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विवेक दुबे

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

विवेक दुबे

Priti Surana May 5, 2018
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इस सप्ताह *सृजक-सृजन-समीक्षा विशेषांक* में प्रस्तुत है विवेक दुबे रायसेन (मप्र) का परिचय, आत्मकथ्य एवं रचनाएं आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता

अन्तरा-शब्दशक्ति

मैं – विवेक दुबे “निश्चल”
पत्नी- राधा दुबे
पिता-श्री बद्री प्रसाद दुबे”नेहदूत”
माता- स्व.श्रीमती मनोरमा देवी

शिक्षा – स्नातकोत्तर
पेशा – दवा व्यवसाय
निवासी- रायसेन (मध्य प्रदेश)
मोबाइल– 07694060144

सम्मान एवं उपलब्धियां–

*निर्दलीय प्रकाशन भोपाल*
द्वारा बर्ष 2012 में
*”युवा सृजन धर्मिता अलंकरण”*
से अलंकृत।

जन चेतना साहित्यिक सांस्कृतिक समिति पीलीभीत द्वारा 2017
श्रेष्ठ रचनाकार से सम्मानित ।
*वागेश्वरी-पुंज*
सम्मान से सम्मानित ।

कव्य रंगोली त्रैमासिक पत्रिका
लखीमपुर खीरी द्वारा
*साहित्य भूषण*
सम्मान 2017 से सम्मानित ।

अपना ब्लॉग लिखता हूँ ।
*”निश्चल मन “* नाम से
vivekdubyji.blogspot.com

काव्य रंगोली ,अनुगूंज , कस्तूरी कंचन साहित्य पत्रिका एवं निर्दलीय साप्ताहिक
पत्र में रचनाओं का प्रकाशन।
हिंदी साहित्य पीडिया , कागज़ दिल, मेरे अल्फ़ाज़ , मृत भाषा.कॉम
वेब साइट्स पर रचनाओं का निरन्तर प्रकाशन ।

*आत्मकथ्य* —
कवि पिता श्री बद्री प्रसाद दुबे “नेहदूत” से
प्रेरणा पा कर कलम थामी।
साहित्यिक परिदृश्य का असर एवं साहित्यकार पिता का अंश , सींचता रहा मन को वृक्ष का रूप लेता राह ।
खून रंग दिखाता है इस बात को सही साबित करता रहा ।
भोपाल से जुड़े होने की बजह से उर्दू ज़ुबान आम बोल चाल में मिली जो रचनाओं में भी इस्तेमाल करने में कोई हिचकिचाहट नही होती ।
सहजता हूँ कुछ घटनाओं को, कुछ पूरी कुछ अधूरी इच्छाओं को ।
देखता जो यहाँ वहाँ कर देता शब्दों की छाँव ।
कभी कभी कुछ न कह पाने की कसक , शब्द बन कागज पर उतर जाती है ।
दवा व्यवसाय के साथ मिलते वक़्त को शब्दों में खर्च करता हूँ ।
बेसे शब्द भंडार की कमी है पास मेरे, कम शब्दों से ही काम चलता हूँ ।
सरल सहज आम बोल चाल के शब्दों का ही प्रयोग , बस प्रयास अपनी बात दिल से कहकर दिल तक पहुंचाने की ।
अक्सर व्यकरण की गलतियाँ भी करता हूँ, जिन्हें कुछ अजीज सुधारते है ।
बात कहता हूँ निश्चल सरल सी ।
त्वरित विचार आए तुरन्त लिख डाले ।
सोचकर लिखने का समय नही मिला कभी, जो शायद अब आदत बन गई ।
आत्मकथ्य भी लिख रहा हूँ समिकक्षार्थ बस यूँ ही ।
छोटे से शहर के छोटे से इंसान की तरह ।

*कुछ रचनाएँ सादर प्रस्तुत है*

1– *माँ*
ममता जब जब जागी थी ।
माता की टपकी छाती थी ।
दे शीतल छांया आँचल की ,
माता सारी रात जागी थी ।

