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अंतरा शब्दशक्ति सप्ताह का कवि विशेषांक

अनिता मंदिलवार ‘सपना’ अम्बिकापुर

Priti Surana 1 year ago
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इस रविवार *सप्ताह का कवि विशेषांक* में प्रस्तुत हैं अम्बिकापुर से अनिता मंदिलवार जी का परिचय एवं रचनाएँ, आप सभी की प्रतिक्रिया और समीक्षा की अपेक्षा है।

प्रस्तुतकर्ता

*अंतरा -शब्दशक्ति*

 

*जीवन परिचय*
***********

रचनाकार का नाम – श्रीमती अनिता मंदिलवार
वर्तमान /स्थायी पता – संजीव कुमार सिन्हा जरहागढ़ शिव मंदिर के पास
अंबिकापुर सरगुजा छ.ग

शिक्षा- स्नातकोत्तर (वनस्पति शास्त्र, हिन्दी और अंग्रेजी साहित्य) बी.एड, पीजीडीसीए
जन्मतिथि – 04 फरवरी
व्यवसाय – व्याख्याता पंचायत
शासकीय हाई स्कूल असोला
अंबिकापुर सरगुजा छ.ग
प़काशन विवरण –
1) नवभारत, दैनिक भास्कर, लोकमत, अंबिकावाणी
समाचार पत्र में कविताओं लेख का प़काशन ।
2) स्वर मंजरी, सत्य ज्ञान समागम,, व्यंजना में कविताओं का प़काशन ।
सम्मान का विवरण –
1) जनपरिषद भोपाल द्वारा प़काशित ग़न्थ ‘लीडिंग लेडीज
ऑफ मध्यप़देश एण्ड छत्तीसगढ़ vol I. & vol II एवं
हू ‘ज’ हू मे जीवन परिचय का प़काशन ।
2) मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा आयोजित हिन्दी
निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार एवं नवभारत
मदसॆ डे प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार ।
3) नवभारत द्वारा quiz. प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार ।
4) दूरदर्शन से प्रसारित ‘भवदीय’ कार्यक्रम में सर्वश्रेषठ पत्र
लेखन का पुरस्कार ।
संस्थाओं से संबद्धता —
1) साहित्यिक समिति ‘व्यंग्यम’ की भूतपूर्व अध्यक्ष ।
2) वर्तमान में राष्ट्रीय कवि संगम जिला सरगुजा छ.ग. की
कार्यकारिणी सदस्य ।
3) समभाव महिला मंच अंबिकापुर की सदस्य ।
काव्य मंच/आकाशवाणी/दूरदर्शन/मंच पर यदि काव्य पाठ किया हो तो विवरण —
1) दूरदर्शन रायपुर दवारा कविता पाठ का प़सारण ।
2) आकाशवाणी अंबिकापुर से कविता, कहानी, नाटक,
रूपक का प़सारण ।
प्रसारित नाटकों का विवरण —
परिवर्तन, अंतहीन दर्द, मुझे इकरार करना था, मुहब्बत
के दीप, एक अजनबी, सज गए दिल के वीराने, कुन्दन,
पितृछाया, सुहाग की चूडिया और क्या कमी थी मुझमें
(समन्वित नाटक) ।
रूपकों का प्रसारण —
या देवी सर्वभूतेषू, आजादी के बाद:नारी कितनी आजाद,
माॅ ।
3) सरगुजा महोत्सव एवं रामगढ़ महोत्सव (शासकीय
आयोजन) में मंचीय काव्य पाठ ।

सम्मान. ; काव्य अमृत. सम्मान, हिन्दी सागर सम्मान

*आत्म-कथ्य*

मेरे विचार से एक स्त्री को इतना सबल होना चाहिए कि हर गलत बातों का विरोध कर सकें । ऐसा संभव हो नहीं पाता क्योंकि उसे जो संस्कार बचपन से दिए जाते हैं तुम त्याग की प्रतिमूर्ति हो, घर की इज्जत हो । ऐसे बहुत सारी बातें जो उसके मन में भर दिए जाते हैं । इन्हीं सब बातों से बस सबको जोड़ते जोड़ते कहीं से वह खुद टूटने लगती है उसे आभास नहीं होता न ही उसके अपनों को । जब उसे आभास होता है बहुत देर हो जाती है, और टूटती जाती है मन दरकने लगता है और रह जाती हैं उसकी खामोशियाँ साथ ही कतरे हुए पंख । जो न उड़ सकते हैं और न ही जुड़ सकते हैं । बस यूँ ही चलता रहता है सिलसिला जीवन का अविराम. !

