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निमिषा लढ़ा, बंगलोर

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

निमिषा लढ़ा, बंगलोर

Priti Surana March 3, 2018
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इस रविवार सप्ताह का कवि विशेषांक में प्रस्तुत है *बंगलोर से निमिषा लढ़ा* का परिचय,आत्मकथ्य एवं रचनाएं। आप सभी की प्रतिक्रियों की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता

*अन्तरा-शब्दशक्ति*

*परिचय*

नाम- निमिषा लढ़ा
पति -श्री अरुण लढ़ा
जन्म- 22/4/75
पता – बैंगलोर

*आत्मकथ्य*

मेरा जन्म छिंदवाड़ा एक ऐसे परिवार मे हुआ जहाँ सुबह की शुरुआत हरिओम शरण के भजन या कबीर ,रहीम की वाणी सुनने से होती थी। लिखने और पढ़ने का शौक पिताजी की वजह से हम सब भाई बहनो को था। कविता या छोटी छोटी कहानी बचपन में बोल दिया करती थी पर कभी इसको गंभीर रूप से किसी ने भी नही लिया और इसी तरह बड़े होते चले गए। हिंदी मीडियम से सारी शिक्षा हुई इसलिए हिंदी मे सदा रूचि रही। 1992 से लिखने की फिर से कोशिश की पर फिर उसके प्रति गंभीर नही थी। बीच मे एक दो बार आकाशवाणी के लिए भी प्रस्तुति दी।कॉलेज मे हमेशा वादविवाद ,नाटको मे भाग लेती रहीऔर इनाम जीतती रही।कॉलेज मे एक बार बिना तैयारी के निबंध प्रतियोगिता मे भाग लिया और पूरे कॉलेज मे 3 पुरूस्कार मिला तो थोड़ा लिखने के प्रति आत्मविश्वास जागा। कॉलेज में जब वार्षिक समारोह में मेरी 2 कवितायेँ कॉलेज की पुस्तक मे छपी तो शिक्षको एवं दोस्तों ने प्रोत्साहन दिया तब पढ़ाई के साथ साथ फिर से लिखना शुरू किया। ग्रेजुएशन समाप्त होते ही शादी हो गयी। थोड़ा कभी कभी लिख लेती थी पर बस परिवार की जिमेदारियो मे कविताये खो सी गयी। फिर इंदौर छोड़ कर बैंगलोर आ बसे कंप्यूटर डिजाईन का कोर्स किया और अपने पति के साथ उनके वयवसाय में हाथ बटाती रही।3साल पहले अपनी एक परम मित्र को उसके जन्मदिन पर कविता लिख कर भेंट की तो उसके ख़ुशी एवं आश्चर्य की सीमा ही नही रही कि ये मैंने लिखी है। उसने और मेरे पति ने उसके बाद बहुत प्रोत्साहन दिया लिखने के लिए, उसके बाद फेसबुक पर लिखती रही लोगो ने मेरी कवितायें पसंद की तो आत्मविश्वास और बढ़ गया उसके बाद प्रीती जी में मुझे मेसेज मे अंतर ग्रुप ज्वाइन करने के लिए आमंत्रित किया, बस ये सिलसिला चालू हो गया। सबसे बड़ा ख़ुशी का दिन कविताओं के क्षेत्र में मेरे लिए वो था जब कवि कुमार विश्वास बैंगलोर मे कवि सम्मेलन करने आये थे उनसे मेरी मुलाकात हुई और मैंने उनको बताया कि मै भी कुछ लिखती हूँ ,और मैंने अपनी कुछ कवितायें पढ़ने दी ,उन्होंने मेरी कविताये पढ़ी और कबाड़ी वाली कविता को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया । बस उस दिन तो जैसे पंख ही लग गए।
जब कविताये लिखती हूँ तो बहुत अच्छा लगता है ,बहुत सुकून मिलता है ,अब तो पति बच्चे मित्र सभी का सहयोग मिल रहा है। कभी कभी बंगलौर के कुछ साहित्यिक ग्रुप मे जाती हूँ और कविता पाठ करती हूँ और नया सिखने की कोशिश करती हूँ।
बहुत सरल भाषा मे लिखने का प्रयास करती हूँ जो सबको समझ आ जाये और वो उसे महसूस कर सके।
आशा है ये सिलसिला यूँही अनवरत चलता रहे।
मै अपने 2 परम् मित्रो ऋचा और रेखा के साथ साथ प्रीतिजी जी का विशेष रूप से धन्यवाद देना चाहती हूँ ।

*रचनाएँ*

1.

