LOADING

Type to search

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

प्रेरणा गुप्ता कानपुर

Priti Surana 1 year ago
Share

इस बार रविवारीय केंद्रीय रचनाकार विशेषांक *सप्ताह का कवि* में प्रस्तुत हैं *प्रेरणा गुप्ता, कानपुर* का परिचय एवं रचनाएं। आप सभी से प्रतिक्रियाओं एवं समीक्षा की अपेक्षा है।

*प्रस्तुतकर्ता*
प्रीति समकित सुराना
मनोज जैन ‘मधुर’
ब्रजेश शर्मा ‘विफल

*परिचय*

नाम – प्रेरणा गुप्ता
माता – श्रीमती सत्या अग्रवाल
पिता – श्री जगदीश चंद्र अग्रवाल
पति – श्री आलोक गुप्ता
जन्म तिथि और स्थान – 5 फरवरी, राजस्थान
शिक्षा – स्नातक संगीत
कार्य क्षेत्र – संगीत , समाजसेवा , आध्यात्म और साहित्य-लेखन
विधा – लघुकथा एवं छंदमुक्त
प्रकाशित कृतियाँ – रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओंं में, वेब पर प्रकाशित एवं लघुकथा संग्रह में।
सम्मान व पुरस्कार – गायन मंच पर
संप्रति – स्वतंत्र
ईमेल – prernaomm@gmail.com
स्थाई निवास – कानपुर – यू पी

*आत्मकथ्य*

लेखन मेरी आत्मसंतुष्टि का माध्यम है। व्यर्थ की आपाधापी वाली जीवन शैली में लेखन वो माध्यम है जो मुझसे मुझे जोड़ने का प्रयास करता है। में अभी इस क्षेत्र में बिल्कुल नई हूँ किन्तु अपने मनोभावों को लिखने का प्रयास करते हुए विधा लघुकथा को सीखने और जानने में प्रयत्नशील हूँ।

*रचनाएँ*

*1.धुआँ*

विनोद के जाते ही, दीदी रसोईघर में घुस आईं | पटरे पर बैठी विमल तरोई सुधार रही थी, चूल्हे पे बटलोई चढ़ी हुई थी | समझ में नहीं आ रहा था कि बात कहाँ से शुरू करें, “तरोई कितनी ताज़ी है न |”

“हाँ दीदी, मौसम की नई तरोई पहली बार आई है, लेकिन इन्हें पसंद नहीं, इनके लिए आलू की सब्जी बनाऊँगी |”

बटलोई गरम हो चुकी थी, उसने सब्जी छौंकने के लिए उसमें घी डाल दिया |

“विमल, एक बात बता, तू कितनी मुरझा गयी है, शादी में कितनी खिली-खिली थी |

“ऐसी बात नहीं है दीदी |” घी में जीरा डालते हुए, उसने हँसने का उपक्रम किया |

“देख विमल, मुझसे कुछ भी छुपा नहीं है, सच-सच बता दे, विनोद तुझसे बोलता नहीं न |

तरोई छौंकने की छन्न के साथ, उसका घाव भी हरा हो उठा, वह सिर झुकाए बैठी रही |

“वह मेरा भाई जरूर है, पर तुझे जरा भी तकलीफ दी तो मैं उसके कान खींच लूँगी |”

अंदर भाप बनने के साथ सब्जी खदकने लगी थी, उसके अन्दर जमा हुआ सैलाब भी अब पिघलने लगा |

“कुछ बोलेगी नहीं तो मुझे पता कैसे चलेगा ?”

तरोई गलकर सिकुड़ने लगी थी और उसके अंदर भी कुछ सिकुड़ रहा था।

“बोल विमल बोल, तुझे मेरी कसम?”

तेजी से बनती भाप रुक न सकी, अपने साथ सब्जी के रसे को भी, छनछनाती हुई बाहर बहा लाई | दीदी ने जल्दी से बटलोई पर ढकी तश्तरी खोलने के लिए अपने हाथ बढ़ा दिए | उसकी पलकों में ठहरे हुए आँसू अब भरभरा कर बह निकले, वह काँपती आवाज में बोली, “मैं उन्हें पसंद नहीं |”

दीदी फट पडीं, “पसन्द नहीं ? तू क्या सब्जी भाजी है, जो पसन्द नहीं, तो उसने फेरे ही क्यों डाले |” कहती हुई वह अपनी जली उँगलियों को सहलाने लगीं |

