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Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

डॉ मीनू पाण्डेय, भोपाल

Priti Surana 7 months ago
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इस सप्ताह सृजक-सृजन-समीक्षा में प्रस्तुत है *डॉ मीनू पाण्डेय, भोपाल* का परिचय आत्मकथ्य एवं रचनाएं। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता
*अन्तरा-शब्दशक्ति*

*साहित्यिक परिचय*

नाम -ड़ाॅ मीनू पाण्डेय
साहित्यक उपनाम -नयन
जन्म तिथि -19 फरवरी
जन्मस्थान -उत्तर प्रदेश
वर्तमान पता -39, सुरभि परिसर ,अयोध्या वाय पास रोड़, भोपाल
पिनकोड़ -462041
राज्य -मध्य प्रदेश
शिक्षा -पी एच डी(दो विषयों में)पी जी(तीन विषयों में)
कार्य क्षेत्र -प्रोफेसर (अंग्रेजी )
सामाजिक क्षेत्र -बुजुर्गो की सेवा,युवाओं एवं वयस्कों की काउंसलिंग, पशु सेवा
विधा -मुक्त ,दोहा, ग़ज़ल, लघुकथा, मुक्तक
मोबाइल -9893987434
ई मेल -pmeenu91@gmail.com

*प्रकाशन* -अंग्रेज़ी शिक्षण पर ग्यारह  पुस्तकें प्रकाशित, शोध पर तीन पुस्तकें प्रकाशित ,

रिसर्च पेपर – 50 विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय जर्नलस में प्रकाशित

प्रकाशित रचनायें
*एकल संग्रह* -थोड़ा सा रूमानी हुआ जाए

*साझा संग्रह*
* काव्य सौंदर्य, वी पी वी पब्लिकेशन, पुणे
*हिन्दी सागर त्रैमासिक पत्रिका अंक जनवरी -मार्च 2017
अप्रैल -जून 2017
जुलाई – सितंबर  2017
* कश्ती में चांद, के जी पब्लिकेशन, मथुरा -जून 2017
*अल्फाज के गुंचे , अजमेर पोस्ट्स कलेक्टिव अगस्त2017
*संदल सुगंध, आगमन समूह,नई दिल्ली,  सितंबर 2017
*अनुभूति, सत्यम प्रकाशन, नवम्बर  2017
*मृगनयना, सत्यम प्रकाशन 2017
*भाषा सहोदरी सोपान -4
*के.बी.एस.प्रकाशन द्वारा ‘स्पन्दन, 2018
*के.बी.एस. प्रकाशन द्वारा मकरंद, 2018
*भाव स्पंदन -साहित्य संगम संस्थान, इंदौर द्वारा प्रकाशित, 2018
*उजास -उद्दीप्त प्रकाशन, कानपुर ,2018
*अविरल धारा -उद्दीप्त प्रकाशन, कानपुर,  2018
*साहित्य उदय -उदीप्त प्रकाशन, कानपुर, 2018
*वुमन आवाज -अंतरा शब्द शक्ति प्रकाशन, 2018

**40 से अधिक रचनाएं विभिन्न समाचार पत्रों  में प्रकाशित

*आगामी  साझा संग्रह* में रचनाएं
1 . काव्य अंकुर
2. काव्य गंगा
3. अभिव्यक्ति,
4.अर्पण,
5 .काव्य किरण,
6.संरचना ,
7. काव्य करुणा और
8. अरुणोदय

*प्रधान संपादक* -IJILS journal

*अतिथि सम्पादक* -हिन्दी सागर पत्रिका (जनवरी-मार्च, अप्रैल-जून,जुलाई-सितंबर और अक्टूबर-नवंबर

*संपादक* –
साहित्य उदय
अभिव्यक्ति
अर्पण
काव्य किरण

संपादक -साप्ताहिक सौम्य संवाद बुन्देली संस्करण(समाचार पत्र )

*पद*
अध्यक्ष -राष्ट्रीय महिला काव्य मंच, भोपाल
अध्यक्ष -युवा साहित्य स्पंदन रचनाकार मंच, मध्यप्रदेश
सचिव -बुंदेली साहित्य समिति

