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Uncategorized अंतरा शब्दशक्ति सप्ताह का कवि विशेषांक

रचना सक्सेना, इलाहाबाद

Priti Surana 1 year ago
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इस रविवार *सप्ताह का कवि विशेषांक* में प्रस्तुत है *रचना सक्सेना, इलाहाबाद* का परिचय एवं रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रिया एवं समीक्षा की प्रतीक्षा है।

प्रस्तुतकर्ता
*अंतरा-शब्दशक्ति*

*परिचय*
नाम –श्रीमती रचना सक्सेना
माता का नाम–स्व.श्रीमती सरोज
सक्सेना
पिता का नाम –श्री सूरज प्रसाद
सक्सेना
पति/पत्नि का नाम –श्री संजय सक्सेना
जन्मतिथि –27/5/1969
जन्म स्थान -बहराइच,उ०प्र०
शिक्षा—एम०बी०एड ,संगीत प्रभाकर
(सितार)
कार्यक्षेत्र –ग्रहणी
सामाजिक क्षेत्र
विधा -(गद्य,पद्य ) कविता ,कहानी, लघु
कथा
ईमेल– rachnasaxena13@gmail.com
ब्लॉग
मो. (यदि देना चाहें)7376290559
प्रकाशन –कई पत्र पत्रिकाओ मे
प्रकाशन
1- जे0 एम0डी0 पब्लिकेशन द्वारा —–

1-भारत के प्रतिभाशाली हिन्दी रचनाकार पुस्तक मे दो कविताऐ
2- भारत के प्रतिभाशाली हिन्दी
कवयित्रियां पुस्तक मे दो कविताऐ
3-काव्य अमृत पुस्तक मे दो कविताऐ

2-रंगोली पत्रिका लखीमपुर के हर एक अंक मे मेरी कविताओ का प्रकाशन, पंखुड़ी पत्रिका उत्तराखण्ड मे छपी मेरी कविता “अपनी प्रतिभा करो साकार’
3-रुहेलखण्ड प्रकाश हिन्दी साप्ताहिक बरेली,प्रतिक्षण टाइम्स बहराइच,कायस्थ रश्मि बरेली आदि मे रचनाओ का प्रकाशन,
कनाडा से निकलने वाली अमरजीत सिंह कूके की प्रत्रिका मे प्रकाशन
सम्मान –1 -साहित्य एवं सांस्कृतिक मंच (हिन्दी साहित्य शोध अकादमी,राजस्थान) द्वारा फेसबुक साहित्य पहेली क्रमाँक –9 मे सर्वश्रेष्ठ साहित्य सम्मान।
2-जे .एम.डी.पब्लिकेशन द्वारा कई बार
सम्मानित
अन्य उप्लब्धियाँ–
लेखन का उद्देश्य –शौक ,और हमारी सामाजिक और पारिवारिक समस्याओ से प्रभावित परिस्थितयाँ।