बटलोई में सब्जी जलकर चिपक गयी थी और धुआँ चारों तरफ फैलने लगा था।

 

*2.चमगादड़*

अहा ! मजा आ गया | लगता है, आज फिर चमगादड़ घुस आया | चीख-पुकार मची हुई थी।

वो भी एक जमाना था, जब वह जानती भी न थी कि ‘डर’ नाम की चिड़िया होती क्या है ? अकेले यात्रा करना, अँधेरे में कहीं भी चले जाना |

विवाह के बाद ससुराल में सबकी डराती हुई आँखों, तेज आवाजों का सामना करते-करते, न जाने कब उसके अन्दर डर की चिड़िया ने बसेरा कर लिया था |
एक दिन, उसका पति तेज आवाज के साथ आँखें निकालकर उसे डरा-धमका रहा था। तभी, घर के बाहर पीपल के पेड़ से एक चमगादड़ उड़ता हुआ कमरे में आ घुसा और चारों ओर चक्कर काटता अपने जलवे दिखाने लगा | उसे सिर पर मँडराता हुआ देख पति की आँखें भयभीत होकर सिकुड़ गईं और वह दहशत से हाय-तौबा मचाने लगा | उसका ये हाल देखकर वह ख़ुशी से बोल पड़ी थी, “वाह ! एक इंसान को डराकर अपनी वीरता का प्रदर्शन करने चले थे, एक चमगादड़ भी न भगा पाए!”

फिर उसने चमगादड़ को खदेड़कर ही दम लिया था| मगर चमगादड़ के साथ, उसके अन्दर बसी, ‘डर वाली चिड़िया’ भी भाग निकली थी |

आज फिर चमगादड़ अपने जलवे दिखा रहा था, और वह अपना मुँह ढाँपे, खिलखिलाती हुई मन ही मन उसे धन्यवाद दे रही थी—‘हे चमगादड़ तू ऐसे ही आते रहियो और डराने वालों पर अपनी दहशत फैलाते रहियो |’

*3.चरैवेति-चरैवेति*

न जाने कब से लहराती-बलखाती, धारा बहती चली जा रही थी | जीवन के हर रंग उसने देखे थे, उन्हें अच्छी तरह से पहचाना था | अनगिनत उतार-चढाव उसने पार किये थे | हर मौसम के साथ उसे ताल-मेल बिठालना आ गया था | मस्त थी, खुश थी |

मगर अचानक बहते-बहते वह रो पड़ी, और बोली, “आखिर कब तक ऐसे बहती रहूँगी |” मन अवसाद से घिर आया | देखकर उसे, साथ बह रही सभी लहरें दुखी हो उठीं और पूछने लगीं, “तू तो इतनी मस्त-सी बहती है, अचानक तुझे हुआ क्या ?”

गला रुंध गया, काँपती आवाज में वह बोली, “बहुत थक गयी हूँ अब बहते-बहते | सर्र-सर्र बहती तीखी हवाओं के थपेड़े अब बर्दाश्त नहीं होते, तेज धूप की तपन जलाये देती है और चट्टानों से टकराकर नई दिशा की ओर बहना अब मेरे लिए बहुत मुश्किल हो गया है | मेरी ढलती उम्र भी अब मेरा साथ नहीं देती | आखिर कब तक यूँ ही बहती रहूँगी ?”

लहरों की आँखें नम हो आईं, वह उससे लिपट गयीं और प्यार करते हुए बोलीं, “तुझसे प्रेरित होकर तो हम सब तेरी राह पर चल पड़ी हैं | तू ऐसा सोचोगी तो हमारा क्या होगा ? हम हैं न तेरे साथ |”

वह चैतन्य हो उठी और आँसुओं को पोंछते हुए बोली, “न जाने क्यों यह क्षणिक विचार आ गया, पर मुझे तो बहते जाना है, जब तक सागर में जाकर न मिलूँ | कभी वाष्प बनकर, कभी बादलों में पानी की बूँद बन कर बरस जाना है | जीवन के अनन्त काल तक चलते जाना है |”

अब छोटी-बड़ी सभी लहरें उसे अपनी बाँहों में समेटे खिलखिलाती-लहराती-बलखाती गाते हुए बह चलीं, “चरैवेति-चरैवेति … चरैवेति-चरैवेति |”

4. *मेरे पापा पागल*

क्लास में घुसते ही बच्चों की प्यारी आवाज गूँज उठी, “गुड मॉर्निंग मैम |”