*सम्मान*
* सृष्टि (भोपाल )2013 द्वारा उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान  (for Communication Skills )
* प्रगतिशील ब्राह्मण संस्था (भोपाल )2016
द्वारा प्रगतिशील शिक्षक सम्मान
*ज.मे.ए. एवं एशि .मे.एसो .(  बैंकाक  )द्वारा अवार्ड ऑफ एक्सीलेंस इन टीचिंग 2016
*होलसम डेवलपमेंट सोसाइटी द्वारा महिला गौरव सम्मान 2017
*सी आई आई द्वारा सिस्टेक गुरू अवार्ड  2017
*विश्व रचनाकार मंच द्वारा हिन्दी सागर सम्मान 2017
*सोशल रिसर्च फाउंडेशन द्वारा शोध परक सम्मान  2017
* वी पी वी पब्लिकेशन द्वारा
काव्य सौंदर्य सम्मान 2017
* जे एम डी पब्लिकेशन द्वारा    सर्वश्रेष्ठ कवियत्री सम्मान 2017
* के जी पब्लिकेशन द्वारा साहित्य सारथी सम्मान  2017
*जे एम डी पब्लिकेशन द्वारा  श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान 2017
*सत्यम प्रकाशन  द्वारा काव्य सागर  सम्मान 2017
*भाषा सहोदरी हिंदी द्वारा  भाषा सहोदरी सोपान सम्मान 2018
*अंतरा शब्द शक्ति द्वारा अंतरा शब्द शक्ति सम्मान 2018
*”वीणा पाणि “सम्मान ,साहित्य संगम संस्थान, दिल्ली,मार्च  2018
*उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान 2018, सृजन 2k18 ,भोपाल
* साहित्य सरोज शिखर सम्मान, गहमर वेलफेयर सोसायटी द्वारा, अप्रैल 2018
*बुंदेली साहित्य सृजन की नव कलम, मिशन फाॅर मदर संस्था, भोपाल, अप्रैल 2018
*सामाजिक कार्य*
**
‘आश्वास’ संस्था के जरिए पिछले दो वर्षों से बच्चों द्वारा किसी भी तरह के दवाब मे आकर स्वयं को खत्म करने  (आत्म हत्या) को कैसे रोका जाए ।यह दवाब परीक्षा का हो सकता है या अन्य कोई भी वजह हो सकती है ।
**
युवाओ की काउंसलिंग
जब भी वो किसी भी प्रतिस्पर्धा में असफल होते है तो उन्हें समय समय पर  मार्गदर्शन देना ।
**
मिशन फाॅर मदर संस्था के जरिए माँ की गरिमामयी उपस्थिति उनके घर में रहे यह प्रयास किया जाता है और वृद्धा श्रम से उन्हें वापस अपने घर भेजा जा सके इसके लिएउनके परिवार की काउंसलिंग की जाती है ।

*आत्मकथ्य*

यूँ तो मन की भावनाओं को कविता रूप में ढालना बचपन से ही अच्छा लगता था।परन्तु कुछ बातों को अक्सर काॅपी के अंतिम पेज पर ही स्थान मिला।जब ये बात मेरे पापा को पता चली तो उन्होंने एक बहुत सुंदर सी ड़ायरी मुझे गिफ्ट की और कहा, ” आज से जो कुछ लिखना है इसी में लिखा करे। एक ही भाव बार बार नहीं आते इसीलिए उनको सहेजना जरूरी है ताकि बाद में उसको परिष्कृत किया जा सके “। और बस मेरी साहित्य की नर्सरी की यात्रा इस तरह शुरू हो गई ।जो काफी वर्षों तक यूँ ही अनवरत चलती रही और ड़ायरी मेरी सखी का कार्य करती रही।शादी के बाद भी एक -दो साल तक यह कार्य अनवरत चला पर बच्चों के साथ कुछ यूँ उलझी कि दोनों ड़ायरियां सिर्फ अलमारी का हिस्सा बन कर रह गई । पिछले वर्ष जब मैं बीमार पड़ी तो वेड- रेस्ट करते-करते जब बड़ी बोरियत सी होने लगी । तब लगा कि कुछ लिखा जाये ।और यूँ ही लिखकर फेसबुक पर पोस्ट कर दिया करती थी । लोगों की सराहना मिलने लगी और मेरा उत्साह बढता गया । फिर फेसबुक पर ही कुछ साझा संग्रह प्रकाशित होने के विज्ञापन देखे तो सोचा मैं भी अपनी रचनाऐं भेजूं बस फिर क्या था एक के बाद एक, इस तरह से अब तक 40 साझा संग्रह आ गए । फेसबुक में और लोकार्पण समारोह के दौरान बहुत से कवि एवं कवयित्रियों से मुलाकात हुई और बस वही सब सीखने की प्रेरणा बनते गये।मेरे पति और बच्चों का विशेष सहयोग रहा है मुझे प्रोत्साहित करने में । प्रोग्राम के लिए साथ आने-जाने मेंं ।बहुत खुश नसीब हूँ कि आभासी दुनिया में भी सच्चे दोस्त एवं सहेलियाँ मिली । इस प्रकार फेसबुक यूनिवर्सिटी से साहित्य में नई डिग्री हासिल कर ली ।