*आत्मकथ्य*
उत्तरप्रदेश के जिला बहराइच के काजीपुरा मोहल्ले मे 27/5/1969 मे जन्म लिया ।पिता सूरज प्रसाद सक्सेना गाँधी इण्टर कालेज बहराइच मे प्रधानाचार्य पद पर आसीत थे और माँ सरोज सक्सेना एक ग्रहणी थी ।पाँच बहन और एक भाई के बीच मै रचना सक्सेना दो बहन और एक भाई से छोटी हूँ।महाजनी शिशु मंदिर मे प्राथमिक शिक्षा,तारा महिला इण्टर कालेज से इण्टर और महिला महा विद्यालय से स्नाकोत्तर करके किसान डिग्री कालेज से एम.ए. और बी.एड की डिग्री प्राप्त की। कलात्मक और रचनात्मक कार्यो मे रूचि होने के कारण पेन्टिग,सिलाई कढ़ाई बुनाई, पाककला ,ग्रह सज्जा ,ब्यूटीशियन आदि सभी क्षेत्रो मे ज्ञान अर्जित किया और इन सभी को अपने शौक का हिस्सा बना लिया ।संगीत मे रूचि होने के कारण सितार मे प्रभाकर भी किया।
लेखन कार्य मे बचपन से ही रूचि रही ।नौ वर्ष की आयु मे पहली कविता लिखी ” फूल लगते है प्यारे प्यारे ” । घर मे माँ पिता तथा अन्य सभी सदस्यो द्वारा प्रोत्साहन देने के कारण कहानियो और कविताओ का लेखन जारी रहा ।धीरे धीरे रचनाओ और अनेक लेखो का प्रकाशन समाचार पत्रो मे भी होने लगा।
किन्तु 1997 मे संजय सक्सेना के साथ इलाहाबाद मे विवाह हो जाने के पश्चात घर की परिस्थिति और माहौल न मिलने के कारण लेखन कार्य पूर्णरूप से समाप्त हो गया।किन्तु 2015 मे एक बार फिर कविता लेखन के प्रति रूझान पैदा हुआ और तब से बराबर कविताओ का सृजन हो रहा है और अब करीब २५० कविताओ का सृजन हो चुका है ।गद्य में भी रूचि होने के कारण लघुकथा और कहानी लेखन मे भी लेखन कार्य जारी है ।

*रचनाएँ*

*1–घुट जाता है दम*

पीने से प्यास नही बुझती,
घुट जाती है दम,
उगलने से बुझती है आग,
पर जलते है हम।

किश्ती किस ओर चले,
सोचती हूँ जब मै,
उलझ जाती वे पतंगे,
खीचती जो डोर मै
हवाओ के रूख से ,
अपरिचित हूँ मै ,

भीग जाती है पलके,
न भीगते है हम
पीने से प्यास नही बुझती,
घुट जाता है दम।

कदमो को बढ़ने से मतलब,
चलती ही रहूँगी,
दोराहो पर भटकूँगी जबजब,
सभंलती ही रहूँगी,
लहरो को निहारती हुई
आगे बढ़ती हूँ मै,

बह जाता है काजल सब,
अचम्भित रह जाते हम,
पीने से प्यास नही बुझती,
घुट जाता है दम।

कशिश रह जाती है कोने मे,
और पड़ते है छाले,
जलन ऐसी जो न रोने से,
दाग दिखते है काले,
कमल ढ़ूढ़ने को प्रेम का,
छटपटाती हूँ मै,

अक्सर खुद को खो जाने से,
डर जाते है हम,
पीने से प्यास नही बुझती,
घुट जाता है दम।

*2-घर बेगाना हो गया*

पत्तियाँ सूखी और मौसम का बहाना हो गया,
आँचल भी पराया आज ,अब घर बेगाना हो गया।

महका था चमन उनका,फूल और काँटो से हिलमिल,
एक चुभोता था कभी,दूसरा महकाता था घुलमिल।
धूप सहकर छाँव बनना,बीता जमाना हो गया,
रूठ गई शाखाऐं अब तो ,घर बेगाना हो गया।

जिनके झुरमुट मे कभी,पक्षियो के नीड़ थे,
पथिको के तन से पसीना ,पोछते यह वृक्ष थे।
उनके ही अब ठाँव का ,देखो फसाना हो गया,
झूठ कहती आशाऐ अब तो,घर बेगाना हो गया।

किसी ने पैरो से रौंदा,कही धुँआ उठने लगा,
हवाओ ने भी तोड़कर ,इस तरह जमी पर पटका।
उनके ही अब गाँव का,देखो किनारा हो गया,
टूट गई रेखाऐ अब तो ,घर बेगाना हो गया।

ममता जिसको पालती थी स्नेह के पालना मे,
मन अपना मारती थी ,आस की सम्भावना मे।
उनके ही अब आँख का,देखो चुराना हो गया,
बदल गई भाषाऐ अब तो,घर बेगाना हो गया।

*3-ईमान*

घुटन बहुत है अँदर,
फिर भी नही मरता है ईमान।
बंद करके खिड़की और दरवाजे,
सुलगता है इमान।
घुटन बहुत है.अंदर,
फिर भी नही मरता है ईमान।

