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शुभ्रा झा, सीकर (राज.)

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

शुभ्रा झा, सीकर (राज.)

Priti Surana March 11, 2018
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इस रविवार साप्ताह का कवि विशेषांक में प्रस्तुत है *सीकर (राज.) की शुभ्रा झा* का परिचय, आत्मकथ्य एवं रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाएं प्रतीक्षित हैं।

प्रस्तुतकर्ता
अन्तरा-शब्दशक्ति

*परिचय*

नाम:शुभ्रा झा ।
जन्मः 03/07/80
स्थान:सीकर,राजस्थान ।
शिक्षा:पोस्ट ग्रेजुएट ;बी;एड।
पति :श्री संतोष कुमार झा।
पिता:स्वर्गीय गोलोक नाथ मिश्र ।
माता:श्रीमति माधुरी मिश्रा।

*आत्मकथ्य*

एक शिक्षित परिवार में जन्मी मैं हमेशा से भावुक और संवेदनशील रहीं ।परिवार में डाँक्टर भाई बहन और भाभी से प्रभावित हो कर मैंने माक्रोबाईलोजी में पोस्टग्रेजुएट के बाद बी:एड किया मगर शादी के बाद परिवार की जिम्मेदारी के कारण शोध कार्य नहीं कर पायी ।अंतरा शब्द शक्ति के सम्पर्क में आने के बाद मैंने कविता लेखन की शुरुआत हुई।आज मुझे अपना रास्ता मिल चुका है आप सभी श्रेष्ठ जन के आशीर्वाद से और मार्गदर्शन से आगे बढ़ती जाऊंगी।धन्यवाद

*रचनाएँ*

*1.कहाँ जा रही है औरतें*

आज फिर बैठेगीं कस्बे की औरतें
आकर झुण्ड में अपने
शाम को खाने के बाद
सभी होती इकट्ठी
फिर कुछ देर बाद
गुनगुनाएगीं हंसी
और कुछ
सीसकीयाँ भी
तैर जाएंगी।
बातें कुछ परोसन की या
फिर अपने घर वालों की
सभी के दर्द
एक एक कर
परोसे जाएंगे सामने
कभी मिर्ची
लगेगी किसी को
किसी को
चटपटाती चाट
सा रस मिलेगा
बड़ी खुबी से
ओढ़कर पेबंद भरी
चादर
धीरे से दुसरों को
नंगा किया जाएगा ।

वहीं कुछ दूर बड़ी इमारत में
होकर इकट्ठी औरतें
झुमती डाल के गैरों के गले
में हाथ
अपनी आधुनिकता का
ओढे लिबास
बड़ी ही बेपरवा हो कर
इस दुनियां से
बोलती आदर्श भरी बातें
खुशबू से नहा कर
अपनी गंध को छुपाए
वो आज फिर कर रही हैं बातें।

चली जाएगी दोनों तरह की औरतें
समेटे कुछ खुशियों को भर
कोई फिर पसर जाएगी
चादरों के संग बिस्तरों पर
और दुसरी पाने को अतृप्त अभिलाषा
चुकाएगी अपनी ही काया।

दोनों ही हालातो में औरतें
ढ़ुढती है और जानने की कर रही कोशिश
है आखिर किस तरफ जा रही है वो
आज भी पीस रही है वो
या कि खुद को ही छल रही है वो।

*2.विद्यालय कैसे आऊँ*

सुना है उस घर में
बसती है विद्या की देवी
देती है नित ज्ञान की ताकत
मिलती वहाँ हौसलों को उड़ान
मिलती वहाँ अपनी पहचान।

गई थी मैं भी वहाँ
सखी संग सहेली
थोड़ी सहमी थोड़ी डरी
थी बड़ी अकेली
मिला बहुत कुछ जानने को
देखा नयनों को फाड़।
कितना कुछ छिपा हुआ
सुंदर है यह संसार।

नई अब भाषा नई है बोली
सीखा पढ़ना लिखना
और सीखा मैंने वहाँ
लघुशंका को दबाना।

नहीं उचित उपाय वहाँ है
कोई लड़की के लायक
कैसै जाऊँ रोजाना पढ़ने
नहीं है कोई सहायक

छोड़ पढ़ाई घर भागी आती
लघुशंका के कारण
पूछे अम्मा और बाबा जब
क्या बताऊँ अब कारण।

कुछ कहते है छोटी बातें
कोई कहते मुझे नादान
झाड़ियो के पीछे जाकर
कब तक होगा समाधान।

बड़े बड़े महलों में बैठे
कहते तुम हो एक समान
भूल गए क्यों देना हमको
नारी का जो मान सम्मान।

