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गायत्री सोनी दतिया (मप्र)

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

गायत्री सोनी दतिया (मप्र)

Priti Surana June 23, 2018
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इस सप्ताह सृजक-सृजन-समीक्षा विशेषांक में प्रस्तुत है *गायत्री सोनी, दतिया (मप्र)* का परिचय, आत्मकथ्य एवं रचनाएं। आप सकीय की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

*प्रस्तुतकर्ता*

*अन्तरा-शब्दशक्ति*

*परिचय*

 

नाम –  गायत्री सोनी ‘अदा’

पति –  श्री महेंद्र सोनी

O. S.

T R O / N C R

D R M office in Jhansi U P

पिता –  श्री श्यामसुंदर सोनी

माता –  श्रीमती शकुंतला

जन्म तिथि –  1 जुलाई

जन्मस्थान-  टीकमगढ़ म.प्र.

बर्तमान पता –  दतिया म.प्र.

शिच्छा –  M A in English

कार्य छेत्र –  हॉउस वाइफ

मोबाइल नं-  9165342420

ईमेल – sonigayatri23@gmail.com

विधा –  गज़ल, मुक्तक कहानी एवं छंदमुक्त रचनाएँ

उपलब्धि –  अंतरा परिवार में शामिल होना ।

एक सांझा ग़ज़ल संग्रह *गुंजन* का प्रकाशन

 

*आत्मकथ्य*

 

मेरी लिखने की शुरुआत तब से हुई जब में 10th क्लास में थी । पिता जी को अक्सर कविताएँ लिखते हुए देखती थी तो में भी लिखने की कोशिश करती थी और उन्हीं से चेक करवाने पर शाबाशी मिलती थी साथ मे हिदायत भी कि अभी पढ़ाई पर ध्यान दो। चोरी चोरी लिखती रहती थी पर कभी गम्भीरता से नही लिया। जब 12थ में आयी तो एक लड़की जो मेरठ से आयी थी,दोस्ती हो गई वो ग़ज़ल लिखती थी। उसकी गजलों को पढ़ते पढ़ते  मेरा भी रुझान ग़ज़लों की तरफ हो गया ओर फिर शुरू हुआ लिखने का सिलसिला ,,,,

हालांकि बह्र की कोई जानकारी नही थी फिरभी तुकबन्दी से लगभग 200 गजलें लिख डाली सिर्फ 2 साल में ही। एक दिन सहेली ने आपने चाचा जान से मिलवाया क्योंकि वो भी बहुत बड़े शायर थे उन्होंने तारीफ़ के साथ यह कहकर मेरी डायरी अपने साथ ले गए कि वो अपने उस्ताद गुरु से इस्लाह करवा देंगे लेकिन उनकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई और मेरी डायरी कहाँ गई आजतक पता नही चला। उस घटना के बाद लिखना लगभग बन्द ही कर दिया और फिर पिताजी की आकस्मिक मृत्यु ,,,, दुख के इस सैलाब में कलम न जाने कहाँ खो गई और फिर शादी,,,,मतलब जिम्मेदारियों का दूसरा अध्याय शुरू ।

20 साल के लंबे अंतराल के बाद पुनः वापिसी की fb के माध्यम से ओर जिज्ञासा काव्यमंच से । दो साल के सफर में मैं जितना सीख पायी हूँ वो सब आप सभी के सामने है ।

लेखन का उद्देश्य यही है कि खुद के लिये, सम्माज के लिये, साहित्य के लिये ओर खासकर हिंदी साहित्य के लिये कुछ योगदान दे सकूँ तो मेरा लिखना सफल हो जाएगा ।

 

*रचनाएँ*

 

1. मेरी पहली ग़ज़ल जो सन 1989 में लिखी थी लेकिन इसके एक दो शेर अब किसी ओर के नाम से फेमस है😔

 

नाक़ाम  आशिक़ी  का  मज़ा कुछ न पूछिये

बर्बाद   जिंदगी   का  मज़ा  कुछ  न पूछिये

 

भूलें  हैं  रफ़्ता  रफ़्ता  उन्हें  मुद्दतों में   हम

किस्तों में खुदकशी का मज़ा कुछ न पूछिये

 

ख़ुद ही  लुटा   सूकून   फ़क़त   देखते  रहे

इस दिल की बेकली का मज़ा कुछ न पूछिये

 

जुल्मों सितम ज़माने नें कुछ कम नही किये

उस पर ये दिल्लगी का मज़ा कुछ न पूछिये

 

जब सामने थे कर न सके हाले दिल बयाँ

कैसी  थी  बेबसी  का मज़ा कुछ न पूछिये

 

यादें  सँभाल  रख्खी  हैं  हमने भी किस तरह

उम्मीदे   रौशनी   का  मज़ा   कुछ न पूछिये

 

हर इक ‘अदा’ पे जिसके लुटाई थी जिंदगी

उस बुत की बन्दगी का मज़ा कुछ न पूछिये

 

2. ग़ज़ल

 

रास्ते हैं पुरखतर मंजर  लिये

चल पड़े हम हौसलों के पर लिये

 

आग नफरत की लगी हर सिम्त जब

*हम कहाँ जाएँ भला छप्पर लिये*

 

तीरगी उसको डरा पायेगी क्या

*चल रहा है सर पे जो दिनकर लिये*

 

