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अंतरा-शब्दशक्ति (अंक 4) अक्टूबर 2017

8 Comments

  1. M.d.s.ramalakshmi October 1, 2017

    बहुत सुंदर बधाई

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  2. Vikas Sharma "Daksh" October 1, 2017

    अति सुन्दर अंक ! सभी गुणीजनों को दीपावली की हार्दिक बधाई !

    विकास शर्मा ‘दक्ष’

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  3. shabd masihaa October 1, 2017

    बहुत सुन्दर संचयन रचनाओं का . सभी रचनाकारों सहित संपादक मंडल को बधाई . शुभकामनाएं .

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  4. Devendra soni October 1, 2017

    समीक्षा -वेब पत्रिका अंतरा का दीपावली अंक ।

    1 अक्टूबर को अपने समय पर प्रकाशित नियमित मासिक साहित्यिक वेब पत्रिका – अंतरा का दीपावली अंक अभी सरसरी तौर पर तुरन्त ही पढ़ा । आकर्षक आवरण के साथ लाजवाब और पठनीय साहित्य को समाहित / समर्पित अंक ,सम्पादक प्रीति सुराना के अकथ परिश्रम का संग्रहणीय दस्तावेज है । अपनी अनुकरणीय सम्पादकीय में प्रीति जी ने – ” संस्कारों में इंसानियत की शिक्षा देने की जो बात उठाई है , मैं उसका पक्षधर हूँ ।
    अंक में – कांता राय जी ने सितंबर अंक पर सम्यक और सटीक प्रकाश डाला है। मनोज ” मधुर ” , कल्पना मनोरमा , जगदीश पंकज , बृजनाथ श्रीवास्तव , ब्रजेश शर्मा ” विफल “, शब्द मसीहा के गीत / नवगीत विविधता लिए हुए हैं जो नई दिशा देते हैं । संजीव ” सलिल “, राजेंद्र अनेकांत के दोहों ने प्रभावित किया।
    संजय वर्मा, जयंति जैन, आर्विना गहलोत , जितेश गौतम , निरुपमा सिन्हा, शिरीन भावसार , संजय कुमार, सुरेखा अग्रवाल, अदिति रूसिया, मुकेश कुमार, रजनी कोठारी, विनोद तिवारी की कविताओं और कैलाश बिहारी, भारती वर्मा के हायकू बत्ताते हैं कि निरन्तर लेखन से सभी विधाओं में पारंगत हुआ जा सकता है।
    सुरेंद्र श्लेष, उर्मिला माधव, कृष्ण बक्षी, अनीता सिंह की गजलें प्रभावी हैं। अंक में कुमार गौरव और राजेंद्र श्रीवास्तव के बाल गीतों ने मन मोह लिया । बाल साहित्य को प्राथमिकता मिलना भी चाहिए। मुकेश दुबे, गोकुल सोनी और पिंकी परूथी की कहानियां समाज का आईना लगीं । कविता वर्मा, प्रदीप अरोरा, संजीव आहूजा, सीमा शिवहरे की लघुकथाएं जीवन की सच्चाई प्रकट करती हैं । विनोद जैन का – अनुयायी और मित्रों के विषय में अनुवाद जरूर पढ़ा जाना चाहिए।
    “” इस अंक का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण/आलेख – आशुतोष राणा जी का है। मेरा आग्रह है इसे जरूर पढ़ें यदि अपने लेखन को परिमार्जित करते रहना है तो मेरा सुझाव है हर अंक में आशुतोष राणा जी का लेख शामिल किया जाना चाहिए और जो मित्र फेसबुक पर हैं , उन्हें आशुतोष जी को फॉलो भी करना चाहिए। “””
    कांता राय जी ने – समंदर प्राण अकुलाया की समीक्षा करते हुए सही लिखा है – ऐसी कृतियाँ अलख जगाने का कार्य करती हैं । डॉ. प्रतिभा राठौड़ की कविताओं पर केंद्रित अंक -शब्द ध्वज की मेरी समीक्षा तो आप ही बताएं – कैसी लगी ।
    साक्षात्कार में वसुंधरा जी ने रीना पारीक जी से जो संवाद किया है वह प्रेरित करता है। यात्रा संस्मरण में कीर्ति वर्मा ने अपनी अंडमान यात्रा का जो वर्णन किया है, वह् ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का जीवंत चित्रण है।
    कुल मिलाकर – बाजारवाद या आर्थिक लाभ की परवाह किए बिना विशुद्ध साहित्य का सभी विधाओं में समावेश और प्रकाशन , लेखकों और पाठकों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है । ऐसे प्रयास न केवल सराहनीय अपितु प्रेरक भी होते हैं । शामिल रचनाकारों का भी यह दायित्व बनता है कि वे केवल अपनी रचनाओं को ही न देखें बल्कि सभी प्रकाशित रचनाएँ भी पढ़ें और उन पर अपनी राय व्यक्त करें। इसे आवश्यक तौर पर समझें । यह भी जान लें – कि किसी भी प्रकाशन को हम जरा से समय में ही पढ़ लेते हैं किंतु इसे हम तक पहुंचाने में सम्पादक और सहयोगियों का अथक परिश्रम लगता है। जिसके लिए मैं पुनः सम्पादक प्रीति जी , मनोज जी , ब्रजेश जी और अन्यान्य सहयोगियों का आभार व्यक्त करता हूँ तथा अपेक्षा व्यक्त करता हूँ कि हम सबके सतत सहयोग से “अंतरा ” आने वाले समय में प्रिंट रूप में भी उपलब्ध होगी।
    अंत में एक बात और अंतरा की पी डी एफ फाइल सशुल्क हो । बाजार में एक पी डी एफ पुस्तक पचास रुपये के शुक्ल देकर बनती है।
    – देवेंन्द्र सोनी , इटारसी।

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    1. धन्यवाद जी, सुंदर समीक्षा ।

  5. Varsha sharma October 2, 2017

    बहुत सुंदर दीपावली गीत विफल जी
    गणनायक भगवान विनायक की आराधना से आरम्भ होता हुआ समस्त वैभवों की स्वामिनी माता लक्ष्मी की स्तुति करता हुआ, मन को विभोर करने वाला सुंदर गीत ….
    न सिर्फ देव -स्तुति बल्कि वीर शहीद सैनिकों को श्रदांजलि प्रस्तुत की है ..सचमुच नमन और आभार है उन वीरों को जिनके बलिदानों के कारण हम सुकून से त्योहार मना पाते हैं ..
    अंतिम पंक्ति ” दीवाली का मतलब अंतर में धधकती आग रहे ” जैसे कविता का निचोड़ ही है ..गागर में सागर समा गया है जैसे …वाह ! बहुत ही सुंदर रचना ….

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  6. बेहतरीन प्रस्तुति

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  7. Anupam avinash October 11, 2017

    बेहद उम्दा प्रस्तुति आदरणीया…पत्रिका स्वयं बोलती है…गहरे पैठे मोतियों को तिनका तिनका सहेजती है..भाव प्रखर नित नव्य सबके हिय में बिखेरती है…बधाई आदरणीय प्रीति दीदी

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