सोच रहे बस देकर नारा
कर रहे क्या इंतजार
एक दिन छोड़ कर मैं भी
बैठूँगी जब अपने द्वार।
या फिर सहती रहूँ सदा
अपना ऐसा ही अपमान
और किसी दिन वहशी आगे
लुट जाए मेरा सम्मान।

बोलो कब तक सभांलू मैं
अपनी आबरू उन लोगों से
या फिर छोड़ दूँ आना विद्यालय
डर कर कुछ इन दागों से।

नहीं मंजूर छोड़ पढ़ाई
घर बैठ मैं जाऊँ
बोलो इन हालातों में मैं
विद्यालय कैसे आऊँ।
विद्यालय कैसे आऊँ।।।

*3.लड़कियाँ या मछलियाँ*

देखा है तुमने कभी
गाँव के पास के पोखर में
तैरती अनगिनत मछलियाँ
एक छोर से दूसरी तरफ
बस नाचती एक दायरे में
निकल जाए वहाँ से तो
मर जाएगीं वे ।

और देखा वहाँ पानी में
तैरती झुण्ड लड़कियों की
खिलखिलाती ,गुनगुनाती
एक कविता जैसी
उनमुक्त आजाद पवन सी
बदल जाती है धीरे धीरे
सारी लड़कियाँ मछलियों में
बंध के रह जाती किनारों से।

कोई समझाए उन्हें
बहुत अंतर है उनमें और मछलियों में
मरेगीं नहीं जो कभी तोड़ बाँध
जो बाहर आए
एक नए परिवेश में
और नए हालात में
थोड़ी देर छटपटाएगीं
मगर आजादी की हवा में
सांस लेना सीख लेंगी।
सीख लेंगी अपने लिए
चलना सीख लेंगी
अपने लिए जीना ।

मगर कुछ जानने से पहले ही
फँसा कर जाल में उनको
फेंक कर एक पोखर से
दूसरे पोखर जीने को
और अगर रास्ते में
मरेगीं वो बदकिस्मत
सजेगी फिर किसी
के निवाले में।

यहाँ ऐसा तब तक
ये चक्कर चलता रहेगा
कि जब तक बनना मछलियाँ
रोकती नहीं ये
लड़कियाँ।

*4.जिजीविषा*

काँच की बोतलों में
भर लेती हूँ
आँसू अपने
जुगनू बन के
चमकते है
जब भी हताशा
छाई हैं।

हैं बड़े रंगीन
और कुछ
खुरदरे भी वो
मैंने जीवन के हरेक
पन्नों से स्याही
जो चुराई हैं।

तुम कभी जान भी
नहीं पाओगे
मेरी जीने की ललक
मैंने आँसुओं के
समंदर में भी
कश्ती चलाई हैं।

जो चिल्लाते है मुझ पे
झुण्ड परछाईयों की
मैंने अक्सर ही
उन्हें उनकी ही
शक्ल दिखाई हैं।

तुम देखते हो
जो कभी रोते मुझको
मैंने अनजाने में ही
उनमें भी हँसी छुपाई हैं।

*5.चीकू*

सखी
याद है तुम्हें
हमारा हाथों में हाथ डाले
रोज स्कूल जाना
घंटे भर की चहलकदमी
रोजाना की भागदौड़
और लौटते हुए रास्ते से
फेंकी बेकार आइसक्रीम की
नारंगी लकड़ियो को चुनना।
बालपन में बनाते थे उन
लकड़ियो से अपना घरौंदा।
उन घरौंदो को सजाना
चमकीले गोटो से
और अपने हुनर पे इतराना।

सखी
याद है तुम्हें
रास्ते में आता वो बड़ा सा बगीचा
ढुंढते रहते थे घंटों वो पक्के चीकू
कुछ नहीं तो कच्चे ही खा कर इतराना
माँ से गले की खराश का झुठा बहाना।
वो भी जानती थी हमारी झुठी लड़ाई
मगर चुपचाप छुपा लेती हमारी लड़काई।
कच्चे चीकू के बाद गले में अटकता पानी
माँ सब जानती थी अपनी शैतानी

सखी
गोटो किनारों से सजाए
बैठी हूँ अपना घरौंदा
बस आती नहीं आँखों में
वो पहले सी चमक
कभी यूँ ही कहीं से आ कर
दिखा दो
अपना भी घरौंदा
आओ पी ले हमदोनों
दो घूँट बचपन के
न जाने कब से अटका हैं
गले में
वो कच्चा चीकू बगीये का।

*6.बेटी का संवाद माँ से*

माँ तुमने पढ़ना सिखाया
सजना और संवरना भी
और धीरे धीरे सीखाया
मुझको जग से डरना भी।