*रचनाएँ*

*1.ग़ज़ल*

चाॅद तारे और सूरज को भी ढलते देखा ।
जब वक्त पड़ा मुझपे सबको बदलते देखा ।।

कभी फूलों पर कभी कांटों पर चलके देखा ।
कई इंसान को वक्त. के साथ बदलते देखा ।।

अगर सोचें तो इंसान की हकीकत क्या है ।
वक्त के दर पर हर चेहरे को बदलते देखा ।।

जलते मकानों को देख आगे न आया कोई ।
हमने सबकी जमीर को यहाँ बदलते देखा ।।

शराफ़त कभी नहीं छोड़ी हमने तो ‘सपना’।
इस दुनिया में सब कुछ हमने बदलते देखा ।।

*2.ग़ज़ल*

संगीत चुराकर झरनों का मस्त पवन गाता है ।
दिल की बस्ती में कैसा हलचल हुआ जाता है ।।

लहू रोता है यहाँ लेकर जब बहारों का सलाम ।
ख्वाब संवर कर तब हकीकत हुआ जाता है ।।

कह दो ये अँधेरों से अब वो होश में आ जाएँ ।
चढ़ते हुए सूरज सा अब रंग हुआ जाता है ।।

बढ़ रहा है हिज़ में यूं लम्हा-लम्हा इज़्तिराब ।
कैफ़ियत दिल की अदाओं से बयाॅ हुआ जाता है ।।

जिस मुकाम पर है अब ये जिन्दगी मेरी यहाँ ।
जबाॅ की हर लफ्ज़ अब बगावत हुआ जाता है ।।

रेत पर ताजमहल अब न बनाओ यहाँ दोस्तों ।
अपना था जो अब तक ‘सपना’ हुआ जाता है ।।

*3.दहलीज*

उसकी आँखें
जाने कहाँ देखती हैं
अपनी नम आँखों
से निहारती
आकाश का कोना-कोना
जाने क्या सोचती है
उड़ना चाहती है
पर पंख तैयार नहीं
आगे बढ़ना चाहती है
राहें तलाशती हैं
वह तोड़ना चाहती है
परम्पराओं की बेड़िया
थामना है उसे
क्षितिज का छोर
पर क्या पूरी होगी
उसकी आकांक्षाएँ
उसके सपने पूरे होंगे
या दहलीज पर
खड़ी रहेगी
यूँ ही हमेशा
और बाट जोहती रहेगी
मुक्ति के उस द्वार की
जो उसे ले जायेगी
दहलीज के उस पार …….!

*4.याद*

मुझे,
तुम याद आये
हां, तुम
बहुत याद आये,
जैसे उग आये हो
पत्थरों में
लाल पलाश
कि बंजर धरती में
खिले हो सूरजमुखी
कि मरूस्थल में
चली हो ठण्डी बयार….
हां तुम,
बहुत याद आये …..
कि पगडंडियों को
पारकर गाॅव जाना है
और देखना है
सुन्दर सपने
कि छोड़ने हैं स्मृति पटल पर
हाशिये
कि शहर, गाॅव या स्कूल
और बाजार के बाद भी
याद करना है तुम्हें
एक अनिवार्य काम
की तरह
सच. ! दोस्त
कितना कठिन है
तुम्हें याद करना …………

*5. कर्मपथ*

अगर गम भुलाना है तो
सबके हित का काम करो ।
पत्थर पर गुलाब खिलाना है तो
कुछ समय दूसरों के नाम करो।।1 ।।

जीवन में सुख चाहते हो तो
नेक काम बिना दाम करो ।
अंधेरों पर विजय पाना हो तो
मेहनत तुम सुबह शाम करो।। 2.।।

रोशनी बिखेरना हो चहुॅ ओर अगर
अपनी प्यारी नींद हराम करो ।
चाहते हो ‘सपना’ पूरी हो तुम्हारी
कर्मपथ पर डटे रहो, न आराम करो।।3।।

*6.आईना*

हाथ बढ़ाओ जरा और सँभाल लो हमें ।
गमों के दौर से बाहर निकाल लो हमें ।।

जिन्दगी यूँ ही तमाम बीत जायेगी यहाँ ।
ऑखों में अपने ख्वाब सा पाल लो हमें ।।

वक्त की गर्दिश में गुम हो न जायें कहीं ।
वक्त रहते ही थोड़ा सा खंगाल लो हमें ।।

यूँ दूर रहकर हमसे दूरियाॅ न बढ़ाओ ।
पास आकर तुम जरा देखभाल लो हमें ।।

कोई पत्थर के जैसा न समझो मुझको ।
नगीना समझ हाथों में डाल लो हमें ।।

देखो यहाँ रहे न कोई ‘सपना’ अधूरा ।
आईना हूँ देखकर जरा सँवार लो हमें ।।

*7.हमारा सपना*

देश देता हमको सब कुछ
हम भी तो अब देना सीखें ।
फूलों पर चलते थे अब तक
कांटों पर अब चलना सीखें ।।

सूरज हमको देता रोशनी
हवा देती हमें नवजीवन ।
सबका हित हो काम करें वो
कुछ तो ऐसा करना सीखें ।।

तापती गर्मी की धूप में
पेड़ हमें देते हैं छाया ।
हम तरूवर के जीवन से
परहित में कुछ करना सीखें ।।

पिछड़े हुए को आगे बढ़ायें
हम शिक्षा का दीप जलायें ।
हमारा अब हो एक ही सपना
भाव समरसता का जगाना सीखें ।।

*अनिता मंदिलवार “सपना”*

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