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आत्मश्लाघा

Uncategorized अंतरा शब्दशक्ति कथा

आत्मश्लाघा

Priti Surana November 7, 2017
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बचपन के सहपाठी रिटायरमेंट के बाद एक साथ तीर्थ दर्शन हेतु जा रहे थे। रास्ते भर एस पी साहब और जज साहब अपने अपने रुतबे और दौलत का रुआब झाड़ते जा रहे थे। मास्टर दीनानाथ शांति के साथ दोनों मित्रों की अहंकार युक्त आत्मश्लाघा को मन ही मन मुस्कुराते हुये सुन रहे थे। बीच बीच में दोनों मित्र मास्टर साहब की ईमानदारी एवम लाचारी पर उपहास भी कर लेते किंतु मास्टर साहब हँसकर उसे ताल देते। अचानक बनारस में कहीं तीनों मित्रो का सारा सामान एवम बटुये जिसमें ए टी एम व पहचान पत्र इत्यादि रखे थे, सभी कुछ चोरी हो गये। गरीब मास्टर साहब चिंतित, विचलित और अत्यंत दुःखी थे तभी एस पी साहब ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं। यहां का डॉन मेरा परिचित है वी सभी चोरों को जानता होगा में अभी उसे फोन पर बताता हूँ वो अभी भागता हुआ यहां आएगा हमारी मदद को। एस पी ने कल्लू मियां को फोन लगाकर मदद करने को कहा तो उधर से उसने ठहाका लगाते हुये कहा एस पी साहब मैंने जब मजबूरी में चोरी की थी तो आपने ही बड़ी बड़ी चोरियों का इल्जाम मेरे सर मढ़कर मुझे जेल भिजवाया था और जिन्होंने सच में चोरी की थी उन्हें पैसे लेकर छोड़ दिया था। मेरे अपराधी बनने में आपका ही हाथ है। आज आप मुसीबत में हैं तो मुझे आपकी मजबूरी पर मजा आ रहा है। में आपकी कोई मदद नहीं करूंगा। जो कर सकते हो कर लो। वैसे भीबसप रिटायर हो गये हो अब आपकी क्या इज्जत। यह देख जज साहब ने अपना जलवा दिखाने की गरज से बनारस के बड़े उद्योगपति करोड़ीमल को फोन लगाकर अपनी मुसीबत बयां कर मदद करने कहा तो उसने भी टका से जवाब देते हुये कहा अब काहे के जज हो आप और कैसी मदद आपकी। आपने कौन सी मदद कर दी थी मेरी। पूरे पचास हजार की घूस लेकर मुझे छोड़ा था टेक्स चोरी के फर्जी इल्ज़ाम में। जाओ भुगतो अब। जज साहब भी अपना शर्मिंदा चेहरा झुकाकर चिंतित हो गये। मास्टर साहब अत्यंत दुखी हो जब ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे तभी एक चमचमाती काल बत्ती की सायरन युक्त लग्ज़री गाड़ी में अचानक ब्रेक लगा। थोड़ा रिवर्स होने के बाद गाड़ी इन तीनों के सामने आकर रुकी और उसमें से एक अत्यंत सभ्रांत ओजस्वी युवक उतरकर पास में आया तथा मास्टर दीनानाथ के झुककर पैर छूते हुये कहा अरे.. सर् आप ? यहां कब आये? और इस तरह उदास यहां क्यों खड़े हैं। मास्टर दीनानाथ अचंभित और असमंजस पूर्वक युवक से पूछते हैं कि मैंने आपको पहचाना नहीं। आप कौन हैं? युवक ने हँसकर कहा अरे सर मैं प्रशांत हूं प्रशांत। आपने मुझे पांचवी कक्षा में पढ़ाया था। याद आया कुछ? में बड़ा ही शरारती था और आप मुझे रोज डांटते और मुर्गा बनाकर सजा देते थे। याद आया न सर…? दीनानाथ ने कहा अरे हां हां तू वही बद्री का बेटा है न? युवक ने कहा जी ठीक पहचाना में वही हूं किन्तु सर आप यहां क्यों और इतने चिंतित क्यों हैं। मास्टर साहब ने प्रशांत को सारी बात बताई तो युवक ने कहा आप बिलकुल भी चिंतित न हों सर। अभी आप सब मेरे घर चलें। आपके आशीर्वाद से में यहां का कलेक्टर हूँ। अभी एस पी को कहकर आपके सामान की खोज करवाता हुन। तब तक आप सब मेरे मेहमान हैं।जब तक चाहें निश्चिंत होकर रहें।
यह सब देखकर एस पी सहब और जज साहब की नजरें शर्म से धरती पर गड गईं। आज उन्हें अपनी हैसियत में पहली बार हीनता का अहसास हुआ। इधर मास्टर दीनानाथ का सीना गर्व से चौड़ा हुआ जा रहा था। आज ईमान की धरोहर का सच्चा सम्मान जो हुआ था।

*”सहज’*

 

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