क्यों नहीं भरी मुझमें
आग अपने उस हृदय की
रोज जिसको हो बुझाती
डाल अश्रु जल नयन की।

मैं थोड़ा जल ही जाती
और खोती मेरी भावनाएँ
रोज अब इस खोखलेपन को
किस तरह कब तक दबाए।

आज जब बाहर निकलती
इस मतलबी दुनियाँ मे मैं।
रोज मिलते लाखों बताने
कितनी अबला नारी हूँ मैं।

अब नहीं बर्दाश्त ये
कोई मेरा हनन करें
बोल अबला और नारी
नित मेरा शोषण करें।

आग जो थोड़ी वो होती
मैं जला कर खाक करती।
नारी को अबला कहने वाली
पोथी को मैं राख करती।

कुछ नहीं माँ धीर धरो
अब भी नहीं हुई हैं देरी ।
है सुलगती वेदना हृदय की
आग बन कर अब हमारी।

मान या अपमान का भय
अब नहीं मेरे लिए।
ठान ली है अब लड़ाई
स्वावलंबन के लिए।

माना कोमल और सुंदर
पाई है मैंने अपनी काया।
पर पहाड़ों सी दृढ़ता
भी है हृदय मे समाया।

बंद करके अपने कान
सुनना बुराई छोड़ दूँगी।
रोके मुझे उड़ने से जो
उस स्वणॆ पिजड़ को तोड़ दूँगी।

नहीं समझौता अपने मान से
जो मिलें महलों की रौनकों से।
बस खुद को एक बार निकालूँ
इस दुनियाँ के ढ़कोसलों से ।

क्यों ढ़केली जा रही हूँ
रोज अंध कुएँ में मैं।
घुट के रह जाती आवाजें
गूंगी पुतलों जैसी मैं।

आँखों से न बहेंगी नीर
अपने आग को बुझाने।
तोड़ दूँगी दीवारों को
अपने अस्तित्व को बचाने।

घर या बाहर दोनों जगह
आग थोड़ी तो जले।
चीड़ते जो चीर नारी का
रावण दुशासन वो जले।

उत्पीड़न हो मानसिक या
हो शारीरिक हमारी।
क्यों नहीं उस आग में
भष्म करें वो परछाई सारी।
भष्म करें वो परछाई सारी।

*7.तंज*

जो सम्भाले मैं रखा
स्वणॆ सा अपना हृदय
राग द्वेष भाव का
होता रहा नित उदय।

सामना कर भी लेती
औरों का व्यवहार मैं
सह न पाई अपनों के
तंज का प्रहार मैं।

आत्म मंथन से भी मैनें
पाई नहीं कोई सुधा
सह सकूँ जो प्रहार
प्राण रक्षा के लिए।

मैं कहाँ से ले के आती
तंज जो निष्फल करें
भावनाओं के समर में
रह गए हर दाँव धरे।

हो बिखर के कण हुए
हृदय के अरमान मेरे
शोक कब तक मनाऊँ
रख के ये तंज सारे।

आगे बढ़ाया पग को अपने
विश्व मयी रण के पटल पर
स्वयं की पहचान की जब
हीनता से निकल कर।

है अगर मुझमें वो पौरूष
जग मुझे पहचान लेगा
दूसरों के तंज कब तक
हित मेरा रोके रखेगा।

क्यों मैं बदलूँ स्वणॆ हृदय को
लौह या पाषाण में
भेद दे हृदय को मेरे
है धार कहाँ किसी बाण में।।।।

*शुभ्रा झा*

2 Comments

  1. Sarita Narayan March 11, 2018

    अति उत्तम ,,,बधाईयाँ

    Reply
  2. Pinky Paruthy Anamika March 11, 2018

    अंतरा शब्द शक्ति परिवार को मेरा सादर अभिवादन
    आज केंद्रीय रचनाकार विशेषांक में प्रस्तुत होने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ शुभ्रा जी संक्षिप्त परिचय और आत्मकथ्य आपके शालीन व्यवहार और व्यक्तित्व के परिचायक हैं। रचनाओं में संवेदनशील हृदय की भावुक अभिव्यक्ति है। अब तो बस शुरुआत है, आगे आसमान तक की ऊँचाई है नापने के लिए, अपनी उन्मुक्त उड़ान भरने के लिए अपने पंखों पर भरोसा करें , माँ सरस्वती की कृपा बनी रहे, अभी सफ़र में हूँ , विस्तृत समीक्षा फिर कभी, अशेष शुभकामनाएँ
    ***************************
    पिंकी परुथी “अनामिका”

    Reply

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