कांपती है ख़ौफ़ से हर इक कली

आ रहा गुलचीं नया नश्तर लिए

 

ये सिला हमको वफ़ा का है मिला

जी रहे हैं ग़म का इक सागर लिये

 

शीशा’ ए दिल लेके जो घर से चला

लोग राहों में मिले पत्थर लिये

 

उसकी उल्फत का यही उपहार था

दर्द दामन में हजारों भर लिये

 

थक  गया जब दर्दो ग़म से दिल “अदा’

सो गये फिर दर्द की चादर लिये

 

3. ग़ज़ल

 

खो गया कारवां ,रास्ता रह गया

रहगुजर में न कोई निशां रह गया

 

वक़्त की रेत में मिट गया सब मग़र

नाम दीवार पर इक लिखा रह गया

 

लोग आते रहे लोग जाते रहे

रास्ता फिर खड़ा का खड़ा रहा गया

 

छूटता ही नही गम से रिश्ता कभी

दर्द का दिल से ही वास्ता रह गया

 

इश्क की सारी रस्मे निभाई मगर

क्यूँ अधूरा सा ये फ़लसफ़ा रह गया

 

वक़्त की धार में लोग बहते गये

दिल किनारे खड़ा सोचता रहा गया

 

इक नजऱ क्या मिली होश ही उड़ गए

बन के आँखों में वो आईना रह गया

 

आ गमे जिंदगी साथ जी लें चलो

फासला मौत से अब जरा रह गया

 

ऐ ‘अदा’ रब्त है तुझ में ही धड़कनें

बस यही वास्ता दरम्यां रह गया

 

4. ग़ज़ल

 

भीड़ में तन्हा खड़े तुम , हो गये बेज़ार क्या

ज़ीस्त की जद्दोजहद से मान बैठे हार क्या

 

आपका हँसता हुआ चेहरा बयाँ करता है ये

आज अपने प्यार का वो कर गया इज़हार क्या

 

इश्क़ का दामन जो थामा मत ज़माने से डरो

तोड़ दो सारे जहाँ की सरहदें, दीवार क्या

 

सज़दे में कब से खड़े हैं सर झुकाये देखिये

क्यों भला बैठे हो गुमसुम ना रहा ऐतवार क्या

 

चल पड़े राहे वफ़ा में हौसलों को साथ ले

क्या फ़िकर फिर मंजिलों की रास्ता दुश्वार क्या

 

जान की बाज़ी लगाते हैं वतन की शान पर

सरहदों के सामने फिर तीज क्या, त्योहार क्या

 

ये नशा आखों में कैसा डगमगाये जो क़दम

अब ‘अदा’ लगता है मुझको हो गया है प्यार क्या

 

5. ग़ज़ल

 

दो बोल  मुहब्बत के दिलो जान में रखना

अहसास के फूलों को भी गुलदान में रखना

 

इक बार तो दरिया में उतर जाने दे मुझे

मर्ज़ी तेरी कस्ती’ मेरी तूफान में रखना

 

इंसानियत ही शान है इंसान की सदा

नेकी औ बदी को ही सदा ध्यान में रखना

 

दुनिया की चकाचोंध  गलत राह दिखाये

सच को तू हमेशा ही निगहबान में रखना

 

फूलों की अदा देख खिला करतें हैं चेहरे

ऐसा ही असर अपनी तू मुस्कान में रखना

 

ताउम्र मुक़द्दर से मेरी दुश्मनी रही

तुम जीत को तदबीर से अरमान में रखना

 

बेशक मिलेंगी जिंदगी में मुश्किलें बहुत

तू  हौसलों की पोटली सामान में रखना

 

तन्हाइयों में याद ‘अदा’ आये जब कभी

अशआर मेरे प्यार के दीवान में रखना

 

6. ग़ज़ल

 

जब भी अस्मत पे वार होता है

आदमी तार तार होता है

 

तोड़ देता दिल वही आखिर

जिसपे ही अख़्तियार होता है

 

है कि अफ़सोस अब गुनाहों पर

कौन अब शर्मसार होता है

 

सच बयानी पे जो रहे क़ायम

उसका परवर दिगार होता है

 

शख़्स है वो ख़ुदा की मानिंद ही

जो वतन पे निसार होता है

 

तोड़ देता है दिल हदें सारी

इश्क़ जब बेसुमार होता है

 

प्यार से कर लो ज़िन्दगी रौशन

प्यार क्या बार बार होता है

 

7. ग़ज़ल

 

दिल की हर फ़रियाद औ आहो फुगाँ खाली रही

बस गमों की रोज़ होली और दीवाली रही

 

दो निवाले ही मिले दिनभर की मेहनत से उसे

मालपूओं से भरी मुफ़लिस की कब थाली रही

 

क्या पता उसका मुकद्दर अब कहाँ ले जाएगा

पेड़ से तकदीर की काटी हुई डाली रही

 

ज़ीस्त तो ये ज़ीस्त है अच्छा है क्या ओ क्या बुरा

मिल रहा तक़दीर से, तक़दीर ही काली रही

 

लम्स का अहसास यूँ क़ायम रहा है दरम्यां

उसकी यादों से भरी इस दिल की ये प्याली रही

 

आज भी कायम है दिल में इश्क़ की वो सल्तनत

ये  ‘अदा’ अपनी  तो हरदम रानियों वाली रही

 

गायत्री सोनी

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