*रचनाएँ*

*1-दोहे*

मानवता को कर गया जो, बिल्कुल तार तार।
फिर भी धर्म में खोज रहे, उसके व्याभिचार।

धर्म बड़ी ही चीज है, औछों में न ढूँढ़।
दानव का कोई धर्म है,कैसे हो तुम मूढ।

जिसने दिलो दिमाग पर,हवस भर ली आप।
उसके लिए क्या पुण्य है,और क्या है पाप।

इन हवस के दरिंदो को,जिंदा ही जला दो आज।
उन बेकसूर मासूमों की, कुछ ऐसे बचा लो लाज।

वो दबी हुई  आवाज सुन,सुन चीत्कार  चहुँओर।
अभी भी जो सोते रहे, फिर कभी न मिलेगी ठौर।

रक्षक जब भक्षक बनें, कहाँ करें प्रतिकार ।
जनता को होगा जागना,जब सोती है सरकार।

*2.मानवता के नजारे*

राजनीतिक गलियों में, अंधियारे से हो गए।
हर नेता जनता की नजर, मे बिचारे से हो गए।

कभी सर्व धर्म  सद्भाव का,जो  पाठ पढ़ाते थे ।
अब सवर्ण और दलित, दो किनारे से हो गए।

भूल चुके पाठ विवेकानंद, का विश्व बंधुत्व का।
अब तो भारत के ही हिन्दू ,दो धारे से हो गए।

खुश होंगे भारत को, इंडिया बनाने बाले अब।
फूट ड़ालो और राज करो के मंत्र,अब जयकारे से हों गए।

पहले जहाँ हिन्दू-मुस्लिम सिख्ख ईसाई , रहा करते थे देश में।
अब मानवता तो चली गई विदेश, जिसकी लाठी उसकी भैंस के नजारे से हो गए।

प्रेम जहाँ पीगें, भरता था हर दिल में ।
वैमनस्यता के दिल में, गुब्बारे से हो गए।

क्या हमारे देश को यूँ ही , जबान होना था।
ऑंखों में बसे प्रेम के आँसू , अब खारे से हो गए।

बच्चों को क्या  परोस रहे है, संस्कृति के नाम पर।
सोचा तो मानवता की गली में, अंधियारे से हो गए।

आज सभी दिखावटी चोला, बदलते हैं इतने बार।
कई बार किया ब्रेकअप,हर बार कुंवारे से हो गए।

कहने को हिन्दी, मातृभाषा है हमारी।
फिर क्यों अंग्रेजी की अधिपत्तता के इशारे से हो गए।

*3.मन की आस*

मन के पिंजरे खोल कर, जो आओगे इस पार।
तुम्हें समर्पित कर दूँगी, एक उद्वेलित सा प्यार ।

रहूँ सदा संज्ञान में,नहीं बिसारो मोय।
तुम बिन जीवन जीना,हमसे कभी न होय।

मन भरे हैं पींग सी, दौड़ दौड़ अकुलाए।
कब प्रेयसी के संग,मिलन हिय करपाऐ।

भरा कटोरा प्रेम का, कैसे दूँ छलकाए।
साजन कितने दूर है,संदेश ही आ जाऐ।

उनके हृदय की प्रीत हूँ, सोच सोच मुस्काऊँ।
हर्षाई इस बेला में,कैसे मन पर काबू पाऊँ।

