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किरण मिश्रा नोएडा

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

किरण मिश्रा नोएडा

Priti Surana August 26, 2017
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इस बार रविवारीय केंद्रीय रचनाकार विशेषांक *सप्ताह का कवि* में प्रस्तुत हैं *किरण मिश्रा, नोएडा* का परिचय एवं रचनाएं। आप सभी से प्रतिक्रियाओं ईवा समीक्षा की अपेक्षा है।

*प्रस्तुतकर्ता*
प्रीति समकित सुराना
मनोज जैन ‘मधुर’
ब्रजेश शर्मा ‘विफल’

*परिचय*

नाम: किरण मिश्रा
पिता का नाम :श्री कामता प्रसाद तिवारी
माता की नाम:श्रीमती सावित्री देवी
पति का नाम:श्री जितेन्द्र कुमार मिश्रा
जन्मतिथि : 28 मार्च 1971
शिक्षा : एम. ए., बी. एड., NET उत्तीर्ण
शिक्षणस्थान:अवध विश्व विद्यालय,फैजाबाद,उत्तर प्रदेश
संप्रति: पूर्व आकाशवाणी उद्घोषिका ,वर्तमान में गृहसंचालिका
प्रकाशन: झाँकता चाँद(साँझा हाइकु संग्रह) 2017, नारी काव्य सागर (साँझा काव्य संग्रह)
देश की प्रतिष्ठित विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में नियमित रचनायें प्रकाशित!
सम्मान: “हायकु मन्जूषा रत्न सम्मान-वर्ष 2017”.”श्रेष्ठ हिन्दी कवयित्री सम्मान (विश्व हिन्दी रचनाकार मंच वर्ष.2017)
अतिशीघ्र प्रकाशित होने वाले कुछ साँझा संग्रह:उजास,संदल- सुगंध, अविरल धारा, हायकु की सुगंध, तांका मालिका,इत्यादि….
संपर्क सूत्र: फ्लैट नं-1506,टावर ए-9
जे.पी.क्लासिक, सेक्टर- 134,नोयडा,उत्तर प्रदेश
पिन कोड:201304
ईमेल: iimkiranmishra@gmail.com
मोबाइल नंबर: 9958437755

*आत्मकथ्य*

मैं किरण मिश्रा, मेरा जन्म भगवान राम की नगरी अयोध्या (फैजाबाद) में हुआ! मेरी प्रारम्भिक और उच्च शिक्षा फैजाबाद उत्तर प्रदेश में हुई!
बचपन से ही साहित्य पढ़ने और लिखने का शौक रहा! फलस्वरूप संस्कृत साहित्य से परास्नातक,बी,एड.और नेट परीक्षात्मक उत्तीर्ण की.. एफ.एम.आकाशवाणी फैजाबाद,में कुछ सालों तक एंकरिग का पद संचालन किया! वर्तमान में दिल्ली एन. सी आर(नोयडा) में गृह संचालिका का पद सम्हाल रहीं हूँ
मेरे शौक में.. लेखन-पाठन, चित्रकारी, गृहसज्जा, हस्त शिल्प, पाक कला इत्यादि
हैं!
“श्रृंगारिक प्रेम- कवितायें”लिखना मुझे बेहद पसन्द है!वो भी भगवान श्री कृष्णा पर… मेरी ज्यादातर कविताओं में वो किसी ना किसी रूप में मौजूद हैं!मेरा मानना है कविता भावना है और वो अन्त:से प्रस्फुटित होती है… शब्द सिर्फ उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम मात्र हैं!
देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में मेरी नियमित रचनायें प्रकाशित होती हैं!मेरा प्रकाशित हायकु साँझा संग्रह झाँकता चाँद हैं! विभिन्न प्रकाशनों से अति शीघ्र
प्रकाशित होने वाले कुछ साँझा संग्रह है.. नारी काव्य सागर उजास, अविरल धारा,सन्दल सुगंध, हायकु की सुगन्ध,तांका मालिका इत्यादि हैं!

