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शीतल प्रसाद खंडेलवाल, इंदौर

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

शीतल प्रसाद खंडेलवाल, इंदौर

Priti Surana May 18, 2018
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इस बार *सृजक-सृजन-समीक्षा विशेषांक* में प्रस्तुत है शीतल प्रसाद खंडेलवाल, इंदौर का परिचय, आयमकथ्य और रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता

अन्तरा-शब्दशक्ति

*परिचय*

नाम – शीतल प्रसाद खंडेलवाल
पिता – श्याम सुंदर खंडेलवाल
माता – शारदा देवी खंडेलवाल
जन्म तिथि -20 नवंबर 1974
जन्मस्थान -भवानी मंडी (राजस्थान)
वर्तमान पता -503-डी, स्काई हाइट्स, नवलखा स्क्वायर इंदौर
पिनकोड़ -452001
राज्य -मध्य प्रदेश
शिक्षा -बी कॉम, चार्टर्ड अकाउंटेंट
कार्य क्षेत्र -प्रैक्टिसिंग चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, डायरेक्टर इन सिफ्ट कॉरपोरेट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
विधा -ग़ज़ल, मुक्त तुकांत एवं अतुकांत रचनाएँ
मोबाइल -9826010292
ई मेल -khandelwalsp@yahoo.com

*साझा संग्रह*
*के.बी.एस.प्रकाशन द्वारा स्पन्दन, 2018
*के.बी.एस. प्रकाशन द्वारा गुंजन , 2018

*सम्मान*
*अंतरा शब्द शक्ति द्वारा अंतरा शब्द शक्ति सम्मान 2018

*आत्मकथ्य*
आज ये मेरा पहला मौका है कि मैं मन की बातें बता पा रहा हूँ, मैं अपने बारे में कहाँ से और कैसे शुरू करूँ नहीं समझ रहा है, आज तक सभी गुणीजनों के लिए लिखता आया हूँ और आज खुद के बारे में लिखना बड़ा सुखद महसूस हो रहा है।
सब से पहले तो यह कि मैं जिंदगी को जीने वाला इंसान हूँ, थोड़ा भावुक तो मजबूत भी हूँ, मेरे पिताजी से बहुत प्रभावित हूँ वो मेरे पिता ही नहीं बल्कि सच में एक दोस्त और शेयरिंग एंड केयरिंग पार्टनर है, शायद यही कारण है कि मेने जीवन में सारे निर्णय खुद लिए है, फिर वो पढ़ाई का हो, शादी का हो, कार,घर खरीदने का हो,इत्यादि,,, और वजह मेरे पिताजी, जिन्होंने हमेशा मुझे इस काबिल समझा, विश्वास जताया और इस लायक बनाया। आज मैं जो भी हूँ जैसा भी हूँ, और जो मेरी सामाजिक आर्थिक हैसियत है वो मेरी खुद की है और इस के प्रेरणा स्त्रोत मेरे पिताजी!!

भवानीमंडी से हिंदी मीडियम में बी कॉम कर के 20 अगस्त 1994 को पहली बार इंदौर की धरती पर सी ए करने के लिए कदम रखा, और अंततः 2001 मैं वो पल आया जब मैं सी ए शीतल खंडेलवाल होकर गौरान्वित था, ये 6-7 साल का काल मेरे जीवन का सब से महत्वपूर्ण काल था जहाँ सही मायने में मैने जीवन की शिक्षा प्राप्त की,  गेराज पोर्शन में दोस्तों के साथ रहना, 40 km साईकल चला के ऑडिट पे जाना, रात को 11 बजे टिफ़िन खाना, ऐसा टिफ़िन जहां पहली बार पता चला कि दाल भिंडी मिक्स सब्जी भी होती है, इतने थके हुए होते थे कि फर्श बिस्तर होता था और न तकिया न ओढ़ने की चादर, फिर भी सुकूँ भरी नींद ,और साथ में पढ़ाई भी करना। लेकिन सब से अच्छी बात कि, तब भी मैं बहुत खुश था, न किसी से शिकायत न शिकवा गिला और एक अलग ही खुशनुमा मेहनती जिंदगी दोस्तों के संग,ठिलवाई,, मस्ती,,गाने गाना खुश रहना और पढ़ाई करना। जिंदगी के हर रंगों में घुला हर दिन होता था,,और इसी बीच मिल गयी प्रीति के रूप में जीवन संगनी जो खुद सी ए और सी एस दोनों है, जिसका सहयोग मेरे जीवन में हर कदम दर कदम रहा और हम ने पाए दो अनमोल रत्न दिशा और अन्वी के रूप में।
मैं आज भी अपने जीवन से बहुत खुश हूँ, अमूमन संतुष्ट हूँ कुछ बिना परेशान करने वाली ख़्वाहिशों को छोड़ कर, मुझे दुनिया में किसी से कोई शिकायत नहीं है, न किसी से किसी प्रकार की स्पर्धा, क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि जो मैं हूँ वो मैं हूँ और कोई मुझे खुद से नहीं छिन सकता, इसी प्रकार जो जिसका है वो उसका और उसे भी कोई नहीं छिन सकता।