देख अपलक निगाहों से ,
गंगा यमुना अबतारी थी ।
स्तब्ध श्वास थी साँसों में ,
अपनी श्वासों से हरी थी ।

आँचल की वो छाँव घनी थी।
दुनियाँ में पहचान मिली थी ।
छुप जाता तब तब उस आँचल में,
जब जब दुनियाँ अंजान लगी थी।

उस आँचल की छोटी सी परिधि से ,
इस दुनियाँ की परिधि बड़ी नही थी।
हो जाता “निश्चल” निश्चिन्त सुरक्षित ।
उस ममता के आँचल में चैन बड़ी थी।

उस माता के आँचल में ….
………

2– *पिता*

मनचाहा बरदान मांग लो ।
अनचाहा अभय दान माँग लो ।।
होंठो की मुस्कान माँग लो ।
जीवन का संग्राम माँग लो ।।
सारा पौरुष श्रृंगार माँग लो ।
साँसों से तुम प्राण माँग लो ।।
बस हँसते हँसते हाँ ।
कभी न निकले ना ।।
कुछ ऐसा होता है पिता ।
क्या हम हो सकेंगे कभी ?
इस ईस्वर के आस पास कहीं …
शायद तब समझ सकें हम भी ।
क्या होता है पिता ?
……

*3–चेहरे*

चेहरे ही बयां करते है,
इंसान के हुनर को ।
नजरें ही पढ़ा करतीं हैं ,
हर एक नज़र को ।
क्यों इल्ज़ाम फिर लगाएँ ,
इस मासूम से ज़िगर को ।
दिल झेलता है फिर भी,
दर्द के हर कहर को ।
चेहरे ही बयां करते हैं ,
इंसान के हुनर को ।
शब्दों ही ,ने उलझाया ,
शब्दों के असर को ।
मिलें सब जिस नज़र में ,
कहाँ ढूंढे उस नज़र को ।
मासूमियत ने देखो ,
किया ख़त्म , हर असर को।
चेहरे ही बयां करते हैं ,
इंसान के हुनर को ।

…….

4– *एकाकी इस जीवन मे*

नींद नही आती अब ,
पलकों पे रात बिताने को ।
रोतीं रातें क्यों अब ,
शबनम के अहसासों को ।

भूल गई क्यों अब,
अलसाए इन भुनसारों को ।
खोज रहा अंबर अब ,
तिमिर सँग चलते तारों को ।

नींद नही आती अब,
पलकों पे रात बिताने को ।

भूल रहे क्यों अब,
अपने ही अपने वादों को ।
रुके कदम क्यों अब,
पाते ही मुश्किल राहों को ।

एक अकेला चल न पाएगा ,
बीच राह में थक जाएगा ।
कैसे अपनी मंजिल पाएगा ।
आ जा तू साथ बिताने को ।

नींद नही आती अब ,
पलकों पे रात बिताने को ।

छोड़ राह मुड़, तू जाना ।
आधी राह चले , तू आना ।
कुछ दूर चले भले कोई ,
जा फिर , वापस आने को ।

राहों से बे-ख़बर नही मैं ,
एकाकी इस जीवन में ,
साथ चले बस मेरे कोई ।
मंजिल तो एक बहाने को ।

नींद नही आती अब,
पलकों पे रात बिताने को
………

5- *ख़्वाबों की खातिर*

सोया हूँ ख़्वाबों की ख़ातिर ,
मुझे नींद से न जगाना तुम।
आना हो जो मुझसे मिलने ,
ख़्वाबों में आ जाना तुम ।

यह दुनियाँ ,नही हक़ीक़त ।
यह दुनियां एक फ़साना है ।
ठहरा नही यहाँ कभी कोई,
यहाँ तो आना और जाना है ।

ख़्वाबों की दुनियाँ ही , सच्ची झूठी है ।
यह दुनियां तो , झूठी सी सच्ची है ।

ख़्वाबों में असल तसल्ली होती है ।
दुनियां में ,तल्ख़ तसल्ली होती है ।
ख़्वाबों में ही , हँस रो लेते हम।
ख़्वाबों में हर बात बयां होती है ।