*रचनाएँ*

*1. “ठूँठ”*

जानती तो थी…यारा
तुम सिर्फ वृक्ष हो….. .
इक कदम भी ..
न चल सकोगे मेरे साथ….
स्थिरता तो
तुम्हारा नैसर्गिक गुण है……
तुम पुरूष जो ठहरे..
और मैं ठहरी बहती नदी…..
जिसे सींचना है….
पखारना है पाँव….
बार बार तुम्हारा…
क्योंकि तुम तो
मेरे पूज्य हो ..
मैं तुम्हारे प्रेम में जो हूँ..
तुम्हारी वन्दना करती हूँ….
तुम्हें चाहती हूँ…
क्योंकि मैं जानती हूँ …
मेरे प्रेमरस से सिक्त होकर ही
तुम सीना ताने खड़े हो….
मेेरी स्नेहिल बूँदों से .
सिक्त हुये बगैर …..
तुममें जीवन कहाँ…??
प्रिय…
ये तुम्हारी
शीतल छाँव …
जिस पर तुम इतराते हो…. लहराते हो..अह्रनिशि,
बंजर हो जायेगी…….
हाँ यही सच है……
मेरा प्रेम ही…
तुम्हारी जड़े..
तुम्हारी बुनियाद है….
मेरा गर्भ गृह ही …
तुम्हारे जीवन की नींव
और….
ये निर्विवाद सत्य…
“मेरे प्रेम”के बिना तुम “ठूँठ हो सिर्फ ठूँठ…… !!””

*2- “जिन्दगी”*

ज़िन्दगी..
तुझे पढ़ …सुकून भी
मिलता है…
चुभन भी…. जलन भी……….

ज़िन्दगी….
तू कभी धूप …तो
कभी छाँव सी……

कभी……
सर्दी की मटियाली धूप
तो कभी….
जेठ दुपहरी में
झुलसाती आग सी…

कभी …..
इठलाती नदिया सी…चंचल
तो कभी बलखाती
शोख शीतल पुरवा बयार सी……

कभी ..
टूटी फूटी…
गाँव की कोई कंटक ..
पगडण्डी ..सी लगी…
तो कभी….
फिसलती पहाडों की
सर्पीली.. राह सी…

कभी… दर्द से भरी
कोई कारी बदली……
तो कभी रिमझिम
सावन की फुहार सी……

कभी बज उठती
मन मन्दिर में ……
प्रेम की आरती….
शंखनाद सी……….

तो कभी महके
किसी मस्जिद…
में लिखी खूबसूरत
आयत…अजान सी……..

तुझे देखूँ… तुझे पढूँ… ..
तुझे महसूस करूँ….
फिर भी तू मेरी नहीं….

ज़िन्दगी….
तू मेरे हिस्से में क्यों आई…..
बस….लाइब्रेरी में रक्खी
किताबों की दुकान सी..!!”

*3-“तुम कौन हो”*

मैंने लिखना चाहा……तुम्हें
तुम कौन हो……………..??

भोर के उगते सूरज हो
या रात के महकते चाँद….
ओस में भीगा गुलाब
या चाँदनी की बारात……
प्रेम हो, पुण्य हो,सत्य ,शिव,
रमजान,या रिमझिम बरसात……

मेरे अहसास हो
या मेरे अल्फ़ाज……
अलियों के गान हो
या चटकती-कलियों की शान….
शब्द हो,सुगन्ध हो,पुष्प-मकरन्द
या मेरे गीतों के मधु-छन्द……

दर्द हो,दवा हो
इबादत या खुदा ……..
करीब का अहसास हो
या फिर जुदा……….
नींद हो, खुमार हो,या शीतल-बयार
सर्दी की मीठी धूप हो
या तरूवर की छाँव……….

