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राम भवन प्रसाद चौरसिया (उत्तरप्रदेश)

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

राम भवन प्रसाद चौरसिया (उत्तरप्रदेश)

Priti Surana June 2, 2018
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इस सप्ताह सृजक-सृजन समीक्षा विशेषांक में प्रस्तुत है राम भवन प्रसाद चौरसिया (उत्तरप्रदेश) का परिचय, आत्मकथ्य एवं रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
प्रस्तुतकर्ता
अन्तरा-शब्दशक्ति

*परिचय*
*नाम*- राम भवन प्रसाद चौरसिया ।
*जन्म*- 10–02–1977 ई.
*आत्मज* – स्व श्रीमती फूलमती देवी चौरसिया ।
*आत्मज*- श्री चौधरी प्रसाद चौरसिया ।

*कार्यक्षेत्र*- सहायक अध्यापक
*प्रा वि* -मुहम्मद पुर चटिया
*क्षेत्र*- निचलौल
*जनपद* -महराजगंज
*राज्य*- उत्तर प्रदेश

*जन्मस्थान* ग्राम व पोस्ट-बरगदवा हरैया, क्षेत्र फरेन्दा,जिला-महराजगंज *(नजदीक जनपद-गोरखपुर)*
उत्तर प्रदेश .
*पिनकोड*- 273155

*शिक्षा* बी.ए,बी.टी.सी, सी.टेट

*(लेखन कार्य)*

*पूर्व में* विभिन्न समाचार पत्रों में कविता व संपादकीय व पत्र लेखन।

*(वर्तमान में)*

*विभिन्न श्रेष्ठ सम्मानीय कवि समूहों तथा फेसबुक व व्हाटसप पर कविता और कहानी लिखना।

*विधा-* समसामयिक घटनाओं तथा राष्ट्रवादी व धार्मिक विचारों पर ओजपूर्ण कविता तथा कहानी लेखन मे प्रयासरत ।

*प्रकाशन’* चौरसिया समाज की पत्रिका *नागबेल* मे कई कविताएँ प्रकाशित तथा प्रथम बार प्रकाशित *अंतरा शब्द शक्ति * के लोकजंग एवं *किस्सा कोताह* के बाद *”मगसम”* *चित्र वृत्त* मे प्रकाशित मेरी कई रचनाओं के प्रकाशन का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।

*फेसबुक और व्हाटसप* पर हमारी रचनाएँ बहुत ही पसंद किया जाता है।

*सम्मान-* सम्मान की प्रतिक्षा में। विभिन्न गुणी विद्वान कवियों व लेखकों द्वारा मेरी समीक्षा, कविता तथा कहानी को सराहा जाना *हमारे लिए किसी सम्मान से कम नहीं है।*

=================

*सम्पर्क सूत्र*
(07081818634)
(076520-76248)
*फेसबुक व व्हाटसप सूत्र*
(09935243412)

*Email-*

rambhawan104228b@
gmail.com
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*(आत्मकथ्य )*

बचपन में मैं *”श्री रामचरित मानस”* तथा गीता प्रेस गोरखपुर की विश्व प्रसिद्ध धार्मिक ग्रन्थ *”श्रीमद्भगवद्गीता”* के दोहा,चौपाई और श्लोकों को बड़े चाव से पढ़ता था और मैं मन ही मन सोचता था कि आज हमारा भारतीय समाज पुनः मुगल समाज की तरह धर्म,जाति सम्प्रदाय , छुआछूत अमीर- गरीब तथा नारियों के प्रति दूषित मानसिकता के विचारधारा में दिनोंदिन, स्वार्थ के दलदल में धँसता ही जा रहा है।

क्यों न हम गोस्वामी तुलसीदास और वेद व्यास की तरह अपने विभक्त भारतीय समाज के एका के लिए अपनी कलम चलायें? फिर उन्हीं दोनों को अपना आराध्य मानते हुए माँ सरस्वती जी का मंत्र जाप करने लगा।
कुछ ही दिनों के पश्चात हमारी जिह्वा से दोहा,चौपाई के छन्द स्पुफटित होने लगे।

