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नवनीता दुबे ‘नुपूर’ मंडला

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

नवनीता दुबे ‘नुपूर’ मंडला

Priti Surana February 24, 2018
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इस रविवार सप्ताह का कवि विशेषांक में प्रस्तुत है नवनीता दुबे ‘नुपूर’ मंडला का परिचय आत्मकथ्य एवं रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता

अन्तरा-शब्दशक्ति

*परिचय*

श्रीमती नवनीता दुबे “नूपुर”
माँ- स्व. श्रीमति कमला दुबे
पिता- श्री ब्रिजेंद्र दुबे
पति – श्री मनोज दुबे
जन्म तिथि – 15 फ़रवरी 1974
पता- प्रज्ञा नगर देवदरा मण्डला म.प्र.
शिक्षा-एम ए (हिंदी साहित्य)&बी एड
विधा – काव्य सृजन और कहानियां एवं अन्य
Email – nupur.dubey74@gmail.com
रुचियाँ-साहित्य लेखन,संगीत

प्रकाशन- विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ छपती है।मंचों पर भी काव्य पाठ का अवसर।
जे एम डी पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित 21 वीं सदी की श्रेष्ठ हिंदी कविताएँ एवम नारी चेतना की आवाज पुस्तकों में रचनायें प्रकाशित।

केवीएस प्रकाशन अनुबंध काव्य संग्रह मैं प्रकाशित रचनाएं

दैनिक समाचारपत्रों, पत्रिकाओं, एवम स्मारिकाओं में सम सामयिक विषयों पर निरन्तर रच नाओं का प्रकाशन।

मध्यप्रदेश लेखिका संघ एवम अनेक स्थानीय साहित्यिक संस्थाओं की सदस्यता।

उपलब्धियां–जे एम डी पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित 21 वीं सदी की श्रेष्ठ हिंदी कविताएँ एवम नारी चेतना की आवाज पुस्तकों की सम्पादक मंडल की सदस्य।

एक प्रकाशित काव्य संकलन

“”””नूपुर की सरगम”””

सम्मान–जे ऍम दी पब्लिकेशन द्वारा विशिष्ट हिंदी सेवी सम्मान 2013

राष्ट्रिय कवि संगम मध्यप्रदेश द्वारा साहित्य सक्रियता हेतु शब्द शकित 2016सम्मान।

अंतरा शब्द शक्ति सम्मान 2018

समप्रति —शासकीय B R C C कार्यालय नारायणगंज ,मण्डला में B A C के पद पर कार्यरत।

आत्मकथ्य

बचपन से मै अपनी स्वर्गीय माताजी को डायरी के पन्नो में रोजाना कुछ लिखते हुए देखती,व् समझने का प्रयास करती थी।
जब होश संभाला तो माँ की रचनाएं जो यथार्थ को छूती हुयी सम्वेदना से लिपि पुती समझ में आने लगी जो मुझे बहुत ही मन भावन भी लगती थीं।

उन्ही की प्रेरणा से मैने वर्तमान में सम्वेदना के धागों से कविता बुनना सीख लिया।
और आज अपने अहसासों को पन्नो पर उकेरना एक प्रवत्ति सी हो गयी अब।
मेरे अपनों ने मुझे लिखने को प्रेरित किया ,।
आज जो भी धूप, छांव ,फूल कांटे जिंदगी मुझे देती है और जो भी
अनुभव मुझे जिंदगी अपने व् औरों की जिंदगी को जी कर मिल रहे है मैं साहित्य जगत से साझा कर रही हूं ।
आप सभी का प्यार व् आशीष सदैव मेरे साथ रहै

ऐसी आकांक्षा के साथ—

नवनीता दुबे “नूपुर”
(१)

मैं तो पथिक हूँ
जीवन के टेढ़े मेढ़े
रोमांचक पथ पर
उल्लसित हो, अविरल बढ़ता
जा रहा हूँ
मुस्कान की पोटली में
सारी उदासी समेटे
ठोकरों को ठुकराते
दृढ़ता के उच्च शिखर पर
चढ़ता जा रहा हूँ
सपनों के गगन में नूपुर
स्वच्छंदता से विचरता
अनुभव सवांरता
मन की तरंगो पर
आशाओं के रंग बिखेरता
जीवन की किताब के
कीमती पन्नों पर
स्नेह के अंश गढ़ता जा रहा हूँ
मैं तो पथिक हूँ
अथक बढ़ता जा रहा हूँ

(२)

जय की खोज में
उलझा सा,
कुछ बुझा हुआ
सहमा हुआ सा
उद्दिग्नता की
वेगवती आंधी से
घिरा हुआ सा
कृत्रिम मुस्कान की
अनगिनत परतों तले
सिमटा हुआ सा
समय के अनुबंध से
लगभग टूटा हुआ सा
प्रतिस्पर्धा के मेले में
मिटा सा
अवसाद के काले धुएं में
कुछ घुटा घुटा सा
आत्म शांति की लकीरों से
पूर्ण रूपेण पिता हुआ सा
निरंतर जय की खोज में नूपुर
जुटा हुआ सा हर चेहरा
हाँ l यहाँ हर एक चेहरा

(३)