सच्चाई की तीलियो पर,
झूठ के मसाले,
स्वाद भर देते है तपिश.मे,
भूख के हवाले।
भरी.हुई तीलियों से,,माचिसो मे
सुलगता है इमान।
घुटन बहुत है अंदर,
फिर भी नही मरता है ईमान।

बर्फ के पत्थर भी न पिघलते,
बन जाते है शोले,
आग उगल देते है तपिश से,
ज्यों जलते है कोयले।
अंगार बने शोलो मे,माचिसो से,
सुलगता है इमान।
घुटन बहुत है अंदर,
फिर भी नही मरता है ईमान।

भावनाओ की चिता पर,
मचलती हुई लपटे,
धुंध भर देती है तपिश से,
धुंऐ की हरकते।
राख कर देती है ,माचिसो से,
सुलगता है इमान।
घुटन बहुत है अंदर,
फिर भी.नही मरता है ईमान।

*4-कंठ सुर*

तुम प्रकृति का कंठ सुर,
माँ भारती वीणा तार धुन,
तेरे उद् भव का सुरम्यगान,
अधरों मे भरता सकल प्राण।

उतर अंचल से अचला तक,
झर झर गिरना झरना बनना-
फिर नदियाँ-सा चंचल बन,
कल कल स्वर से जा मिलना।
‘अ’ प्रथम स्वर की अभिव्यक्ति,
चिर भाषा का सकल ज्ञान,
अधरों मे भरता सकल प्राण।

ममता देती वह कंठ स्वर,
व्याकुलता पलती उस आँचल।
वत्स सुरभि स्नेहिल ज्वर,
माँ शब्द ध्वनि प्रीति प्रांजल।
‘आ’ द्वितीय स्वर की अभिव्यक्ति,
मातृत्व भाव उपजा स्वर ज्ञान,
अधरो में भरता सकल प्राण।

क्षितिज द्वार पट खोल गगन,
रवि कलश लिये सतरंग चला।
स्वप्न जाल वृक्ष पात सघन,
नभ को नभचर घर छोड़ चला।
“इ ई’ तृतीय स्वर की अभिव्यक्ति,
चहक उठा विहंग स्वर ज्ञान,
अधरों मे भरता सकल प्राण।

शुष्क हृदय में टप टप करती,
वह दे जाती घनघोर बौछार।
छिड़ जाती मेंढक की टर्र टर्र,
झनकती झिंगुर की झंनकार।
“उ “चतुर्थ’ स्वर की अभिव्यक्ति,
और ऋ का अनोखा स्वर ज्ञान,
अधरों में भरता सकल प्राण।

आम्र वाटिका के अमृत फल,
बसंत दूतिका करती रसपान।
बसंत ऋतु के इस मौसम का,
न देता कोई चिर वरदान।
“ऊ”पंचम स्वर की अभिव्यक्ति,
कू कू कुहुक भाव स्वर ज्ञान,
अधरों मे भरता सकल प्राण।

