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आशा जाकड़, इंदौर (म.प्र.)

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

आशा जाकड़, इंदौर (म.प्र.)

Priti Surana June 30, 2018
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इस सप्ताह सृजक-सृजन-समीक्षा विशेषांक में प्रस्तुत है *आशा जाकड़, इंदौर (मप्र)* का परिचय, आत्मकथ्य एवं रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता
*अन्तरा-शब्दशक्ति*

*परिचय*

नाम-आशा जाकड़
जन्म – 10.6.51 शिकोहाबाद(यू.पी.)
शिक्षा-एम.ए.(समाजशास्त्र, हिन्दी ),बी.एड ।
व्यवसाय-28 वर्षो तक अध्यापन-सेन्ट पाँल हायर से. स्कूल इन्दौर से सेवानिवृत्त
प्रकाशन कृति-
काव्य संग्रह “राष्ट्र को नमन’ 1999
कहानी संग्रह “अनुत्तरित प्रश्न” 2013
काव्य संग्रह “नये पंखों की उड़ान” 2014
सिंहस्थ महोत्सव 2016 (निबंध)
प्रकाशन-वीणा. शुभतारिका मे कहानियां , कविताओ औऱ समीक्षा का प्रकाशन ।
शब्द प्रवाह, मधुरिमा, काव्य कलश, काव्य दीप, गंगोत्री , उबाल , रंजन कलश स्मारिका, गुंजन, माँ, नीरज , चिरैया ,सदी के अन्त तक, हम अड़तीस, भाव सरिता , इन्द्रधनुष, जय महाकाल, नारी चेतना औऱ श्रेष्ठ कविताएँ आदि मे कविताओं का प्रकाशन मोरपंख, ऋचाएँ , इन्दौर लेखिका संघ , कतरा-कतरा और संवेदना में लघु कहानियों का प्रकाशन।
दैनिक भास्कर नई दुनिया, पत्रिका आदि में रचनाओं का प्रकाशन।
सम्मान-साहित्य कलश इन्दौर म. प्र. द्वारा श्री कृष्ण सरल अलंकरण 2011
रंजनकलश भोपाल द्वारा माहेश्वरी सम्मान 2011
जे.डी.पब्लिकेशन दिल्ली द्वारा सम्मान पत्र2013
विकल स्मृति सम्मान2014
कृति कुसुम सम्मान ,2014
पूर्वोत्तर हिन्दी अकादमी शिलांग द्वारा श्री महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान 2015
राष्ट्र भाषा गौरव सम्मान 2015
अस्मिता साहित्य सम्मान 2015
शब्द शक्ति सम्मान 2016
साहि त्य रत्न सम्मान 2016
इन्दौर सा.मंच द्वारा पूर्णोपमाश्री सम्मान 2017
टाइम्स न्यूज इन्डियाग्रुप द्वारा मैं हूँ बेटी अवार्ड 2017
उपलब्धियाँ – काव्य रस संस्था की अध्यक्षा
इन्दौर लेखिका संघ की उपाध्यक्ष
इन्साँ की सहसचिव
रंजनकलश, हिन्दी परिवार औऱ
थैलेसीमिया चाइल्ड वेलफेयर. ग्रुप की सदस्या
फिल्म एसोसिएशन राईटर्स की सदस्या
साहित्य की सभी विधाओं में लेखन। ……