मेरी रचनाएँ दीन-दुखी ,अबला’ दुबला को समर्पित तथा भारतीय समाज के गौरवशाली परम्परा से ओतप्रोत होती है।

जो आप सभी श्रेष्ठ सम्मानित साहित्यकार गुणीजन गुरूजनों, बन्धुओं और बहनों के विहंगम के दृश्यावलोकन के लिए समर्पित हैं।
आप सभी से विनम्र निवेदन है कि देखें हम कहाँ तक सफल हए।

अतएव हमें आशा ही नहीं पूरण विश्वास है कि आप सभी अपना आत्मीय अहैतुक स्नेह-सुझाव रूपी स्नेहाभार हमें देने की महान कृपा अवश्य करेंगें ।

निःसंदेह हमारी रचनाओं में हमारे श्रेष्ठ सम्मानीय साहित्यकार गुरूजनों का विशेष कृपा है जो आज यहाँ तक पहुंच पाया हूँ ।

आप सभी विद्वान गुरूजनों के कमलवत चरणों में समर्पित मेरी कुछ टूटी-फूटी रचनाएं- – – ।

*धन्यवाद*

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
*” दे दो अंतिम विदा है मिलन आखिरी “*
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मेरे जीवन के तुम्हीं उम्मीद आखिरी ।
मेरे सपनों के सुन्दर उम्मीद आखिरी ।।

मैंने चाहा तुम्हें यह मेरी भूल थी।
मैनें माना मेरी थी यह भूल आखिरी ।।

अपनी यादों में हमको बसाना नहीं?
मेरी यादों के तुम्हीं तस्वीर आखिरी ।।

मेरे नैनों से नीर अब रूकते नहीं ।
इस दुखिया का तुम्हीं हो देव आखिरी ।।

देह से दुनिया का बन्धन है तब तक,
जब तक है चलती ये साँस आखिरी ।।

मैं हूँ मूर्ति तेरी तुम मेरे प्रभु हो ।
दे दो अंतिम विदा है मिलन आखिरी।।

जलाओ हमें या सताओ “भवन” में ,
मेरे मंजिल तुम्हीं हो तारण आखिरी ।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
(राम भवन चौरसिया)
*असुर रावण का दहन होगा!*
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(राम भवन चौरसिया)

*अपने – अपने मन से जब ,*
*अहंकार का शमन होगा ।*
*अखिल विश्व में तभी समझो ,*
*असुर रावण का दहन होगा ।।*

*तब तब हर एक चौराहों पर ,*
*द्रोपदी चीर हरण होगा ।*
*कोई कंश बन दुर्योधन ,*
*आब लूटेगा पाकर मौका ।।*

*जब तक हम नैतिक न होंगे ,*
*पाल्य कहाँ से नैतिक होगा ?*
*हम सुधरेंगे जग सुधरेगा ,*
*कर्म नहीं अनैतिक होगा ।।*

*षट विकार के शिकार सब ,*
*करते नित ये यज्ञ योगा ।*
*वेद पुराण कुरान उपासक ,*
*देते ईश खुदा को धोखा ।।*

*पर उपदेश कुशल बहुतेरे ,*
*देते हैं ये सबको धोखा ।*
*बगुला भगत बहुत हैं ‘भवन’ ,*
*मीन मारे ये पाकर मौका।।*

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
मोबाइल नंबर -7081818634
*धीरज रखना*
==========