अब रहा सवाल लेखनी का, तो बहुत रोचक है, बचपन में जब प्यार हुआ और जब वो दूर हुई तो कलम ने सहारा दिया तब मैंने बस एक दो रचना कुछ शैर लिखे फिर मशगूल हो गया पढ़ाई में, तब से अब तक कलम ख़ामोश थी, कुम्भकर्ण के जैसे उठी बीच बीच में और एक दो पैरोडी लिख के सो जाती थी। लेकिन जब मैं काव्य महफ़िल परिवार से 2 वर्ष पूर्व और अंतरा परिवार से लगभग 1 वर्ष पूर्व जुड़ा और फिर वहाँ मुझे जो जोश, साथ, साथी गुरु, और मार्ग दर्शक
मिले और मिलते रहे तो आज तक मैं सब के सानिध्य में अपने आप को निखार ही रहा हूँ, यकीनन मैं साहित्य क्षेत्र का बहुत ही छोटा सा प्रशिक्षु ही हूँ और अभी भी खुद को तराश रहा हूँ,  साल भर पहले तक तो काफिया रदीफ़ क्या होता है नहीं पता था,निःसंदेह मेरी लेखनी मैं तकनीकी खामियाँ भी होगी लेकिन सच कहूँ तो, जो भी लिखता हूँ पूरा पूरा दिल से लिखता हूँ और मुझे शब्दों की जादूगरी भी नहीं आती है, जो भाव दिल में उभरते है सीधे सरल लिख देता हूँ और जो भी लिखता हूँ उस से मुझे असीम खुशी मिलती है तो कई बार मन भी नहीं करता है कि उनमें नियमानुसार सुधार करूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि ये मेरी गलती है और विधा विधान के विपरीत, इसलिए मैं सभी गुणीजन से इस कृत्य के लिए अग्रिम माफ़ी भी मांगता हूँ,और प्रार्थना करता हूँ कि वो शब्दों से परे मेरी भावनाएं पढ़े।
मैं अग्रिम आभार व्यक्त करता हूँ सभी सम्मानीय एडमिन्स का जिन्होंने मुझे केंद्रीय रचनाकार के रूप में चयन कर मुझे यह गौरव प्रदान किया।

*रचनाएँ*

*1- गजल- ढूँढता हूँ*

अपने लिए,,,, एक आशियाना,,,, ढूँढता हूँ
दिल में खुद का,,, एक,,, ठिकाना ढूँढता हूँ

किया बंद तूने जो,,,,,,,,, आँखों से पिलाना
अब  मैं  पीने  को,,,,,,,,,, मैखाना ढूँढता हूँ

मुद्दतों से है मुझे,,,,,,,,,,,,,,,,,,, तेरा खयाल
हाँ, मैं तुझ में,,,,,,,,,,,,, मुस्कुराना ढूँढता हूँ

एक माँगो तो मिले,,,,,,,,,,,,, तुमको हजार
दुआ   का  मैं,,,,,,,,,,,, वो पैमाना ढूँढता हूँ

आजकल ये इश्क़ टिकता ही,,,,,,, कहाँ है
ताउम्र चले,,,,,, वो,,,,,,,, फ़साना ढूँढता हूँ

गज़लें जो दिल से,,,,,,, मुकम्मल थी कभी
महफ़िलों में,,,,,, वो,,,,,,, जमाना ढूँढता हूँ

छोड़ दिया शीतल ने दामन,, अब गमों का
दिल भी अब मैं,,,,,,, आशिकाना ढूँढता हूँ

*2 – गजल- फिर चले जाना*

बैठिये न पल दो पल,,,,,,,,,,,,, फिर चले जाना
हो रही दिल में हलचल,,,,,,,,,, फिर चले जाना

यूँ शरमा के बैठने का ,,,,,,,,,क्या है नतीजा यार
करने दे मुझको पहल,,,,,,,,,,,, फिर चले जाना

तड़प रही है बाहें मेरी,,,,,,,,,,, तड़प रहें है लब
दिल रहा अभी मचल,,,,,,,,,,,, फिर चले जाना

तेरे नाम की मय  साकी ने,, खूब पिलाई आज
पहले जाऊँ मैं सँभल,,,,,,,,,,,, फिर चले जाना

जिद न कर तू  जाने की,,,,,,पास घड़ी भर बैठ
पहले लिख लूँ मैं ग़ज़ल,,,,,,,,, फिर चले जाना