जब कभी बच्चों के लिए
हलवा बनती हूँ तो
सारा घर महक जाता है
पर फिर भी माँ उसमे
तेरी सी खुश्बू नही आती।

आराम से सोने के लिए
तेरी तरह बालों की
मालिश भी कर लेती हूँ
पर माँ बिन तेरी गोद के
मुझे नींद ही नही आती।

तेरा ओढ़ा दुप्पटा आज भी
मैने सम्भालकर रखा है
उसे पहनने से पहले कभी
उस पर इत्र लगा लेती हूँ
पर माँ इत्र की सुगंध
इससे कभी नही आती।

तिनका तिनका जोड़ कर
मैंने आशियाना बनाया है
सब कहते है इसे
महल की तरह सुन्दर है ये
पर फिर भी माँ तेरे घर
की वो बात इस घर मे नही आती।

कभी कभी कुछ लिख लेती हूँ
मेरे दोस्त कहते है अच्छा है
पर सच कहूँ माँ आज भी
इसमें तेरे जैसी सजावट नही आती।

2 .

हर बार की तरह फिर दरवाजे पर
कबाड़ी वाले ने आवाज़ लगाई
मैंने पूछा क्या क्या लेते हो?
वो बोला वो सब जो
आप के काम का नही
मैंने कहा बहुत कुछ है मेरे पास
बोलो क्या भाव लोगे –
फटे पुराने रिश्ते
अहं के कुछ टूटे टुकड़े
शिकायतों से भरा कनस्तर
बिखरे सपनो की बोतलें
और यादों के खाली लिफाफे
वो बोला कहां बेचूँगा ये सब
कोई भाव न बिकेंगे ये क्योंकि
इन ही से तो सारा बाज़ार भरा है
अगर देना है तो दीजिये-
खुशियो के अनमोल पठाखे
सुनहरी यादों की फुलझड़ी
और मीठे रिश्तों से भरी बोतल
देते हो ये सब तो ख़ुशी ख़ुशी
अपने घर ले जा कर इनसे
अपना घर सजाता हूँ।

3 .

मत बड़ा होने दो अपने
अंदर के उस बच्चे को
जो यूँ ही बेहिचक बेबाक
खिलखिलाकर हँस पड़ता है
जो लहरों से लड़कर भी
रेत पर अपना नाम लिखते रहता है
मत बड़ा होने दो अपने
अंदर के उस बच्चे को
जो हर बारिश मे बेफिक्री से
कागज़ की नाव की सवारी करता है
जो एक छोटे से गिल्ली डंडे से
सारा दिन शहर को नापा करता है
मत बड़ा होने दो अपने
अंदर के उस बच्चे को
जो करके भी अनबन यारो से
सिर्फ एक लड्डू से फिर गले मिला करता है
जो गड्ढे मे भरे गंदे पानी से भी
एक दूसरे को भीगाने का मज़ा लेता है
मत बड़ा होने दो अपने
अंदर के उस बच्चे को
जो किराये की साइकिल से
गाड़ी को हराने का दम भरता है
जो भूतो की कहानी अकड़ के सुनकर भी
अँधेरे मे हरदम माँ को याद करता है
मत बड़ा होने दो अपने
अंदर के उस बच्चे को
जो आँखो मे पट्टी बाँधकर भी
एक आवाज़ से सबको पकड़ा करता है
जो एक सिक्के को उछालकर
आसानी से हार जीत का फैसला करता है
जीवन के इस मोड़ पर मुमकिन है
तुम्हें ये सब बचकाना लगे ,फिर भी
एक बार जी कर देखो इसे
बचपन पर उम्र का साया मत पड़ने दो।

4.

देख कर सबके इतने गमो को
मैंने आजकल मुस्कुराने की कला अब सीख ली है।

पँछी की तरह उन्मुक्त उड़कर भी देख लिया
कुछ देर शाखों पर सुस्ताने की कला अब सीख ली है।

खूब निभाए है रिश्ते दिल के मैंने नाहक
अपने शर्तों पर दिल्लगी करने की कला अब सीख ली है।

पाये है दर्द बहुत अपनों से मैंने
खुद मरहमो पर दवा लगाने की कला अब सीख ली है।

देखा है एक दूजे को गिराते बहुत
फिर गिर कर संभालने की कला अब सीख ली है।

डर गई हूँ देख कर उजड़ते आशियाने
तारों के नीचे रात बिताने की कला अब सीख ली है।

कह न सकी कितनी मोहब्बत है तुमसे
ख़ामोशी को जुबां देने की कला अब सीख ली है।।

5.

