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3 Comments

  1. Vibha Rani Shrivastava December 5, 2017

    मेहनत को नमन

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  2. अंतरा शब्द शक्ति -6 , प्रेरक विविधताओं का सुखद एहसास
    किताबों की महत्ता को दर्शाता , आकर्षक आवरण युक्त अंतरा शब्दशक्ति वेब पत्रिका का दिसंबर अंक देखा । यह नियमित प्रकाशन का छटवा अंक है । इस वेब पत्रिका का मैं इसलिए भी कायल हूँ क्योंकि इसमें साहित्य की हर विधा को स्थान मिलता है। पाठक एक ही पत्रिका में सभी विधाओं की स्तरीय रचनाओं को पढ़ पाते हैं जो अन्यत्र कमोवेश ही मिलता है। कह सकता हूँ – इसके लिए चयन और सम्पादन एक स्तरीय प्रक्रिया से गुजरता है , जो सराहनीय तो है ही । एक विशेषता और जो मुझे प्रभावित करती है , वह यह है कि इसमें लेखकों के साथ भेदभाव नही होता । नए रचनाकारों को भी वही स्थान मिलता है जो स्थापित रचनाकारों को मिलता है।
    सम्पादक प्रीति सुराना ने इस अंक में – ” अपेक्षा और उपेक्षा ” को परिभाषित करते हुए मनन योग्य सम्पादकीय लिखी है। किसी भी पत्रिका का सम्पादकीय उसका दर्पण होता है। अपने सम्पादकीय में उन्होंने अपेक्षा को जरूरी बताया है और इसे सिद्ध भी किया है । अक्सर हम यह कह देते हैं कि दुःख से बचना है तो किसी से अपेक्षा ही मत रखो लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होता है ? इसे ही रेखांकित करता है यह सम्पादकीय आलेख।
    पाठकीय समीक्षा में पिंकी परूथी ने पिछले अंक का प्रभावी विश्लेषण किया है जो सोने में सुहागा जैसा है। पूरे अंक पर उनकी विहंगम दृष्टि गई है ।
    गीत – नवगीत खंड में – कैलाश सोनी का गीत नकलीपन, डॉ श्याम मनोहर का तुम्हारा मन , मनोज जैन का गीत – निर्वासित तुलसी और डॉ अशोक गौतम का गीत – मां अपनी अलग छाप छोड़ते हैं । मुक्तक में किशोर पारीक और श्वेता सिंह ने प्रभावित किया। नीता सक्सेना, राजेश पुरोहित,बंटी दुबे , सुनीता लुल्ला की गज़लों ने तो शिरीन भावसार की नज़्मों ने अंक का सौंदर्य बढ़ा दिया है।
    नीरज जैन की लघुकथा – अंधविश्वास , काले घोड़े की कलई खोलने का काम करती है। इसे पढ़कर तो आँखों पर बंधी पट्टी हटना ही चाहिए। मेरी भी लघुकथा है इसमें जो रक्तदान के लिए प्रेरित करती है। मालती महावर की – आत्म विस्मृति , उपदेशों पर प्रहार कर स्वयं में सुधार की जरूरत बताती है। राजीव कुमार की लघुकथा – परिचय , स्वाभिमानी व्यक्तित्व को ठेस पहुँचाती एक नालायक बेटे की कहानी है।
    जयराम जय , कुमार रविंन्द्र के दोहे और पूनम राजेश तिवारी , नीरजा मेहता के हाइकू सार्थक हैं । नयी कविता में -प्रिया वर्मा, राकेश धर द्विवेदी , आंनद कुमार राय, मीनाक्षी सुकुमारन, अदिति रूसिया, अजय जैन की पकड़ विविधतायुक्त संदेश देती हैं । मुकेश दुबे की कहानी – काश ! न पाला होता तोता …इंसानियत और प्यार की मधुरिम कहानी है।