मुझको डराती है तन्हाई,,,,,,,और अकेली रात
जाने दे तू रात को ढल,,,,,,,,,, फिर चले जाना

इश्क़ की मेरे आज  तू ले ले,,,  चाहे  इम्तिहान
कर देना मुझको सफल,,,,,,,,, फिर चले जाना

तू गया गर शीतल तो ये,, रूह निकल जायेगी
पहले  मौत को  जाने दे टल,  फिर चले जाना

*3 – तू महलों से निकल के देख…*

सोंधी मिट्टी की खुशबू में बिखरी ठाठ सी मेरी जिंदगी
तू महलों से निकल के देख,,,,,,,,,राजसी मेरी जिंदगी

सोच..जहाँ धरती बिस्तर, आकाश मेरा चादर है
जहाँ चाँद मेरी अगुवाई करे और चांदनी का सागर है
टिम टिम तारों के संग बतियाती मेरी जिंदगी
तू महलों से निकल के देख,,,,,,,, राजसी मेरी जिंदगी

लहराती फसलों के अंदर छिपा छिपी खेलूँ जब
कंचे,अंटी,गिल्ली डंडा, कीचड़  में ये खेलूँ  सब
प्रकृति के आँचल में इठलाती मेरी जिंदगी
तू महलों से निकल के देख,,,,,,,,, राजसी मेरी जिंदगी

न बीते पल का गम है, न आने वाले पल की चिंता
न तन पे कपड़ो का बोझ न मन में है कोई कुंठा
बेफिक्र फकीरों जैसी मुस्कुराती मेरी जिंदगी
तू महलों से निकल के देख,,,,,,,,, राजसी मेरी जिंदगी

माँ के हाथों की रोटी और बाप के बाहों का प्यार
कंधे से कंधा मिला कर चले जब कृष्ण सा यार
अपनेपन की मगरूरी में यूँ इतराती मेरी जिंदगी
तू महलों से निकल के देख,,,,,,,,, राजसी मेरी जिंदगी
सोंधी मिट्टी की खुशबू में बिखरी ठाठ सी मेरी जिंदगी

*4- उम्मीद वफ़ा की करती हो..*

इतनी जफाएँ दे कर भी, उम्मीद वफ़ा की करती हो
ओ जफ़ा-गर तुम क्यूँ, बात सज़ा की करती हो

सिवा दर्द के कुछ भी तो, नहीं दिया है तूने
देकर इतने तीखे घाव, बेहाल किया है तूने
ओ बेदर्दी फिर क्यूँ तुम, बात दवा की करती हो
इतनी जफाएँ दे कर भी, उम्मीद वफ़ा की करती हो

मार दिया तड़पा कर, तूने इश्क़ की चाहत में
अब होंश नही रहा हमको, नहीं है कुछ भी राहत में
ओ जालिमा फिर क्यूँ तुम, बात दुआ की करती हो
इतनी जफाएँ दे कर भी उम्मीद वफ़ा की करती हो

बेवफ़ाई करके तुमने मेरे दिल से क्यूँ खेला
तन्हा जींवन जीने को छोड़ दिया क्यूँ मुझे अकेला
ओ हरजाई फिर क्यूँ तुम बात सफ़ा की करती हो
इतनी जफाएँ दे कर भी उम्मीद वफ़ा की करती हो

न कहो तुम मुझको अब क्या रखा है पीने में
पीते पीते मर जाने दो अब क्या रखा है जीने में
जाम ही मेरा सहारा फिर क्यूँ बात खुदा की करती हो
इतनी जफाएँ दे कर भी उम्मीद वफ़ा की करती हो

*5 – आशियाना…*

हाँ.!! सही सुना है
वो ढूँढ रहे है हमारे लिए
आशियाना शानदार
सीमेंट कॉन्क्रीट से बना
साफ सुथरा सुंदर
वातानुकूलित
खुद की इज़्ज़त के अनुसार!!

समझाइश भी दी गयी..
कहा पूरा रूटीन है वहाँ
सुबह से ले कर सोने तक
सब बन्दोबस्त है जहां
न चिंता न फिक्र
केअर टेकर है यहाँ
शुरुआती दौर थोड़ा मुश्किल है
जब घुल मिल जाओगे
सच मे भूल जाओगे सारा जहाँ!!

एक पल को अतीत में चला गया था
जब बच्चो को पलँग पर सुला कर
खुद जमीं पर सोया था
पढ़ाने के खातिर मेरे लाल को
महाजन के आगे हाथ फैला कर
मोटे सूद पे पैसे लेने को खूब रोया था !!