*आत्मकथ्य*

सत्य है कि कविता लिखी नहीं जाती।जब दूसरों की आह- कराह ह्रदय को झकझोर देती है, तब ह्रदय का उमड़ता सैलाब पन्नों पर आ जाता है तो वही कविता बन जाती है या अत्यधिक खुशी में मन गुनगुनाने लगता है तो ह्रदय के उद्गार कविता का रूप ले लेते हैं।
बचपन में कविता, कहानी लिखने
का बीज कब मुझमें अंकुरित हुआ, याद नहीं
कभी खुशी के मौके पर या दुख के माहौल में कविता पन्नों पर उतरने लगी।कभी देश की हालत देख या कभी नारी की स्थिति देख ह्रदय दुखी हुआ तो व्यथा कविता बनती रही ।अध्यापन के दौरान
छात्रों को पर्व व उत्सवों पर कविता लिखती रही।
1999 में कारगिल युद्ध के दौरान मेरी कविता आक्रोशित होकर फट पड़ी ।उस समय आनन – फानन मेरे काव्य संग्रह “राष्ट्र को नमन” का विमोचन हुआ। अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान मैंने युवाओं के लिए संदेशात्मक कविताएँ लिखी।
प्रायः मेरी कविताएं देशभक्ति – भावना से ओतप्रोत हैं जिसे पढ़कर लोगों मे देश प्रेम की भावनाए हिलौरे लें ।आज नैतिक मूल्यो का ह्रास और रिश्तों में दरार पड़ रही है।कुछ कविताओ मे युवाओ से आह्नवान है। नशा-मुक्ति जैसी संदेश देने वाली कविताएँ भी हैं । रिश्तों पर भी कलम चलाई है।जीवन की आपाधापी में कुछ सेवा, परोपकार और सहयोग कर सकूं , मैंने याचना, प्रार्थना आदि के द्वारा भक्ति भाव सम्बन्धी कविताएँ भी लिखी है ।
कल के भारत का कर्णधार आज का युवा छात्र है।
उनसे कविताओ द्वारा कामना की है कि आनेवाली पौध देश से बुराइयों का निराकरण कर देश को उत्कर्ष के शिखर ले जाएँ ।
मैंने कविताओ के द्वारा सकारात्मकता उकेरने की कोशिश की है।

*रचनाएँ*
*1. “हर मंजर वीराना है “*

साथी तुम बिन हर मंजर वीराना है।
राहों में हमने फूल खिलाए,
कोमल पंखुरिया हार बनाए,
साथी तुम बिन खुशबू शूलाना है

नदिया में मैं भटक रही थी।
नाव किनारे डूब रही थी ।
मांझी बिन कैसे पार लगाना है?
साथी तुम बिन हर मंजर वीराना है।

पलकों से हमने मोती सजाए ,
नन्हीं आशाओं के दीप जलाए।
बिन साथी कैसे दीप जलाना है ?
साथी तुम बिन हर मंजर वीराना है ।

तुमसे ही हर तरफ चमन था ,
बहार से ही मौसम गुलशन था।
बिन साथी मौसम बड़ा बेगाना है।
साधी तुम बिन हर मंजर वीराना है ।

हर खुशियां मेरी राख बन गई ,
इन्तजार में कलियाँ सूख गई।
बिन साथी कैसे मंजिल पाना है ?
साधी तुम बिन हर मंजर वीराना है ।

*2.”अकेली”*

मैं अकेली बन गई स्वयं की पहेली
चुन-चुन प्यार के तृण
बनाया एक निज नीढ़
मीलों दूर उड़ ,चुगना सिखाया
सहला -सहला उड़ना सिखाया
समर्थ हुए समय की आँधियो में गये उड़
रह गए ऑसू और मैं अकेली ।।

पग कांटों से लहूलुहान हो गए
पंख गए, पर कटे बेजान हो गए
साया साथ छोड़ दूर हो गए
जो अपने थे, पराये हो गए
मेरी सांसे भी अपनी न थी
जिन्हें बनाती अन्तरंग सहेली
मैं अकेली बन गई पहेली ।।

कहना चाहा,पर भाषा नहीं
मांगना चाहा , पर भावना नही
वहा थी केवल तृष्णा
थी बस केवल याचना
नहीं थी कोई कामना
मलती रह गई मैं हथेली
मैं अकेली बन गई पहेली ।।

*3. “ललनाओं हो जाओ तैयार “*

ललनाओं हो जाओ तैयार।
अब आई युद्व की बारी ।।

क्षत्राणियों के खून मे
उमड़ रहा है जोश।
हवाएं भी झूम-झूम,
गा उठी मदहोश ।
दुश्मन के ठिकानों पर,
हम करें वार पर वार।
ललनाओं हो जाओ तैयार ।

हाथों में चूड़ियों के साथ ,
अपने खड्ग थाम लो
रानी लक्ष्मीबाई सम ,
ढाल पीठ पर बांध लो ।
आंधी सी हम टूट पड़े,
करें दुश्मन पर प्रहार।
ललनाओं हो जाओ तैयार ।

काश्मीर से शत्रु को ,
खदेड़ के ही दम लेंगे।
रानी सारंधा बन,
दुश्मनों से बदला लेंगे ।
आन की खातिर ,
भोंकली जिसने कटार ।ः
ललनाओं हो जाओ तैयार ।

वीरों का है ये देश ,
वीरांगना इसकी शोभा ।
छोटे बच्चे यहां खेल में ,।
लेते अग्नि से लोहा ।
आल्हा – उदल की गाथा ,
जन जन में भर दे हुंकार ।
ललनाओं हो जाओ तैयार ।

आज दुर्गा बन दिखाएं।
हम रण में जौहर ।
माता अहिल्या सम दिखाएं ,
हम युद्ध कौशल ।
माता जीजाबाई सदृश ,
उठालो हाथ में तलवार ।
ललनाओं हो जाओ तैयार।.