मेरा गांव
माटी की सौंधी गंध
सरसराती सरसों के संग, मंद मंद
रग रग में समा जाता, मेरा गांव
कच्चे आमों की बाजी
डालियों के झूले और
गोरियों की कुआंरी मुस्कानों के संग
त्योहारों की शान
पंछियों की मीठी जुबान
मूक चलचित्र बनकर
आँखों में छा जाता मेरा गांव
शहर की भीड़ में नूपुर
बहुत याद आता मेरा गांव

(४)

गुहार
माँ I आज तू ठान ले
बात मेरी मान ले
चाहे हों कर्कश ध्वनियाँ
तुझे कोसती ये आकृतियां
तू मुझे न भुलाना
अपनी कोख का
झूला झुलाना
लाख ताने मिलें तुझे
पर भूलना न तू मुझे
बेटों से बढ़कर मैं
कुल का नाम रौशन करूंगीं
फूल बरसेंगें तुझपर
ऐंसा मै कोई काम करूंगीं
मैं तेरी बगिया की कली
न मरोड़ मुझे फेंकना
तेरा सर ऊँचा होगा
माँ इक दिन तू ये देखना
चाहे कड़के तानों की बिजलियाँ
रूठ जाएँ चाहे सैकड़ो जिंदगियाँ
तुम मुझसे न रूठ जाना
निज कोख का झूला झुलाना
माँ तुम नूपुर को न भुलाना

(५)

फागुन का त्यौहार
सुरभित पुरवैया, रंगो की बौछार
जनमानस हर्षित, फागुन का त्यौहार
रंग बिरंगे, नीले पीले,
हरे गुलाबी चटकीले
रंगों की फुहार, फागुन का त्यौहार
अंगारों से पलाश, कर रहे
पवन से अठखेलियां
खिलखिलाकर चिटक रहीं कोमल कलियाँ
नभ से धरा तक, खुशियों का अधिकार
कहीं मीठे पकवान तो कहीं गुझिया सलोनी
कहीं पिचकारी चुन्नू की तो कहीं उड़ाती गुलाल मुन्नी
छन रही मन में, सपनों की भांग
मद माता भावनाओं का संसार नूपुर
जनमानस हर्षित, फागुन का त्यौहार
धर्म, जाति, भाषा के, भेद चक्रव्यूह तोड़
मानवीय सोच लिए मन को मन से जोड़
संस्कृति नेह करता, मानवता का शृंगार
जनमानस हर्षित, फागुन का त्यौहार

(६)

हिंदी
उपेक्षा की घूँट पीती
सिसकियों में बात कहती
विवशता की जंजीरों में जकड़ी
अपनी दुर्दशा पर आँसूं बहाती
विदेशी खंजरों से आहत
अपने ही वतन में सहमी
अपनों ने जब ठुकराया तो
बात क्या करें परायों की
कब तक उपेक्षित रहेगी
भारती के माथे की बिंदी
सम्मान के चीथड़े उड़ रहे
रौब जमा रही शान से फिरंगी
पाश्चात्य भाषा का चोला त्याग
अपनायें अपनी हिंदी भाषा
जन जन के सहयोग से ही
चमक उठेगी हिंदी की आशा
जागृत अब भी न हुए हम
तो इक दिन वो आएगा
जब उड़ने लगेगी राष्ट्र भाषा के
अस्तित्व की चिन्दी चिन्दी।

(7)
प्रेम 

हाँ!!!
तुमसे प्यार है मुझे,
ये
बताने के लिये
जरूरी नही
कि
कोई
प्रेमदिवस हो,
या
मैं
महसूस न
कर सकूं
तुम्हारा प्यार
मन
इतना विवश हो।।।।।

दो दिलों में
पल रहा प्रेम
बस
स्वयं ही
सिद्ध हो
जाता
हल्की कभी
तीखी नोकझोंक
में
दबी
परवाह की
गहराइयों

रूह में
समाती
सदैव
मुस्कान देखने
की
आदी हुई आंखों का।

हाँ!!
प्यार है
तुमसे ये
कहना इतना
जरूरी नहीं
जितना कि
अहसास करके
प्यार को
जिंदा रखना और
कभी न
मुरझाने के
लिये
समय समय पर
परवाह व
सम्वाद का
खाद पानी
डालते रहना।।।

ताकि

कोई पतझड़
कोई
सुनामी
गमों की

ढहा सके
अपने
प्यार भरे
सपनों का
पुल
जो
सजाए हैं
हमने
आपसी
विश्वास

परवाह
के फूलों से।।।।

नवनीता दुबे”नूपुर”

1 Comments

  1. Sarita Narayan February 25, 2018

    नूपूर जी को हार्दिक बधाई ,, होली जैसे रंगो का मौसम है तरह तरह के रंग ,ठीक वैसा ही महसूस हो रहा है ,
    नूपूर जी प्रत्येक रचना अपने आप में एक एक नया रंग बिखेर रही है , प्रत्येक रचना की अपनी ही सुन्दरता है ,,,
    हमें सात रंगो की सौग़ात दी है ,आपने नूपूर जी ,,
    आपको बहुत बहुत बधाईयाँ ।।।।।

    Reply

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