धीरज रखना
जीवन की परीक्षा में
कठिन प्रश्न हल करने जैसा है।
जिसमें धीरज रखकर
मनुष्य रूपी छात्र चुपचाप वैकल्पिक प्रश्नों को
बारम्बार पढ़कर ।
बिना उत्तेजना के
धीरे-धीरे क्रमशः
सभी सवाल हल करता है।।
कुछ प्रश्न मानो
उसे छेड़ते है।
कुछ उसके व्यक्तित्व पर
हमला करते हैं।
फिर भी चुपचाप वह
सब कुछ सहता है।
अपनी व्यथा कथा
अपने ही मन में रखता है।।
उसका मौन उसका धीरज
जीवन की सभी
अनसुलझे सवालों को
हल कर देती है।
तीन घंटे के उतार-चढ़ाव में
उसे सब कुछ समझा देती है।
कष्टों को चुपचाप सहने में
मजा कुछ और है।
हजारों सवालों का हल,
धीरज और मौन है।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
(राम भवन चौरसिया )
*” संभावना है सार “*
===============

संभावना एक व्यक्ति में ,
आशा जगाती है ।
घनघोर अंधेरों में हमें ,
पथ प्रकाश दिखाती है ।।

संभावना एक बालक में ,
बाल वैज्ञानिक बनाती है ।
और एक बालिका में ,
कल कल्पना सिखाती है ।।

संभावना एक प्रेयसी को ,
प्रेम -पुजारिन बनाती है ।
ब्याह के बंधन में बाँध ,
रहबर बनाती है ।।

संभावना एक प्रेमी को ,
प्रेम पुजारी बनाती है ।
जीना मरना संग संग ,
यह संकल्प दिलाती है ।।

संभावना एक बीज को ,
वट वृक्ष बनाती है ।
संभावना एक चींटी को ,
पर्वत पर चढ़ाती है ।।

संभावना एक हारे को ,
जंग जीत दिलाती है ।
संभावना माँ बाप को ,
दशरथ बनाती है ।।

संभावना है सार “भवन”,
जो जीना सिखाती है ।
दुखों के पहाड़ में ,
खेल खेलना सिखाती है ।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
*राम भवन चौरसिया*
*”चित्रकार का चित्र समझना “*

चित्र देखकर कविता लिखना ,
इतना भी आसान नहीं है ?
चित्रकार का चित्र समझना ,
घर की यह दुकान नहीं हैं ?

चित्र एक ही होता मगर ,
भाव – भाषा भिन्न है सबकी ।
चित्रकार की सृष्टि – दृष्टि ,
समझना आसान नहीं है ?

जगत नियन्ता के हम सब ,
सबसे सुन्दर कृति हैं ।
फिर भी नेक नहीं है एक ,
लगता खुद का ज्ञान नहीं है ?

भिन्न भले हो पूजा पद्धति ,
भिन्न हमारी भाषा शैली ।
सबमें रमता एक ही ईश्वर ,
उसका कोई पहचान नहीं है ?

पृथ्वी के परदे पर हम सब ,
चलचित्र सम चलते हैं ।
कर्म दृश्य कब कैसा होगा ,
हमको तुमको भान नहीं है ।।

कोई गाॅड खुदा है कहता,
कोई राम रहीम उसको ।
चित्रकार तो एक ही ‘भवन’ ,
भिन्न-भिन्न भगवान नहीं है ?

*( दोहा )*

बहुत सरल है समझना ,
सृष्टि श्री का भेद ।
चित्र व चित्रकार में ,
छिपा है सारा वेद ।।

==============
(राम भवन चौरसिया )
*किताब रूपी खिताब*

हर किताब में
दो कवर होता है ।
एक जन्म का
तो दूसरा मृत्यु का ।।

हर कवर के ऊपर
बहुत ही सुन्दर
आकर्षक और मनोहारी
चित्र होता है।
इसका मतलब
हर बालक में
गजब की प्रतिभा
अन्तर्निहित होती है।

मगर ज्यों-ज्यों हम
उस पुस्तक के एक एक पन्ने
रूपी जन जीवन को
पढ़ते जाते हैं।
और कदम दर कदम
उम्र के साथ बढ़ते जाते हैं।।

त्यों- त्यों वही पन्ने हमें
पुराने लगने लगते हैं।
फिर देख दूसरे का सुन्दर
देह रूपी नव- पुस्तक
हमें सभी ललचाने लगते हैं।