इस दुनियां में तो , उसकी मर्ज़ी है ।
रोने हँसने की,उसकी ख़ुदगर्ज़ी है।
यहाँ रोते हैं , उसकी मर्ज़ी से ,
हँसने में भी, उसकी ख़ुदगर्ज़ी है ।

जी न सकें जो ,यहाँ जी ते जी,
मर कर वो, यहाँ ज़िंदा रहते हैं।
इस जी ते जी ,मरकर जी ने से,
ख़्वाबों की दुनियां ,कितनी अच्छी है।

मौत नहीं जहाँ दूर तलक ,
ज़िंदगी इनमें बस मिलती है।

खोया हूँ ख़्वाबों की ख़ातिर,
मुझे नींद से न जगाना तुम ।
आना हो जो मुझसे मिलने,
मेरे ख़्वाबों में आ जाना तुम।

…….

6– *आँख आँख नीर*

अब तो आँख आँख नीर बहाती है ।
ग़म के बादल से छाई अँधियारी है ।

टूट रहीं है सीमा पर डोरे जीवन की ,
दुश्मन की गोली चुपके से आ जाती है ।

राख हुए सपने यौवन मन के ,
डिग्री को दीमक खा जाती है ।

अहं भाव के मकड़ जाल में ,
मंदिर मस्ज़िद उलझीं बेचारी है ।

लिपट रहे अँधियारे उजियारों से ,
अपनो की अपनो से सौदेदारी है ।

गहन निशा हर दिन कुंठाओं की ,
दिनकर को भी ढँक जाती है ।

राह नही सूझे कोई अब तो ,
राहें राहों में उलझी जाती हैं ।

तारा भी न चमके भुंसारे का ,
निशा गहन की ऐसी सरदारी है ।

अब तो आँख आँख …

……..

7- *कड़े फैसले*

पठानकोट हमले के बाद लिखी रचना
गुरुवार, 7 जनवरी 2016

आज कड़े फैसले लेने होंगे,
कुछ अनचाहे निर्णय लेने होंगे।
करते जो छद्म वार ,
बार बार हम पर ।
मांद में घुस कर ,
वो भेड़िये खदेड़ने होंगे ।
आज कड़े फैसले …..

अब न समझो ,न समझाओ।
अब तो ,आर पार हो जाओ।
जाकर दुश्मन के द्वार ,
ईंट से ईंट बजा आओ।
आज कड़े फैसले ….

कितना खोयें अब हम ,
अपनी माँ के लालों को।
कितना पोछें और सिंदूर हम,
अपनी बहनों के भालों से।

सूनी आँखे , सूना बचपन,
ढूंढ रही पापा आएंगे कल।
देखो उस अबोध बच्ची को,
कांधा देती शहीद पिता की अर्थी को।
आज कड़े ….

यूं चाय पान से कोई माना होता ।
तब धनुष राम ने न ताना होता ।
तब चक्र कृष्ण ने न भांजा होता ।
बन जाओ राम कृष्ण तुम भी ।
देर नही चेतो जागो अब भी ।
उठा धनुष चढ़ा प्रत्यंचा, दे टंकार कहो ,
दुश्मन तेरी अब खैर नहीं ।
आज कड़े फैसले लेने होंगे ..

…. *विवेक दुबे “निश्चल”* @…..

2 Comments

  1. अशेष आभार अन्तरा शब्दशक्ति समस्त टीम को ।

    Reply
  2. अन्तरा शब्द शक्ति परिवार के, सृजक सृजन समीक्षा विशेषांक में स्वागत है आपका आ विवेक दुबे जी
    संक्षिप्त परिचय, प्रकाशन, आत्मकथ्य बहुत प्रभावशाली है। सहज, सरल हृदय से निकले भाव और अभिव्यक्ति आपकी सारी रचनाओं में दिखाई देती है।
    साहित्यकार पिता के पुत्र होने के कारण , सृजन की प्रतिभा स्वाभाविक रूप से जुड़ी हुई है।
    *माँ*, के आँचल में पूरी सृष्टि समाई है, सुन्दर रचना।
    *पिता*, सच कहा, प

    Reply

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