“गुड मॉर्निंग बच्चों |”

सभी बच्चे आ चुके थे, लेकिन धान्या नजर नहीं आ रही थी | गरिमा की निगाहें उसे ढूँढ रही थीं। वह एक दिन भी स्कूल आए बिना नहीं रह सकती थी।

यूँ तो उसे सभी बच्चे बहुत प्यारे थे, लेकिन पाँच साल की धान्या में न जाने ऐसी कौन-सी बात थी, जो उसे अपनी ओर खींचती थी |
“अच्छा बच्चों, जल्दी से अपनी-अपनी कलरिंग बुक निकालो। आज हम अम्ब्रेला में कलर करना सीखेंगे |”

तभी क्लास के दरवाजे पर “मे आई कम इन” कहती धान्या मुस्कुराती हुई प्रगट हो गयी |

“कहाँ थी धान्या ? तुम कल स्कूल क्यों नहीं आई ?”

“मैम, हम आपको बताएँ ? मेरे पापा पागल हो गये हैं पागल |”

“अरे! ये क्या कह रही हो तुम ?” गरिमा आश्चर्यचकित हो उठी |

“कल हमने उनसे स्कूल चलने के लिए कहा, तो वो हमसे बोले कि उन्हें स्कूल का रास्ता नहीं याद है, भूल गये थे।”

गरिमा हँस पड़ी | मगर अगले ही पल वह गम्भीर हो गयी, “नहीं धान्या बड़ों के लिए ऐसे नहीं बोलते।”

धान्या अनमनी हो उठी, “तो आप ही बताइए मैम, जब वो रोज हमें स्कूल छोड़ने आते हैं, तो फिर रास्ता कैसे भूल गये ?”

गरिमा सोच में पड़ गयी।

धान्या अभी भी उसका हाथ हिला-हिला पूछ रही थी, “बताइए न मैम, जो पागल होते हैं, वही भूलते हैं न ?

अनजाने में किया गया मजाक, कभी-कभी बच्चों के निश्छल मन में अविश्वास का बीज बनकर रोपित हो जाता है। “नहीं-नहीं मैं धान्या के मन में इस बीज को अंकुरित नहीं होने दूगीं।” बुदबुदाती हुई गरिमा ने फौरन उसके पापा को फोन लगाया।

*5..मायाजाल*

काली घटाएँ छा गयी थीं | “पियाउsss – पियाउsss” की आवाजों से जंगल गूँज उठा | रिमझिम बारिश की फुहारें पड़ने लगीं | मोर से अब रहा न गया और वह घनेरे वृछों के पास बनी नहर के किनारे अपने रंगबिरंगे सुंदर पखों को फैलाकर झूम-झूम कर नृत्य करने लगा | उसके पैरों की थिरकन के साथ उसकी आगे-पीछे होती नीली मखमली लम्बी गर्दन पर खूबसूरत कलगी भी लहराने लगी |
मुग्ध होकर मोरनियाँ उसे निहारने लगीं |
पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा, मानो कण-कण प्रेममय हो गया था | पूरा जंगल उनके प्रेम-प्रणय का गवाह था | प्रेम के इस अनोखे सौन्दर्य से वातावरण भी मन-मयूर हो उठा |
अचानक मोर के पैरों की गति मद्धिम पड़ने लगी, आँखें मुंदने लगीं, चोंच काँपने लगे और वह धरती पर जा गिरा | मोरनियाँ घबराकर बरसते पानी की बूंदों को अपनी चोंच में भरकर उसे पिलाने का प्रयास करने लगीं | कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक ये हुआ क्या ?
किसी शिकारी ने उसके पखों को पाने की लालसा में अपना मायाजाल फैला दिया था | जिसमें फँसकर मोर की इहलीला समाप्त हो गयी और मोरनियों के हृदय-विदारक क्रन्दन से जंगल काँप उठा |

*6.औकात*

मंदिर के सामने पहुँचते ही ड्राईवर ने गाड़ी रोक दी और फौरन उतर कर जल्दी से सेठ जी की तरफ का दरवाजा खोलकर, अदब से खड़ा हो गया | आगे बैठा, उनका नौकर भी भागकर फूल-माला की डलिया लिए, उनकी जी-हजूरी में आ खड़ा हुआ |
पूरे रुतबे के साथ वह अपनी छड़ी थामे गाड़ी से उतरे और मन्दिर की ओर बढ़ चले | तभी एक चौदह-पन्द्रह वर्ष का किशोर हाथ फैलाये, उनके सामने आ खड़ा हुआ और बोला, “बाबू, कुछ पैसे दे दो | दो दिन से कुछ खाया नहीं है | भगवान तुम्हारा भला करेगा |”

