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Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

गणतंत्र ‘ओजस्वी’ आगरा

Priti Surana 11 months ago
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इस बार *सप्ताह का कवि विशेषांक* में केंद्रीय रचनाकार के रूप में प्रस्तुत हैं, अपने जन्मदिन पर विशेष तौर पर अपनी रचनाओं के साथ *गणतंत्र ओजस्वी,आगरा* से। गणतंत्र जी के *दीर्घायु, स्वस्थ एवं प्रसन्नता* की शुभकामनाओं के साथ आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता
*अंतरा-शब्दशक्ति*

*परिचय*
************
नाम -गणतंत्र जैन “ओजस्वी”*
जन्मतिथि    –   26/01/1981
पिता           – श्री सुरेन्द्रकुमार जैन
माता           – श्रीमती नीरा जैन
पत्नी           – प्रियंका जैन
पुत्र              – मार्मिक जैन
पुत्री             – अन्तरा जैन
जन्म स्थान    – खरगापुर, जिला – टीकमगढ़ (म.प्र.)
शिक्षा – शास्त्री, शिक्षा शास्त्री ( बी.एड.), एम. ए., एम. एड., एल.एल. बी., नेट
अभिरुचि – लेखन, संचालन, पठन – पाठन
सम्प्रति – स. अध्यापक, (हिन्दी-संस्कृत), एम. डी. जैन इण्टर कॉलेज, हरीपर्वत, आगरा
*साहित्यिक गतिविधियां* – अनेक संस्थाओं में सदस्य, पत्रिकाओं में स्तम्भकार, राष्ट्रीय सेमिनार में सहभागिता एवं धार्मिक कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका |
*उपलब्धियां* – “अनवरत” साझा काव्य संकलन पर पोएट्री बुक बाजार, लखनऊ द्वारा *काव्य कृष्ण सम्मान”
लोकजंग, स्टोरीमिरर, हिन्दी.कॉम आदि अनेक पत्र पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन, मंचों पर कविता पाठ, कवि सम्मेलनों का संयोजन / आयोजन, आकाशवाणी एवं राष्ट्रीय चैनल पर वार्ता, सफल संचालन, अनेक सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित |
“ध्रुवधाम” मासिक पत्रिका का ४ वर्ष तक सफल प्रबन्ध सम्पादन, अनेक पुस्तकों का सम्पादन |
“पं. हरिमोहन भट्ट ” फकीर” की गजलों का प्रकाशन |
“ओजस्वी मंच” एवं ध्रुवधाम मीडिया की स्थापना  कर अनेक युवाओं को मंच एवं प्रतिभा प्रदर्शन के अवसर प्रदान करना |
पता – 1086, EWS जैन मन्दिर के पीछे, सेक्टर – 7, आवास विकास कॉलोनी, आगरा (उ.प्र.) – 282007
मो. –  09457945333
E-mail-
gantantraojaswi@gmail.com
लेखन का उद्देश्य – *मन के सोये विचारों को कागज पर उकेर कर नये विचारों का आवागमन स्वयं को समझने का सच्चा और अच्छा साधन है..!!*

*आत्मकथ्य*
—————-
जीवन की अनेक विषमताओं से परेशान मन को जब कहीं शांति नहीं मिलती है तब वह किसी एक ऐसे स्थान की तलाश में भटकता है जहां वह अपने विचार प्रस्तुत कर सके, व्यक्त कर सके, बोल सके, समझ सके, समझा सके, असफलताओं से पार एकान्त अपना सके… लेकिन जगत की झंझावाती प्रवृत्ति उसे उलझाना चाहती है.. रोकना चाहती है… मैं भी इसका शिकार बना….. और सर्वस्व होम करने लगा.. भविष्य को संवारने में वर्तमान बिगाड़ने लगा.. स्वयं भी परेशान हुआ..और दूसरे लोगों को भी परेशान करता रहा लेकिन इसी बीच धार्मिक साधना के साथ उपाय के रूप में साहित्य पठन पाठन और साहित्य की साधना से बढ़िया कोई ना तो विकल्प दिखा और ना ही प्रकल्प| इसी दौरान गैर सरकारी क्षेत्र में सेवा करते करते बौद्धिक स्तर पर काव्यरचना का मन बनाया और सर्वप्रथम 2005 में बांसवाड़ा राजस्थान में प्रथम मंचीय प्रथम मंचीय रचना प्रस्तुत की तब से लेकर अनवरत 2012 तक मंच पर रचनाएं पढ़ता रहा फिर एक दिन *वागर्थ* ग्रुप में आदरणीय मनोज जी ने मुझे जोड़ा, जिसके बाद एक नई ऊर्जा सृजन की ओर लगना शुरू हुई, उसके बाद *अन्तरा*, *अन्तर्मन* *उजास* *किस्सा कोताह* जैसे ग्रुपों में अनेक समृद्ध रचनाकारों के साथ परिचय, समालोचना का एक शिक्षाप्रद सानिध्य मिला और यह कहने में मुझे बिल्कुल भी गुरेज नहीं की रचनाधर्मिता अगर कोई है तो वह लेखन ही है | मंच पर आपको तालियां तो मिल सकती हैं लेकिन आत्म संतुष्टि नहीं , आत्म संतुष्टि के लिए सृजन बहुत बड़ा साधन है इसीलिए मैं छोटा सा रचनाकार आपके बीच अपने सर्जन को प्रस्तुत कर रहा हूँ |
हमें आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि आप सभी कठिन से कठिन समीक्षा, प्यार, दुलार और आशीर्वाद जरूर देंगे…

नन्हा सृजनकार
गणतंत्र ओजस्वी

*रचनाएं*
*************
*1.मौजो ! अपनी हद में रहना !*

कायरता से कंप जाते हैं,
जब जी चाहे छल जाते हैं,
अनचाहे अनजाने अपने,
आस्तीन में पल जाते हैं |
कुचला जाता फन ऐसों का,
अपने फन को देखे रखना !

सागर को कमजोर न समझो,
अन्धेरों को राज न समझो,
पतवारों को लहरा लहरा,
अपने बल का ठौर न समझो,
पाला जिसने, छलो न उसको,
उसके बिन कुछ छाप न रहना !

पौरुष जब हुंकारें भरता,
शिव का ताण्डव नर्तन चलता,
भूधर के तब शिखर डोलते,
दुन्दुभि डम डम डमरू बजता,
हो लो दो दो हाथ समर में,
जीवन शेष बचाकर रखना !!

गगन गर्जना घोर करेगा,
चपला से मन मोर डरेगा,
मूसलधारा तरल बाण से,
इन्द्रधनुष मन में निकलेगा,
आकर्षण के आकर्षण को,
अपने पास सम्हाले रखना !!

*2.अधूरी कविता*
———————–

आज कुछ लिखा नहीं,
आज कुछ पढ़ा नहीं,
आज को जो पढ़ सके,
वो आजतक मिला नहीं ||

हर गली हर गाँव में
बरगदों की छाँव में,
घूमती नदी के बीच,
चल रही उस नाव में,
धार को जो काट दे,
वो चाप तो मिला नहीं ||

सब सुनें कहानियाँ,
प्यार में कुर्बानियाँ,
राह राह जुबाँ पै हों,
दर्द की निशानियाँ,
देश को जगा सकें,
वो तेग तो मिला नहीं |

उड़ा सके जो धूल को,
पनाह दे जो फूल को,
कष्ट में भी खुश रहे,
मसल सके जो शूल को |
उड़ान भर गगन चले,
पवन कोई मिला नहीं ||

साथ छोड़ बढ़ चले,
सुत सुता हृदय बसा,
त्याग सुख की सेज को
राष्ट्र-प्रेम मन बसा ||
हों समर्थ स्वधर्म में
*सामर्थ्य* वो मिला नहीं ||

*3.मान*
———

ओ अन्तस् के मान हठीले
विष-बेलों से हो जहरीले..
दुनिया भर के पाप भरे औ’
चेहरे से हो बड़े सजीले….
ओ अन्तस् के ….

दिग दिगन्त ने पूजा तुमको
मर्त्य लोक के भगवन् तुम हो
कोई कैसे आंख चुरा ले..
आंख झुकाने वाले तुम हो…
हिमपातों के बीच कहां से.
बचेे रह गये तुम रेतीले…
ओ अन्तस् के …

प्यारे प्यारे बोल मधुर से,
कायल करते जगतीतल को
जिसपर पड़ती छाया तेरी
होश नहीं रहता फिर उसको
कब तक दोगे छलनायें ये..
कुछ तो सोचो छैल – छबीले..
ओ अन्तस् ……

कहीं प्रतिष्ठा बनती जाती,
कहीं दूरियां घटती जाती..
बिन प्रकाश के तम में छाया
देखो कैसे बढ़ती जाती |
देह बिना..कैसे कद काठी..
बढ़ा, चल दिये ओ गर्वीले..
ओ अन्तस् ……

*4.राहें.!!*
——-

टेढ़ी-मेढ़ी…
राहें..
संघर्ष…हौंसला…
बल…दम…सब
परखती हैं..
फिर देती हैं…मंजिलें…
आदमी को..मजबूत बनाकर..
पर..
सीधी..सपाट….राहें..
मंजिल के पास
..नहीं..बनने देती..महान..
नहीं बनाने देती..हौंसला..
बल..मजबूती..
इसलिये….चलो..
हमेशा..
टेढ़ी..मेढ़ी..राहें..
बने रहोगे…दीर्घकाल तक..
सच्चे…राही..!!!

*5.पड़ाव*
———–
ये उम्र का पड़ाव है,
चक्र का घुमाव है,
हारकर न बैठना,
बढ़े चलो बढ़े चलो |

प्रौढ़ता तो छाप है,
वक्त के घुमाव की,
रीतियाँ चले सभी,
लोक के चलाव की |
वक्त की तरंग में,
बहे चलो बहे चलो ||

केश संग रंग ढंग
बदल रहे हैं अपने ही,
आ रहे सम्हालने,
फूल पत्ते अपने ही |
बाग उनको सौंप कर
बढ़े चलो बढ़े चलो ||

राह से कदम मिला,
चल रहा है सिलसिला,
उम्र के इस चक्र में न
खुद को एक पल भुला,
बदल रहे समाज में,
बदल चलो बदल चलो ||

*6.खुद को धोखा कितनी बार !!*

दम भरते सब भले दिनों में,
बेदम बुरे दिनों का भार |
कितना झूठ पला अंचल में,
छला स्वयं को कितनी बार !!!

सहनशक्ति की सीमा ओछी,
सब धोखों का है व्यापार |
अपने सपने सपने – से हैं,
बाकी के मिथ्या – संसार ||
दौड़ रहा जग इसी स्वार्थ में,
खुद को धोखा कितनी बार !!

चाँद चाँदनी नहीं छोड़ता,
घट-बड़ कर भी चमक रहा,
ऊपर ऊँची लहरें कितनी
सागर भीतर शान्त रहा |
भावों का सागर हममें भी,
धीरज छोड़े कितनी बार..!!

मुश्किल किसको कहो लुभाती,
बरवस जीवन में आ जातीं |
दूर तुरत हम करना चाहें,
समय बिना वे दूर न जातीं ||
कितनी कोशिश हम करते हैं,
होते नहीं तनिक भी पार !!

समय काल में धैर्य साथ हो,
सब अपने अपनों के साथ हो |
हो जाती है जीत समर में,
सत्य पक्ष का सदा साथ हो ||
झूठ नहीं टिकता है किंचित्
चाहे बोलो सौ – सौ बार !!!

*7.प्यारा हिन्दुस्तान लिखूँ…*
————————————

न राग लिखूँ, न प्रेम लिखूँ,
न मैं वियोग के गान लिखूँ..
लिख सकूँ अगर मैं कुछ थोड़ा,
तो प्यारा *हिन्दुस्तान* लिखूँ ||

जिस तरह वेद सब गाते हैं,
गीता कुरान तुलसी वाणी,
माथे का नूर बनी मीरा,
ज्यों बुद्ध सूर सन्मति-वाणी ||
आडम्बर को फेंक कबीरा,
भूषण विलास रसखान लिखूँ ||
लिख सकूँ ……..

जिसका रक्षक है हिमपर्वत,
गोदी में गंगा बहती है |
जन-गण के हृदयाँगन में,
पावनता पूरी रहती है ||
जो द्रोह कपट से रहे दूर,
निश्छल मन का सम्मान लिखूँ..
लिख सकूँ…..

जिसकी पुण्यकथा पढ-सुन
बालक जवान होते हँसकर,
ले बरछी ढाल कृपाण असि,
हुँकार भरे पौरुष भरकर ||
जो शीष कटा रक्षा करते हैं,
उनका बस यशगान लिखूँ..
लिख सकूँ……

तन-मन से जो बड़ी सरल
या प्रेम लता – सी लगती हैं
आ जाये समय तो वो ज्वाला
शत्रू पर भारी पढ़ती हैं |
हैं जहाँ बेटियाँ सरल-कठिन,
हम सबका हैं अभिमान लिखूँ..
लिख सकूँ……

है नहीं भेद की कुटिल चाल,
सब आपस में मिलकर रहते,
जीवन विकास के हर पथ पर,
सब साथी बनकर ही चलते,
आफत कांपे डर से उनके,
रे!’ओजस्वी’ गुणगान लिखूँ…
लिख सकूँ….

*गणतंत्र ओजस्वी*

2 Comments

  1. Pinky Paruthy Anamika January 26, 2018

    अंतरा शब्द शक्ति परिवार को मेरा सादर अभिवादन
    आज के उत्सव मूर्ति श्री गणतंत्र ओजस्वी जी को पहले तो जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ दूसरी केंद्रीय रचनाकार विशेषांक में प्रस्तुत होने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ
    आपका परिचय, साहित्यिक गतिविधियाँ, उपलब्धियाँ, संपादन, प्रकाशन, मंच, लेखन का उद्देश्य, आत्मकथ्य, और रचनाएँ बहुत सहज, सरल, सार्थक अभिव्यक्ति लगी। साहित्यकार समाज के गुण दोषों को काव्य या गद्य में समाहित कर, दशा और दिशा से अवगत कराता है, आप दोनों ही तरह के सृजन में सफल रहे हैं, आप निरंतर नई ऊंचाई छूएँ, आपका साहित्य धरोहर बने, माँ सरस्वती का आशीर्वाद सदा बना रहे, स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें।
    *****************************
    पिंकी परुथी “अनामिका”

    Reply
  2. राधा गोयल February 4, 2018

    वाह-वाह वाह-वाह वाह-वाह वाह-वाह वाह-वाह वाह-वाह वाह-वाह वाह-वाह गणतन्त्र
    तुम्हारी ओजस्वी रचनाएँ विश्व को प्रकाशित करें

    Reply

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