सोचा था पढ़ाएँगे लिखाएँगे
बड़ा आदमी बनाएँगे
जवानी जला दी इस आस में
कि बुढ़ापा सुकूँ से बिताएँगे…

बदकिस्मती से इतना बड़ा आदमी बना दिया
कि बेटे ने माँ बाप तक को भुला दिया
बोझ से लगने लगें थे उनको
इसलिए आशियाने का टिकट कटा दिया..

खैर..
बूढ़ी आँखे कुछ कह न सकी
आँसू भी सुख चुके थे
जर्द बदन कुछ और लायक भी न था
काँपते हाथो में डंडी,
और आँखों पर मोटा चश्मा,
बस मुस्कुरा दिए और चल दिये
आशियाने की और
क्योंकि सपने तो सारे टूट चुके थे
अपनो के हाथों ही हम लूट चुके थे

दिल तो तब तड़प उठा
जर्द बदन तब मचल उठा
जब मुड़ कर जाते हुए बेटों से
बूढ़ी रोती माँ पुकारी….
मिलने तो आओगे न बेटा!!
तब बेटों से सांत्वना की जारी
हम भी इसी शहर में ही हैं
मिलने आएँगे न बारी बारी..

दिलासा मात्र से हम मुस्कुरा गए
और
आशियाने में जा समा गए…..
आशियाने में जा समा गए…..

*6 – मार्च का महीना…*

मार्च का महीना भी
कितना अजीब होता है!!

जाती सर्दी की विदाई तो
आती गर्मी की अगुआई
और इस पशोपेश में..
शरीर की अकडन तो
कभी बुखार की जकड़न
रात में सर्दी तो दिन में गरम
ए सी चलाये या फिर करे पानी गरम
समझ नही आता कि
तबियत हरी है या फिर नरम!!

और ऐसै में…
फाइनेंसियल क्लोजिंग
तो जी एस टी की उलझन
प्रॉफिट की सेटिंग
एडजेस्टमेंट की टेंशन
अप्रैजल की चिंता
तो टारगेट की ठन ठन
सभी के माथे पर लकीरे
कि आखिर हुई कितनी इनकम
और ऊपर से सब पर
मोदी जी के रेस्ट्रिक्शन!!!

और कंप्लीमेंट्री मिलता है…
बच्चो के एग्जाम
और रिजल्ट का मंथन
मायके जाने को लेकर
बीबी से अनबन
छुट्टियाँ की प्लानिंग को लेकर
सब मे होता कोप भंजन
और खून के आँसू रुला देती हैं
कभी फ़िल्फ़कार्ट तो कभी अमेज़न
सच मे हर तरफ सिर्फ है तो है
भन भन..भन भन..

हे भगवन…
ये मार्च का महीना अजीब होता है
उफ्फ वाकई में रकीब होता है..

*7 – गजल – अम्मी कहा करती थी…*

मिट्टी  से   घरौंदे   कभी   बनाया   नहीं   करते
अपनो  पे  ज्यादा   विश्वास जताया नहीं करते

मेरी  अम्मी   कहा   करती   थी   हमेशा   मुझे
दुसरो   का   दिल  कभी   दुखाया  नहीं  करते

इज़्ज़त   से   हारो   जंग    तो   गम   न  करना
धोखे  से  किसी   को  कभी हराया  नहीं करते

एक  दिन  सुपुर्द-ए-खाक  हो  ही  जाएंगे सभी
उधार  की  जिंदगी  पर   इतराया   नहीं   करते

जिस   कश्ती   मैं    हो    सफर    जिंदगी   का
उस   कश्ती   को  कभी    डुबाया   नहीं  करते

इश्क़  करो  तो  पूरी    वफ़ा  से  निभाना  फिर
दिल  तोड़ के  हसीना  को  रुलाया  नहीं करते

और  हो जाये  गर  वफ़ा ए सनम  बेवफ़ा कहीं
ऎसे बेवफाओं के लिए आँसू बहाया नहीं करते

अदब की  महफ़िल है  ये सुनो  मेरे यार शीतल
शायरी के अलावा कुछ और सुनाया नहीं करते।

*शीतल प्रसाद खंडेलवाल*

1 Comments

  1. Arpan Jain May 20, 2018

    उत्सवमूर्ति आदरणीय शीतल खंडेलवाल जी को हार्दिक बधाई…
    पिता के साथ सही मायनों में सम्बंध ऐसे ही होना चाहिए… मैं भी इस मामले में बिल्कुल आपकी तरह भाग्यशाली हूँ|

    सीए होने के बावजूद भी लेखन के लिए समय निकाल पान निश्चित तौर पर सराहनीय है|

    *आपकी रचनाएं’-*

    *1. ढूँढता हूँ*
    उम्दा और सरल शब्द का उपयोग… बेहतरीन

    *2. फिर चले जाना*
    वाह… बहुत खूब

    *3.तू महलों से निकल के देख*
    सरल शब्द पर गहराई से लबरेज

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