आप चाहो तो त्याग दो, मुझको मलिन शरीर ।
मन में आके देख लो, उद्वेलित/ जो बंधी प्रेम जंजीर।

मैं तो तेरी आस हू, मेरी आस अनेक ।
रहें सलामत हर कभी, आस रहे न शेष।

*4.पिंजरा*

रहते हैं पिंजरे में पर नजर नहीं आते।
हम वो है जो कैद होने से नहीं शर्माते ।

उन्मुक्त मन हमारी चाहत नहीं है ।
उन्मुक्त हो तो लगता है, लोगों को जरूरत नहीं है ।
कैद हो,………… जंजीरों पे इतराते।
पिंजरे हमको बहुत ही लुभाते।

मन तो बाबरा है तुम को चाहे है।
जब तुम न थे तुम्हारी तस्वीरें उकेरी थी।
जब तुम मिले ……तुम्हें तस्वीरों से मिलाते।
बंधन हमको बहुत ही लुभाते।

कभी माँ-बाप के आसरे होकर।
हौसला उसी कैद में मिलता था।
जब से बंधी हूँ तेरे बंधन में……निश्चिंतता का गीत गाते।
तुम संग रिश्ते बहुत ही लुभाते।

मन ने खुद को अलग माना ही नही ।
बिन बच्चों के जमाना ही नहीं।
बच्चों के संग ही जीती हूँ……बच्चों हर माँ को भाते।
साथ बच्चों के बहुत ही लुभाते।

पूर्णता पाई हर बंधन में बंध कर।
हर रिश्ता बना ड़ाला अजर अमर।
विविध किरदार निभाऐ है ………सोच कर हम भी इतराते।
हर किरदार बहुत ही लुभाते।

हे ईश्वर मैं हमेशा पूर्ण   रहूँ।
सबको खुशी दूं ऐसी ही बनूँ।
सामंजस्य सारे कर ड़ाले……हो गये परिपक्व इस उम्र तक आते।
हमको बंधन मन के बहुत ही लुभाते ।

*5.धन्य दर्द है*

मैने  इस मन में सिर्फ दर्द को ही पाला है ।
दर्द ही मेरी भक्ति है दर्द ही शिवाला है ।

और कौन है जो मुक्ति दे सके मुझको मेरे दर्दों से।
अब तो उम्मीद न रही दुनियाभर के बेदर्दों से।

अब उनकी इसी निशानी को जीवन का राग बनाया है ।
इससे ही चैन मिलता है इसे ही तपती आग बनाया है ।

एक पीर ने जाने कितने सपने अपने कर दिए ।
इसी पीर को अब जीवन श्रृंगार बनाया है ।

कोई नहीं हो जग में अपना पीर तो अपनी साथी है।
नहीं कोई पूछता है अब क्यों मन में छाई उदासी है।

इस दुनिया के हर कोने में हर कोई पीर से बचता है ।
और अपना जीवन तो बस गमों के ही सहारे कटता है ।

खुशी से शायद मेरी अब ज्यादा न पटती है ।
कभी-कभी मिल जाती है पर ज्यादा नहीं ठहरती है ।

मिली ठौर जबसे है गम की,कुछ अजीब सी निखरी हूं।
नहीं मानती कि अब मैं जाने कितनी बिखरी हूं।

हाथ छोड़ हो लिया किनारे, गम की ये तासीर नही।
खुशी का ओवरडोज ये मेरी तकदीर नहीं।

मैं भी गम की हो बैठी हूं जब से मोहब्बत देखी है ।
कोई तो है दुनिया में जिसकी इतनी चाहत देखी है ।

गम गम करके अब क्या रोना अब तो ये ही रंगत है।
मुझे ठोकर लगाने बालो, अब तेरी नहीं जरूरत है ।

जिस गम ने मुझे पाला पोसा आज काबिल बना ड़ाला है ।
यही वो गम है जिसके भरोसे दिल बना शिवाला है ।