किसी ने मुझे प्यार की परिभाषा पूछा
मैंने तुरंत उसे कहा वो तो मेरा “खास” दोस्त है
किसी ने मुझसे समर्पण का पता पूछा
मैने उसे तेरे घर का रास्ता बता दिया
किसी ने मुझसे दोस्ती का मतलब पूछा
तो मैंने अपने दिल मे बसी तेरी मूरत बता दी
किसी ने पूछा निः स्वार्थ कैसे होते है
मैंने उसे तेरी तस्वीर दिखा दी
किसी ने मुझसे मेरे सकून की जगह पूछी
मैंने उसे तेरा कांधा बता दिया
किसे ने पूछा बिन कहे कौन समझ जाता है
मैंने उसे तेरी आँखे बता दी
किसी ने पूछा “उसका”दिल कितना बड़ा है
मैने ऊपर आकाश मे ऊँगली उठा दी
उसे तो यक़ीन ही नहीं हुआ ये सुनकर ऐसा भी कोई है
फिर मैंने तेरे साये से उसकी मुलाकात करा दी
तब से वो भी स्तब्ध है
कि सचमुच फ़रिश्ते का दूसरा रूप
आज भी मेरे पास है।।

6.

कितना अजीब है तेरा मेरा रिश्ता
है दोस्ती से ऊपर पर मोहब्बत के करीब
न शिकवा न शिकायत ,न वादे न कसमें
न रूठना न मानना, न रोना न रुलाना,
आँखो से कहना और सब जान जाना
कुछ पल साथ रहना और मीलो चलना
न रोज़ रोज़ मिलना और अफ़साना कहना
सिर्फ एक लब्ज़ से सारी दास्तन समझ जाना
न गले मिलकर प्यार का इज़हार करना
बस हाथ पकड कर धड़कन सुन लेना
जब कभी हो जरूरत तुम्हारी
बिन कहे अपने कँधो पर मेरा सिर रख देना
न जाने कितने जन्मों का है ये रिश्ता
कितना प्यारा अनकहा रिश्ता ।।

7.

अब तक जीवन के
पथरीले रास्तो पर
तुमने तो साथ निभाया है
अब जब रास्ते समतल
हो गए तब भी साथ
संभाले रखना सजन,
जब मुझे रंग भी फीके फीके
से लगने लगे
और सब कुछ धुंधला
सा दिखने लगे
तब तुम बन चश्मा मेरा
चाँद तारो की सवारी
करवाना सनम,
जब वक्त बेवक्त ये घुटने
कभी मुझे जकड़ने लगे
कुछ दूर चलने पर
दम भरने लगे
तब तुम बन लाठी मेरी
मुझे दुनिया की सैर
करवाना सजन,
जब कभी यूँ ही चहरे पर
उदासी छाने लगे
और अपनों का गम
बेवजह सताने लगे
तब कुछ पल बैठ पास मेरे
अपनी हँसी से मुझे
गुदगुदाना सनम,
जब दिल की धड़कने
तेज होने लगे
और साँसे भी कभी
आने जाने लगे
तब भी हमेशा की तरह तुम
सिरहाने आकर प्यार के
मीठे गीत गुनगुनाना सनम,
जब कभी चलते चलते पाँव
लड़खड़ाने लगे
और यारो का संग भी
छुट जाने लगे
तब भी तुम मजबूती से मेरा
हाथ पकड़ मुझे यूँ ही
सम्भाले रखना सनम।

निमिषा लढ़ा

1 Comments

  1. Pinky Paruthy Anamika March 4, 2018

    शुभ प्रभात अंतरा शब्द शक्ति परिवार
    आज की उत्सव मूर्ति आ निमिषा लढ़ा जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ
    बचपन से ही लेखन, पठन में रुचि, साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेना, पुरुस्कृत होना आपके व्यक्तित्व में झलकता है। सौम्य छवि और प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक अभिनन्दन। *पहली रचना*- अद्भुत सृजन, माँ पर। *दूसरी रचना* , कबाड़ी वाला, रिश्तों और अहंकार , सुनहरी यादों, शिकायतों को लेकर सजाई गई सार्थक अभिव्यक्ति। *तीसरी रचना* , बेहतरीन भाव। *चौथी रचना* , वास्तविकता से परिचित हो जीवन जीने की कला सिखाती हुई सुन्दर रचना। *पाँचवी रचना*, सच्चा साथी , फरिश्ता बनकर ही जीवन में आता है, खुशनसीब हैं वो जिनकी फरिश्तों से मुलाकात होती है,अति सुन्दर सृजन । *छठी रचना*, खूबसूरत अनकहे रिश्ते को परिभाषित करते हुए बेहतरीन अल्फाज़। *सातवीं रचना*, प्रेम और विश्वास की सुन्दर अनुभूति, सार्थक सृजन।
    आपकी सारी रचनाएँ बेहद सुखद अहसास कराती हुई , नदी के समान प्रवाहित होती सी प्रतीत होती हैं। वो प्रवाह जो उसे पढ़ने और समझने वाले को ऐसे आलोक में प्रवेश करा देता है जहाँ से वापस निकलने का मन ही नहीं करता है।
    आपकी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रहे, माँ वीणा पाणि का आशीर्वाद बरसता रहे, हार्दिक शुभकामनाएँ।
    ***************************
    पिंकी परुथी “अनामिका”

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