसा,
और जीवन साथी के साथ विदा करते हुए कहा
हमारी परवरिश की लाज रखना
हमने जितना लाड़ प्यार तुम्हे दिया
उतना ही मान हमारा बढ़ाना।

गुरु ने शिक्षा दी, दिशा दी,
और पाठशाला से जाते समय कहा
कुम्हार की तरह ढाला है तुम्हें,
अब बदले में पाठशाला
और अपने गुरु का नाम रोशन करना।

बहन ने भाई की कलाई पर राखी बांधी
बदले में लिया आजीवन रक्षा का वचन
भाई ने भी राखी बंधवाकर कहा
बनाए रखना इस आंगन की रौनक
और देना बरकत की दुआएं।

जीवनसाथी ने लिए सात फेरे अग्नि के
और पत्नि ने मांग लिए सात वचन
सात वचनों के बदले पति ने मांग लिया
अंतिम एक वचन में ही पत्नि से
आजीवन सम्पूर्ण समर्पण।

बच्चों को संस्कार दिया, प्यार दिया,
भविष्य दिया
तो कुछ बनकर दिखाने की शर्त पहले रखी,
वहीं बच्चों ने कुछ कर गुजरने के लिए
मानसिक स्वतंत्रता के साथ
सुख सुविधाएँ मांग ली।

दोस्तों से की हर सुख-दुख की बात
दिया और लिया कदम-कदम पर साथ
बिन अपेक्षा दोस्ती का रिश्ता भी नही दिखा,
ये रिश्ता भी
प्रेम और विश्वास के आदान प्रदान पर ही टिका।

रिश्ते व्यापार नहीं जो समान लिया मूल्य दिया और बात खत्म
रिश्ते किराए का मकान नहीं
किराया चुकाया घर बदला
और अधिकार खत्म
रिश्ते राजनीति नहीं है
वोट मिले सीट मिली और मतलब खत्म।

गुप्त दान करने वाला भी चाहता है
बदले में पुण्य के लेखे में बढ़ोतरी।
ये निश्चित है बिन अपेक्षा तो
प्रकृति भी कुछ नही देती,
धरती को बीज दो तो ही अनाज मिलेगा।

पेड़ लगाओ को आकाश से पानी मिलेगा,
प्राकृतिक संपदाओं का संरक्षण और सुरक्षा करो
तो ही प्राणवायु , भोजन और जीवन संसाधन मिलेंगे,
सबको अपने किये के बदले
कुछ न कुछ प्रतिफल चाहिए

फिर क्यों अपेक्षा कि कर्म कर के याद मत रखो
मत करो प्रतिफल की अपेक्षा कभी किसी से तुमने कर्म का धर्म निभाया
मैनें तो नही पाया किसी को यहां निर्लिप्त।

‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’
जैन ग्रंथ, तत्त्वार्थ सूत्र का एक श्लोक है, जिसका अर्थ है
“जीवों के परस्पर में उपकार हैं
अर्थात सभी जीव एक दूसरे पर आश्रित है।

क्या आश्रित होकर अपेक्षा रहित होना आसान है,..?
अपेक्षाओं का बिना कहे पूरा किया जाने की नीयत और नियति है,..?
व्यवहार में आज के देश काल परिस्थिति में शायद नहीं,..
याद रहे पंचतत्व की शरण भी
प्राण देकर ही प्राप्त होती है।

प्रीति सुराना

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