मुहब्बत में भीगे गीत हो
या रूमानी ग़ज़ल……..
मेरे नयनों के दीप या
मेरी जीवन के खूबसूरत पल……
मय हो,मयखाना हो,या मुकम्मल
मेरे अधरों की प्यास………

राधा के कृष्ण हो
या मीरा के श्याम……….
शबरी के बेर या
सीता के राम…………..
जिस्म हो,जान हो,स्वप्न हो,स्पन्दन
या मेरीे रूह में बसे प्राण……

मौन हो, मर्यादा हो
मधुवन या मधुमास……
मेरे मन के सुकोमल-भाव
हो या केवट की नाव……
हौसला हो,जीवन हो,श्रद्धा
या अहिल्या की आस……

पर पता है ……
सबसे अच्छा क्या लिखा……..
शब्दों को अधरों पर रखकर
अब दिल का भेद क्यों खोलूँ….
तुम आँखों से सुन सकते हो….
तो आँखों से ही, क्यूँ न बोलूँ………!!!””

*4-“मैं जिद्दी हूँ “*

तुम कहते थे ना यारा….
मैं जिद्दी हूँ……
हाँ मैं बहुत जिद्दी हूँ…..
तुम्हें चाहना
मेरी इबादत है….
तो मैं हार क्यूँ मानूँ …..
भला
पूजा से अर्चना
से भीे कोई हारता है…..
माना तुम पत्थर हो…..
प्रभु…

पर पत्थर
से भी आस रखती हूँ…
क्योंकि मैं तो
इन्सान हूँ….
पाप क्या…. पुण्य क्या….
सही क्या …गलत क्या….
ये तो तुम जानो…..
इसका लेखा-जोखा…
तो तुम रखते हो…
मैं तो इक आम इन्सान हूँ…
भावना से भरी….
आँकाक्षाओं से उबलती…..
सरल, विह्वल,
कलकल बहती इक
संतप्त नदी सी……
हर किनारे पर
तुम्हारी तलाश ,
तुममें ही
सिमटने की चाह लिये….
वक्त के थपेड़ों को
सहकर भी
बाँहें फैला देती हूँ….
जरा हथेंलियों को बढ़ा…
छूकर तो देखो.
मेरी इन उत्ताल तरंगों को…
मचलती हैं
इनमें सिर्फ
तुम्हारे प्यार की
सरगोशियाँ…
यारा…मैं हारी नहीं….
हारूँगीं भी नहीं…
कभी देखा है क्या….
राधा की आस ….को हारते …..
या मीरा …
के विश्वास को टूटते …….
कितने भी विष
के प्याले पी जाऊँ ..
सब अमृत…..
क्यूँकि मुझमें
रचा बसा है मीरा का
विश्वास….
मैं लिखती हूँ …
राधा की आस……
जिसका टूटना…
तुम्हारे अस्तित्व का
बिखर जाना…
और मैं ठहरी
तुम्हारे ही अस्तित्व की परछाईं…..
देखना तुम
इक दिन….
मुस्कुरा उठूँगीं मैं …
तुम्हारे होंठों पर….
सुबह की
सुनहली धूप सी..
किरण सी
झिलमिलाउँगीं …तुम्हारी
आँखों में ……
शीतल पुरवाई सी ..
बिखर जाउँगी ..
तुम्हारे मृदुल गातों पर…..
क्यूँकि मैं जिद्दी हूँ ……
यारा…..
मैं हार नहीं मानूँगी……!!””

*5-तस्वीर*

तुम्हारी तस्वीर…
टाँग दी है ..मैंने….
मन की…. खूँटी पर……

झाड़ती हूँ..
पोंछती हूँ… रोज… तुम्हें
इन्तजार की ..
नम आँखों से ..गीला…कर……

जिससे तुम्हारे
रंग रूप में और…
निखार आ जाये
और मेरा प्यार
कभी धूमिल… ना पड़े….