उन्हौने हिकारत भरी नजरों से उसे घूरा, वह गन्दे-फटेहाल कपड़ों में, मैले जटाजूट से बालों के साथ, बहती नाक को बार-बार अपनी बाहों में पोछता जा रहा था, जहाँ भिनभिनाती मक्खियों ने अपना साम्राज्य फैला रखा था | उसकी दयनीय आँखों में करुणा भी छलक रही थी | सीने पर उभरे कंकाल के नीचे, अन्दर को धँसा हुआ पेट उसकी गरीबी की दास्ताँ सुना रहा था |

सेठ जी नौकर पर बड़ी जोर से बरस पड़े, “अब्बे, स्साले सोता रहता है क्या ? लगाऊं दो छड़ी | रोक नहीं सकता था इसे ? दिन बरबाद कर दिया मनहूस ने |” और फिर किशोर की तरफ मुड़कर बोले, “भिखमंगा कहीं का |”

एक पल को उसका कृशकाय शरीर और भी सिकुड़ गया | मगर अचानक उसकी निस्तेज आँखें तेजी से चमक उठीं और वह बोल उठा, “ओए सेठ, भीख तो तू भी माँगता है |”

सेठ ने गुस्से से काँपते हुए अपनी छड़ी लहराई और बोला, “क्या कहा ब्बे ? तेरी ये मजाल ?”

“अरे सेठ, तू भगवान से मंदिर में भीख माँगने नहीं जाता तो और क्या करने जाता ? कहकर उसने जमीन पर पच्च से थूका, फिर उसकी ओर देखते हुए बोला, “भिखमंगा कहीं का” | इधर नौकर की आँखों में अब मुस्कुराहट तैर रही थी |

*7.मेरा रोबोट*

वह आँख मूँदकर लेटी ही थी कि तभी सात साल का केशु आ गया और उसके गाल पर पुच्ची देते हुए बोला, “दादी, तुम अभी से सो रही हो ? अभी तो सिर्फ सात बजे हैं।”

“सो नहीं रही बेटू, ऐसे ही लेट गयी हूँ ।” कहते हुए, उसने उसे अपनी बाहों में भर लिया |”

“अब उठ भी जाओ। कहानी नहीं सुनाओगी क्या ?”

“सुनाऊँगी न। बदन में जरा भी जान नहीं है | तू हाथ-पाँव दबा दे, तो कुछ ताकत आ जायेगी |”

“ठीक से खाती-पीती हो नहीं, इसीलिये |” कूदकर वह बगल में आ बैठा और अपने हाथों से हल्के-हल्के दबाने लगा |

“अरे, तेरे ताकत नहीं है क्या ? जरा जोर से दबा न | ठीक से तू भी खाता-पीता नहीं है, इसीलिए |”
“खाता तो हूँ | … … दादी सुनो, एक बात मेरे दिमाग में आई है |”

“हूँ, कौन सी बात ?”

“मेरा जमाना जब आयेगा, तब तुम्हारे जमाने से बहुत फरक होगा |”

“वो कैसे ?”

“मेरे जमाने में रोबोट हुआ करेंगे, बदन दबाने के लिए |”
“अच्छा ! तो अब समझ में आया कि हाथ इतने हल्के क्यों पड़ रहे हैं ? मालूम है ? रोबोट का दिमाग जब खराब हो जाता है तो वह बदन के बजाय गला भी दबा सकता है |”
“तुम्हें कैसे मालूम ?”

“अरे भाई, रोबोट एक मशीन ही तो है, कोई पुर्जा खराब हो गया तो कुछ भी कर दे, क्या पता ?”

“हम्म … |” उसके हाथ अब रुक गये थे और वह कुछ सोचने लगा |”

“लेकिन केशु एक बात बताऊँ, “मेरा रोबोट तो तू ही है, प्यारा-प्यारा-सा | मशीन वाला रोबोट कोई तेरे जैसा थोड़ी न दबाएगा, वो भी इतने प्यार से |”
अब केशु के हाथ जोर-जोर से दादी के हाथ-पाँव दबाने में लग गये |”

(प्रेरणा गुप्ता – कानपुर*
(स्वरचित एवं मौलिक रचनाएँ)

 

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *