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Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

डॉ. सरिता नारायण, पूना

Priti Surana 10 months ago
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इस रविवार सप्ताह का कवि विशेषांक में प्रस्तुत हैं पूना से डॉ सरिता नारायण का परिचय एवं रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता

अन्तरा-शब्दशक्ति

परिचय

नाम – सरिता नारायण
पिता – डा बिनोद नारायण
माता – शशि प्रभा नारायण
पति – डा मधु रंजन
पता –
वाघेली ,,, पूने,,,महाराष्ट्र
४१२२०७

आत्मकथ्य

इक ज्वाला जो फूटता है , अन्दर ही अन्दर कुछ ना कुछ तहस नहस करने की शक्ति रखता है , कुछ शायद कर भी देता है , पर धरती की भी एक सीमा होती है सहने और बर्दाश्त करने की,और धरती रास्ता देती है, उस लावा को बाहर निकलने का , ख़ुद फट कर,लावा फूटफूट कर बाहर निकलने लगता है , थोड़ी राहत होती है ,कभी कभी बहुत विस्फोटक भी हो जाती है वो लावा,पर कभी शान्त धीरे धीरे रीसती रहती है,बहती रहती है , निरन्तर ।।

ठीक उसी तरह का होता है एक कवि का मन ,भावो का ज्वार भाटा,उमड़ते -घुमडते भाव,बाहर निकलने को छटपटाते रहते है, शब्दों का सहारा लेना पड़ता है, पर पूरे मन को सच्चाई के साथ शब्दो का जामा पहनाना आसन भी नहीं होता, कुछ ना कुछ बेचैनी रह ही जाती है, कुछ ना कुछ अन्दर रह ही जाता है जो उसे कुछ और लिखने को सदा प्रेरित करता रहता है, और इस तरह जन्म लेता है एक *कवि* ।।

अगर अपने बारे में कहूँ तो मै पेशे से चिकित्सक हूँ, कुछ पेशे की माँग और कुछ घुमक्कड़ प्रवृति ने देश के विभिन्न हिस्से और विदेश में काम करने का मौक़ा दिया । मानवीय वेदना और संवेदनाओं को सभी वर्गों और परिस्थितियों में एक सा पाया। लोगों की पीड़ा को बहुत ही नज़दीक से महसूस किया, पेशा ही कुछ ऐसा रहा । अवचेतन मन में, अन्दर ही अन्दर एक घुटन पलती रही जो हर हाल में बाहर निकलने को छटपटाती रही, और तब क़लम का सहारा लिया। अभिव्यक्त होने, या यूँ कहूँ, अपने अंतस को शान्त करने, जो अन्दर अटका पड़ा था, उसे परोस दिया पर ये सब क्या इतना आसान था ? *मुक्त* होना चाहती थी क्या मुक्ति मिल पायी ?

अपनी रचनाओं को एक पुस्तक का रूप दिया *अनूगूंज*, जिसे लोगों ने भरपूर सराहा, सदा से ही बेहद ही सरल भाषा का उपयोग किया, सरल भाषा में लिखा काव्य सीधे दिल तक उतर जाता है, ऐसा मेरा मानना है ।
समय समय पर कवि सम्मेलनों में भाग लिया, लोगों का भरपूर प्यार मिला, *शब्ध सुगंध* द्वारा साहित्यिक सेवाओं के लिये सम्मान से अलंकृत मैं,
आप सबो के बीच अपनी सेवाओं को ले कर उपस्थित हूँ ।
हिन्दी रचनाकारों को प्रेरित करने का आपलोगो का प्रयास सराहनीय है, मेरी शुभकामनायें सदा आप सबो के साथ बनी रहेगी ।।

ख़ुशी उड़ती है, ग़म ठहरा हुआ सा,
फुलझड़ी है ख़ुशी, ग़म सुलगती बाती,
ख़ुशी दिखावा, एक छलावा,
ग़म सच्ची, गहरी ।
ढका हुआ सा ।
ख़ुशियों के चादर में लिपटा हुआ सा ।

डा सरिता नारायण –
————-सरि——-
(१)

मन

मन , तू क्यूँ मनमानी करता है ?
न मेरी सुनता है न किसी और की
न किसी तर्क वितर्क को मानता है
न नफ़ा देखता है , न नुक़सान देखता है
मन तुम्हें दबाती हूँ , तो सिसकता है , गिड़गिड़ाता है ,
न रस्मों रिवाज से मतलब ,
न दुनियादारी की चिन्ता ,
ये मन ही तो है जो सारे उल्टे सीधे काम करवाता है ।।
इस मन मैं क्या करूँ , जो अपना नहीं उसे अपना मान बैठता है ।
इसे कितना भी दबातीहूँ ,
बस मनमानी करता है ,
ये मेरा बावरा मन अपनी बातें मनवा ही लेता है ।
तिनका तिनका उखड़ रहा है ,
पुर्ज़ा पुर्ज़ा बिखर रहा है ,
मन है की तरह तरह के सपने बुन रहा है ।।
न जाने किस किस को याद कर
बस यूँ ही तड़पता है , ये मेरा बावरा मन ।
बहुत मनमानी करता है ,
ये मेरा बावरा मन ।।।।।।

(२)

मोतियों की लड़ी

मोतियों की लड़ी
तेरी यादें
मुझे बार बार सहला जाता है
उस धागे में पिरोया
एक एक मोती
खट्टी मीठी याद को जगा देती है ।।।
लोग कहते है ,अन्त हो गया
पर मुझे उस माले में अन्त नहीं दिखता
मेरे बदन को छू जाता है ।
और
उन यादों में समायी मैं ,
उस सच्चे चमकीले मोती की तरह , जो अभी अभी निकला है सीप से ..
मेरे बदन को छूती यादों की लड़ी
वो नोक झोंक , वो रूठना मनना, आचार विचार सभी को पिरो लेती हूँ।।।
वो मोतियों की लड़ी अन्तहीन है , अन्तहीन है ।।।
तेरी यादों की तरह , तेरी यादों की तरह ।।।।।।।।

(३)
——सभ्यता
सभ्यता ने न जाने कितने लिबास गढ़े

कितनी कशीदाकारी की ,

पर कपड़े की न तो असली रंगत गयी ,

न पहचान गयी ,

कशीदो के बीच से झाँकता कपड़ा

अपनी इक पहचान लिए ,

पुकारता रहा ::::पुकारता रहा ।

वो आदि मानव बनने को तैयार सदा था ,

पर ये रंग रोगन ये भड़कता संसार ,

रोकता रहा बेड़ियाँ डालता रहा ।।।।।

(4)

छूटा पल

वो दूर जो छूट गया होता है

वही क्यूँ ,बार बार पास आता है ,

कभी हँसाता ,कभी रूलाता ,

कभी यूँ ही उलझाता है ।।।।।

अभी आज का ये पल ,

कल को ,कल हो जायेगा ,

फिर यादों के झरोखों ,

से ,क्या ये भी ,इसी तरह पिघलायेगा ।।

इस ,बीत रहे पल की सवारी ,

मे मैं आगे आगे बढ़ते जाऊँगा ,

आज का यह पल ,

कल को कल हो जायेगा !!!!!

(५)

छूटते पल

कुछ तो था ,,,
जो छूट गया था ,,
टूटने की कगार पर ,
ख़ामोशी के द्वार पर ,,
अपनी अन्तिम साँसों में उलझा हुआ ।।

सारे उम्मीदों को तोड़ता हुआ ,,
न चाह ,
न इन्तज़ार ,

सारे मियाद पूरे हुये ,,,

फिर हवा का ये कैसा झोंका ,,
जानी पहचानी खूशबू ,
जाना पहचाना अन्दाज़ ,
ज्जबातो का ये कैसा तूफ़ान ,,
ख़ामोश फ़िज़ा को चीरता हुआ ।
आँखो में कुछ चुभता हुआ ,
दिल में कुछ उतरता हुआ ।।।।।।।।।।।।।।।।।।पनपता हुआ ।।।।।।।।।।

(६)

मेरी मुट्ठी

मेरी मुट्ठी में बन्द पड़ा ,
हीरे का टुकड़ा ,
फिसल कर न जाने कब गिर गया ,
एहसास था मुझे ,ख़ाली है ख़ाली है ,
मेरी मुट्ठी ।।
एक सुखद भ्रम कि हीरे का टुकड़ा ,
वही है वही ।।।
अपनी ख़ाली हथेली देखने की हिम्मत न थी ,
और , मेरी मुट्ठी आज भी बन्द है ।
मेरी मुट्ठी आज भी बन्द है ।।।।।।।

(७)

अंगार——
हमने जलाये थे , कई दिये
तुम न आये ,
सभी अंगार हो लिये ।
अपनी परिधि ,अपनी धुरी पर
घूमते हम ,
निकल न पाये ,,,,अपने दायरे से ,
यूँ समझो की ख़ाक हो लिये ।।।।।।

———सरिता नारायण——

 

7 Comments

  1. मधु रंजन February 18, 2018

    कवि ने अपने मन का उद्गगार बहुत सुंदर मोतियों से पिरोया है। बधाइयाँ

    Reply
  2. Shweta February 18, 2018

    Simple yet deeply meaningful.
    Goes straight to the heart.
    Kudos.
    Dr Shweta Sahai.

    Reply
  3. Lata February 18, 2018

    सरिता दी- आपकी रचनाएँ पढ़ने में बहुत अच्छे लगे

    Reply
  4. Sarita Narayan February 20, 2018

    दिल से आभार
    मधु रंजन जी

    श्वेता

    लता

    अपनी व्यस्तता के बाबजूद आपलोगो ने समय दिया ।।

    Reply
  5. Pramod Gupta February 20, 2018

    Many congratulations Ma’am. Read hindi after long time, all are very nicely written. I really enjoyed reading them all.

    Reply
  6. सुंदर रचनायें ,मन को भाए , दिल तक पहुँचें हर भाव ।

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  7. Rahul Jain February 21, 2018

    Nice thoughts n feelings. Let them flow .

    Reply

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