तुम महको….
खिलो गुलाब से..
मैं काँटो सी
टहनियाँ लिये…
गर्व से खड़ी रहूँ…

तुम्हारे साथ….
तुम्हारी बन
तुम्हारी फिकर…में
बस इतना ही साथ
काफी है… तुम्हारा….
बोलो मंजूर है ना……..यारा

*6-“लुटेरा”*

दिल जब घुटने
टेक देता है…
तब लिखी जाती है….
कुछ प्रेम-तहरीरें….
समय के
उड़ते पन्नों पर
ज़िन्दगी की
पूर्ण वसीयत के साथ …
रिश्तों और
भावनाओं के ….
चक्रवृद्धि ..
ब्याज के संग..
ज़िन्दगी
बेहद खुशनुमा …
हो उठती है…….

या फिर
रिसने लगता हैं…
जज्बातों का कर्ज
ताउम्र…
मायूस ज़िन्दगी के
बही खाते से…
ये इश्क़, मोहोब्बत, प्यार…
लूट लेता है..
मन का सुकून…
दिल का चैन..
धड़कनों का संगीत….
और बदले में देता है….

कुछ
बदहवास-साँसें…
बेचैन-रातें….
बोझिल-पलकें…
क्योंकि…. प्रेम.. सिर्फ लुटेरा ….है !!”

*7.”राधा कृष्णा”(दोहावली)*

आया फागुन प्रीत का,राधा सा मन होय!
तन झूमे मधु मालती, संग श्याम जो होय!!

दिल ड्योढ़ी दोनो सजे,सजती गोकुल नारि!
रास रचाते गोविन्द,राधा रूप निहारि !!

छम छम नाचे राधिका,कान्हा आये द्वार !
अधरों पर धर बंसरी,अद्भुत रूप निहार!!

श्याम बाँसुरी प्रीत की ,भीगा गोकुल गाँव!
प्रेम रस पगी राधिके ,भूलीं अपना भान!!

राधे गगरी प्रीत की,जमुना तट भर लीनि !
कान्हा मारे कंकरी, सुधि-बुधि सब हरि लीनि!!

मन ही मन अनुराग है,मन ही मन में प्रीत.!
मन ही मन राधा हँसीं,बन बैठे मन मीत..!!

दृग उलझे मन बावरा, मन की अद्भुत-रीत.!.
मन ही तुमको हारता,मन से ही मन जीत..!!

मन पूजा मन आरती ,मन दीपक मन थाल!
मन में कान्हा रम रहे ,मैं तो हुई निहाल..!!

दर्प त्याग शीतल हुआ,समझा मन जग रीति!
प्रेम द्वार की पालकी, कान्हा जी की प्रीति!!

*8-हायकु और तांका कवितायें*

1-
लफ़्ज घुले
भावनायें मचली
कविता बही!

2-
ज़िन्दगी धूप
यायावर सा मन
ढूँढता चाँद!

3.
कागज कश्ती
लाद रहा.. ख़्वाहिशे
कोई पागल!

4-
मन पतंग
छूने को मचलती
ख्वाहिंशे चाँद!

5-
मन के झूले
कर्म के पेंग बढ़ा
नभ को छूले!

6-जीवन कैदी
भटक रही रूह
तन पिजंरे!

8-इन्द्रधनुषी
मन आकाश उगीं
यादें तुम्हारी!

“तांका”
1-
आदमी रेेल
जिन्दगीं दो पटरी
उम्मीदे भीड़!
बढ़ता चल,आगे
ख़्वाहिशों का स्टेशन !
2-
काटते वृक्ष
तड़पता पखेरू
ग्रीष्म के दिन
अरे! स्वार्थी मानव
कहाँ बनाये नीड़ !
3-
स्वप्न के बीज
उगाती कल्पनायें
नींद की कोख
उम्मीदों की कलियाँ
खिलें भोर गलियाँ!
4-
अन्तस जल
अकुलाता बादल
प्रीति उड़ेले
सिक्त हुआ जीवन
धरा-मेह मिलन!
5-
ख्वाब प्रतीक
कल्पनायें निमित्त
बाँचते नैन,
मधुर स्वप्न पलें,
रैन पलकों तलेे !

किरण मिश्रा
नोयडा

 

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