    अश्वनी कुमार चौबे जी ने जो कहानी – “एक चुटकी जहर रोजाना ” लिखी है , क्या वह उनकी स्वरचित कहानी है ? क्योंकि इसे मैं पहले भी कई बार पढ़ चुका हूँ। यदि स्वरचित है तो उन्हें बधाई अन्यथा खेद प्रकट कर संकलित लिखें । अंतरा से भी आग्रह है कि स्वरचित का विशेष ध्यान रखे। यह आक्षेप नही है पर स्पष्टीकरण जरूरी लगता है मुझे। कीर्ति वर्मा की बाल कहानी भी पुरानी बोध कथा का नया रूप है। राजेंद्र श्रीवास्तव की बाल कहानी – साथ साथ ,संगति के असर का सटीक चित्रण करती है। बाल कविता में – राज श्री पांडे की – छोटा सा ये दिल मेरा है , बचपन की यादों को ताजा करती है। नन्ही कलम में सुहानी रूसिया ने परिवार की सुंदर अभिव्यक्ति की है।
    सुधा शर्मा का – वर्तमान परिदृश्य में वैवाहिक सम्बन्धों की बुनियाद ,तथ्यगत महत्वपूर्ण आलेख है।बिंदुवार विवेचना लेख को प्रभावी बनाती है। मुकेश शर्मा का – मेरा भारत महान ,व्यंग्य पुट लिए , समाज में व्याप्त कुरूतियों पर प्रहार करता है।
    डॉ. अर्पण जैन ” अविचल ” का कश्मीर की वादियों पर लिखा बेहतरीन प्रसंग है। ” वादी से रिश्ता,प्रेम का कहवा ” ने सच में मन को झंझोड़ दिया क्योंकि यदि इसे पढ़कर मन आल्हादित हुआ तो कहीं विचलित भी हुआ। अपने संस्मरण में उनका यह कहना – ” बहरहाल वादी में सिमटी हुई ज़ाफ़रान की खुशबू अभी हिंदुस्तान के दिल तक नही पहुंच पाई। ” विचलित कर ग्लानिबोध तो कराती ही है। अंतरा के ही नही बल्कि हर पाठक को इस संस्मरण को पढ़ना चाहिए । अर्पण कुशल पत्रकार के साथ बेहद संवेदनशील इंसान भी लगे मुझे , हालांकि मेरी उनसे व्यक्तिगत मुलाकात नही पर लेखन अपना परिचय खुद ही देता है। पत्रकार शाह एयाज की कश्मीर पर रिपोर्ताज भी पठनीय है।
    ईरानी कवि – साबिद हका की रचनाओं का अनुवाद गीत चतुर्वेदी जी ने किया है जो प्रेरक है। यह सोचने पर विवश करता है।
    कुशल समीक्षक और अध्येता ब्रजेश शर्मा “विफल” का साक्षात्कार , पिंकी परूथी ने लिया है। पिंकी स्वयं परिपक्व लेखिका हैं । अपनी भूमिका में पिंकी जी ने सही लिखा है -ब्रजेश जी का सामान्य ज्ञान, व्याकरण ज्ञान और विविध विधाओं का ज्ञान असीमित है । मैं भी इस कथन से सहमत हूँ । इस साक्षात्कार में विभिन्न बिंदुओं पर लम्बी बातचीत हुई है जो प्रेरक और उत्साहवर्धक तो है ही , साथ ही अनुकरणीय भी है। इस साक्षात्कार को पूरा समय देना होगा । मेरी नजर में ब्रजेश जी सफल साहित्यकार होते हुए भी स्वयं को विफल लिखते हैं ,यही उनके व्यक्तित्व की खासियत भी है।
    पुस्तक समीक्षा में इस बार ” -कस्तूरी की तलाश ” पर चर्चा की गई है। कुल मिलाकर संग्रहणीय अंक है – अंतरा शब्दशक्ति – 6 . बस त्रुटियों और स्वलेखन का ध्यान रखना जरूरी लगता है।
    – देवेंन्द्र सोनी ,इटारसी।

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  3. virendra jain December 7, 2017

    श्री राजेंद्र श्रीवास्तव जी के कारण यह अंक और यह साइट देखने पढ़ने मिली . सराहनीय अंक है .श्री राजेंद्र श्रीवास्तव जी की कहानी बहुत अच्छी लगी . शेष अंक भी बेहतर है .
    बधाई

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