आज नाव मझधार न डोले न ही मन खाते हिचकोले ।
ऐसे साथी के संग तो जीने का मजा भी आया है ।

ईश्वर साथ है कर्म साथ है बात नही फिर ड़रने की।
हमने तो जन्नत देख ली बात करें क्यों मरने की ।

जिस जिसने धोखा दिया सभी का शुक्रिया ।
आप सभी के सहयोग से ही आज आत्मबल मुझे मिला।

मैं न ठहरी अंधियारों में ।
फिर क्यों ठहरूं उजियारों में।

जीवन के अनवरत बहाव में ।
क्यों देखूं कोई ठहराव में ।

गम का ये आशीर्वाद रहा है उसने कर्मशील बनाया है ।
मैने जो कुछ पाया बस गम सह सह कर ही पाया है ।

हे गम आज तहेदिल से शुक्रिया करती हूं ।
तन-मन-आत्मा के निखार का तुझको हक अदा करती हूं ।

वो जिन्होंने तन्हाई दी गले लगा के पीर पराई दी।
उनसे बेहतर तो तुम हो ।
मुझ को समर्थ बना कर आज कहां तुम गुम हो ।

छोड़ न देना साथ तुम मेरा अभी गुरु दक्षिणा देनी है ।
सारी दुनिया को भुलाकर शरण तेरी ही लेनी है ।

*6.हकदार*

जैसे जैसे हकदार बड़े हो गए ।
दरमिया उनके फासले हो गए ।
अब याद बचपन का प्यार उन्हें न रहा ।
सिर्फ हक के लिए बेअदब बड़े हो गए ।
क्या चाचा ताऊ क्या बुआ कोई।
अनजान सब करीबी रिश्ते हो गए।
साम दाम दण्ड भेद अपनाने लगे।
आज्ञाकारी बाप के बेटे मनचले हो गए।
दादा-दादी पर पूरा प्यार उमड़ने लगा ।
दूर बचपन से थे वो फासले हो गए।
चाहतों का ध्यान यूं रखने लगे।
मानो सगे कोख से पले हो गए।
प्यार की नदियां सी बहने लगी ।
मंजूर दादा-दादी के सब फैसले हो गए।
किस से दुश्मनी किससे मोहब्बत निभानी किस जगह।
हर जोड़ तोड़ पर शर्तिया बड़े हो गए ।
खौफ जदा से हैं लोग इतना प्यार देखकर ।
मजबूत बंधन आखिर खोखले हो गए।
जाने कौन रात पूनम की रात हो।
यह सोचकर रोज रतजगे हो गए ।
क्यों चाहिए धन दौलत किसी और की ।
धिक्कार है मक्कार ही दावेदार बड़े हो गए ।
राजनीति घर घर में अब चलने लगी ।
जैसे चुनाव में अनेक दल खड़े हो गए।

*7.एक ऐसा भारत*

मैं रोतों को हंसाना चाहती हूँ ।
इस तरह, मुस्कराना चाहती हूँ।

मैं गिरते को उठाना चाहती हूँ।
स्वाभिमान ,जगाना चाहती हूँ।

खत्म कर पाऊँ ,चेहरों के नकाबों को ।
इंसानियत, फैलाना चाहती हूँ।

भूखों को रोटी,मिल जाये है, चाहत मेरी।
भुखमरी दूर ,भगाना चाहती हूँ।

क्यों हम छीने, छल बल से, सुकूं लोगों का।
चहक जायें ,ऐसा जमाना चाहती हूँ।

हो मानव तुम, मानवता का पाठ पढ लो।
जाति धर्म की, दीवारें हटाना चाहती हूँ।

सब लगें अपने , हो उसमें कोई गैर नहीं ।
एक ऐसा, भारत बसाना चाहती हूँ।

*डॉ. मीनू पाण्डेय*

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2 Comments

  1. डॉक्टर मीनू जी का परिचय पढ़ा | उनके दोहे लाजवाब है |

    Reply
  2. Ram chandra Killedar July 8, 2018

    सादर नमस्कार
    अंतरा शब्दशक्ति के माध्यम से आपके दोहे पढने को मिले ” लाजवाब” है |

    Reply

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