अपनी पुस्तक की कीमत
हमें खुद भी नहीं मालूम?
जिसकी कीमत ?
हम गैरों का
और गैर
हमारी कीमत
अमूल्य लगाने लगते हैं।

आखिर किताब तो
किताब ही होती है।
सबमें भरा होता है
ज्ञान का खजाना,
सच्चिदानंद रूप में परमात्मा,
और सबमे अपनी आब
होती है।

जरूरत होती है उसमें,
भरे ज्ञान-विज्ञान को
अपने आचरण में उतारने की ।
मगर हम सभी,
इस किताब से
उस किताब को पढने में
अपना जीवन की अमूल्य
किताब रूपी खिताब भी
खराब कर देते हैं।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
(राम भवन चौरसिया )
*हर जगह हैं हबस के भिखारी*
————————————
श्वेत वसन में
ये नेता जो चमक रहें है।
तथा भगवा रंग में
कुछ तथाकथित साधु
जो दमक रहें हैं।

घुमावदार कुर्सी पर
बैठे कुछ अफसर
देखने में ऊपर से
बडे ही साधु और महात्मा
हमें दिखते हैं।

ऐसे ही कुछ नामचीन डाक्टर
गरीबों के हाथ में
हजारों रूपये की दवा
अपने पर्ची में लिखते हैं।

ऐसे ही कुछ मास्टर
जीवन में
कभी चाक व डेस्टर
कभी हाथ में नहीं पकडते हैं।
क्योंकि उनका काला पैंट
और सफेद शर्ट गंदा हो जायेगा।

हालीवुड हो वालीवुड
शोषण सब जगह होता है।
किसी का मानसिक,शारीरिक
किसी का आत्मिक होता है।।

हर दीन में
हबस के भिखारी भरे हैं।
कहीं साधु कहीं मुल्ला
कहीं गिरिजा पुजारी पडे़ हैं।।

हमें अब अपने
बहन,बहू, बेटियों को
अपनों से ही बचाना है।
दुष्टों को कठोर दंड देकर
बेटियों को न्याय दिलाना है।।

सच कहूं
ये सभी ऊपर से साधु सा
दिखने वाले सभी लोग
सचमुच में भाव शून्य तथा
मानवता से रिक्त होते हैं।

ऐसे मात-पिता की सन्तानें
इस संसार में बेखौफ,
बदमाश और बेकाम होते हैं।

उनके साथ उनके अभिभावक
और कुटुम्ब जन भी
इस महागुनाह के
हकदार होने के साथ-साथ
समाज में बेइज्जत
और बदनाम होते हैं।।

गगनचुंबी महल बनवाकर भी
संतोष धन न होने के कारण
एक गरीब से भी ज्यादा
गरीब होते हैं।।

हर जगह हैं हबस के भिखारी ।
सम्भल कर रहना बहनों!
बहुत हैं अपने आसपास
अपनों में ही कामान्ध और
साधु भेष के भेष में
त्रेता का रावण
द्वापर के दुशासन
कलियुग के व्यभिचारी।।

यह नेता,अभिभावक,पड़ोसी
अपना ही सगा-सम्बन्धी
साधु संत मौलवी
पंडित और पुजारी
के रूप में तेरे आबरू को
तार तार करने वाले
हरामखोर शिकारी।।

*(राम भवन चौरसिया)*

1 Comments

  1. उत्सवमूर्ति आदरणीय चौरसिया जी का अभिनंदन…
    मानस से उपजी प्रतिभा निश्चित तौर पर अदभुत होती है, जैसै आप और आपका सृजन|
    आपकी सभी रचनाएं बहुत अच्छी है, दोहा तो अपने आप में सर्वोत्कृष्ट है|
    इसी तरह आप सृजन कर हिन्दी सेवा में रत रहे यही कामना है |
    पुन: बधाई..

    *डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*
    हिन्दीग्राम, इंदौर

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