*5-विरहणी*

हे नाथ ! तुम जब चले,
भ्रात भाभी को लिये।
पग तुम्हारे बढ़ रहे,
साथ, उनके साथ मे।
नैन मेरे ताकते,
दूर तक है झाकते।
वह छवि सिमट गई,
रूठते वे रास्ते।
मिलन की एक घड़ी,
लखन संग जो मिली।
बन्द पलको मे किये,
जी रही वह एक कली।
रूपवान ,रूपवति,
सप्तरंग ओढ़नी ।
कान्ति रितु परिधान से,
प्रकृति मन मोहिनी।
कुम्हार सी चाक बन,
चौदह वर्ष घूमती।
तन की माटी देह बन,
विरहणी उर्मी देखती।
चढ़ गई वह चाक पर,
सृजन दीप के लिये।
दो नैन की बाती बनी,
नीर से गीले किये।
प्रेम रस मे डूबकर,
विरहणी के दीपक जले।
छोड़कर जब से गये,
नीर न बहते बन्द हुऐ।
लौट रहे है आज वह,
भ्रात भाभी को लिये।
दीपमाला से सजा दो,
सूनी यह नागरी।
मेरी लौ से जला दो,
दीपक वह पावनी।
हर तरफ हो रोशनी,
प्रेम को बिखेरती।
स्वागत के थाल लिये,
राह मै हूं देखती
तम को भी यूं सजा दो,
दीप की छाया तले।
तक रहे है नैन उसके,
नीर काजल से सने।
दूर उनसे जब रही,
छाया तिमिर की रही।
वह छाया अब प्रिय है,
मेरे ही तले रही।
तन मेरा दीप बना,
नैन फिर बाती बने।
नीर से डूबकर ,
आत्म लौ जलती रही।
तिमिर मेरे दीप की ,
एक सखी छाया बनी।
कर आलिंगन सो गई,
ध्यान मग्न ही रही।
जल गये दीपक सभी,
हो गई फिर रोशनी।
सप्त स्वरो के राग से,
गीत गाती रागनी।
कुसुम सब महक उठे,
प्रेम की सरिता बही।
राम लखन सीय को,
देख आयोध्या रही।
ऑखो मे नीर लिये ,
ह्रदय मे पीर लिये।
माता को देख कर,
तीनो ने चरण छूये।
एक दृश्य मिलन का,
प्रेम के चमन का।
रात की रानी जगी,
रात से वह जा मिली।
दो दीपक एक होकर,
मिलन की घड़ी जगी।
प्रेम की रात अनोखी,
अब विरहणी को मिली।
अतुलित दीप से जली,
प्रेम लौ से बंधी।
रोशनी ही रोशनी,
दीपावली पावनी।

*6-पतिविहिना*

है नही अपराध जिसका,
दोष फिर भी मानती वह।
परम्परा की सीढ़ियो पर,
मान आँचल बाँधती वह।

त्याग कर प्रिय देह को,
अश्रु सावन हारती वह।
नेह नदिया प्रेम प्यासी ,
सागर डूबना जानती वह।

छोड़ बचपन उम्र जवानी,
टूटा दर्पण सवाँरती वह।
लिखती कहानी सब्र की,
प्यार करना जानती वह।

माँग का एक लाल रंग,
चूड़ी खनकाती हाथ वह।
त्याग कर सुहाग अपना,
दान करना जानती वह।

धवल धवलित धवलिमा,
सतरंग अतीत हारती वह।
सावन से भीगी हरित हिना,
सुहाग अपना मानती वह।

दोष न था दोषी फिर क्यो?
निःशब्द खड़ी एकांत वह।
संवरता दर्पण टूटा है क्यो?
पतिविहिना अबला है जो।

*7-कस्तूरी*

तू कंचनमृग,
“मै” मृग तृष्णा,ढ़ूढे तुझको,
वन वन वन।

तम की धुँधली माया मे,
सूरज की निद्रा छाया मे,
कूपो की गहरी काया मे,
मन भटक रहा कस्तूरी मे,
“मै” मृगतृष्णा ढ़ूढ़े तुझको,
घट घट घट।

कोई जलने मे कोई जलाने मे,
कोई मारने मे कोई पालने मे,
कोई चिंता मे कोई चिंतन मे,
मन भटक रहा कस्तूरी मे,
“मै” मृगतृष्णा ढ़ूढ़े तुझको,
कण कण कण।

विस्मित कितना यह चंचल मन,
हर्षाता न रूप यौवन न ही धन,
उठता धुँआ और अकेला पन,
मन भटक रहा कस्तूरी मे,
“मै’ मृगतृष्णा ढ़ूढे तुझको
जन जन जन।

वह कंचन मृग वह कस्तूरी,
भीतर है अपने यह मजबूरी,
वह निकट हमारे नही दूरी,
क्यो भटक रहा कस्तूरी मे,
“मै” मृगतृष्णा ढ़ूढ़े तूझको,
पल पल पल।

*रचना सक्सेना,इलाहाबाद*

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