*4. “आजादी का सफर कितना लंबा है?”*

कितनी माताओं की,
सूनी हो गई गोद ।
तरसे होंगे रोटी के लिए
असंख्य अबोध ।
इस बँटवारे का ,
नगर कितना लम्बा है?

अनगिनत स्त्रियों का ,
संसार सूना हो गया ।
मुस्कुराती बगिया का,
चमन वीरान हो गया ।
कपोलो पर सूखा ,
सागर कितना गहरा है ?

रक्षाबंधन पर कितनी राखियां,
सिसकी ,तड़पी होंगी ।
दिवाली पर अगणित ,
मंगल टीके बहे होंगे ।
बहनों के नेह का,
डगर कितना लंबा है?.

बही होंगी कितनी ,
खून की नदियां।
मिटी होंगी हिंदू और
मुस्लिम की कहानियां ।
अगणित लाशों का ,
किस्सा कितना लंबा है ?

अनगिनत अनाथ
दर -बदर भटके होंगे ।
असंख्य अबलाओं के
आवरण उघड़े होंगे ।
आह-कराह का,
दर्द कितना लंबा है ?

कितनों ने परिजनों को,
हलाल होते देखा ।
अपने जिगर के टुकड़ों को,
दम तोड़ते देखा ।
तूफानी हवाओं का,
नगर कितना लंबा है?

कितने बेमौसम,
सैलाब बहे होंगे।
कहे -अनकहे ,
दर्द सिसके होंगे ।
खामोश निगाहों का
सूनापन कितना लम्बा है?

*5.”कश्मीर की चोटी पर झंडा अपना फहराना है”*

गूंज उठी हुंकार देश में,
कश्मीर को हमें बचाना है।
कश्मीर की चोटी पर ,
झंडा अपना फहराना है ।

निर्दोषों का खून बहाकर ,
लाशों पर महल सजाए हैं ।
औरों के चिराग बुझा कर ,
अपने घर दीप जलाए हैं।
तुम्हारी हठधर्मिता को ,
अब हमें कफन पहनाना है।
कश्मीर की चोटी पर ,
झंडा अपना फहराना है ।

दोस्ती कर धोखेबाजी की,
पाक उसे भूल ना पाएंगे
घुसपैठ की चोरी के लिए
तुझे माफ कर न पाएंगे।
तुम्हारी इस गद्दारी को ,
अब हमें सबक सिखाना है
कश्मीर की चोटी पर ,
अपना झंडा फहराना है

अमर शहीदों के अंग भंग कर ,
जश्न तुम मनाते हो ।
कायरों की तरह वारकर,
शेरो की तरह गुर्राते हो ।
तुम्हारी घिनौनी हरकतों का ,
अब पर्दाफाश कराना है ।
कश्मीर की चोटी पर ,
अपना झंडा फहराना है।

तन में एक बूँद खून की,
एक इंच कश्मीर नहीं देंगे।
पाक तुम्हारे नापाक इरादे,
अब पूर्ण नही होने देंगे ।
पाश्विकता के उच्च शिखर को ,
अब जमीं पर लाना है ।
कश्मीर की चोटी पर ,
अपना झण्डा फहराना है,…

6.”मन हो गया गुलाब”

मन हो गया गुलाब तुम्हारे आने पर ।
महक उठी हर सांस तुम्हारे आने पर।।
उजड़ रहे थे वन-उपवन
सुलग रहे सबके तन -मन ।
तृप्त हुई वो प्यास तुम्हारे आने पर।
महक उठी हर साँस तुम्हारे आने पर।।
आसमान में उड़ते बादल
आँखों का बनगया काजल
आई सावन की फुहार तुम्हारे आने पर।
महक उठी हर साँस तुम्हारे आने पर।।
सूख रहे थे नदी और नाले
आशाओं के हुए उजाले
फूटी रस की धार तुम्हारे आने पर।
महक उठी हर साँस तुम्हारे आने पर।।
चटख रही थी सारी धरती
सुलग रही थी सारी धरती
जीने की बँध गई आस तुम्हारे आने पर। महक उठी हर साँस तुम्हारे आने पर।।
रूठ रही थी मेरी पायल।
सुबक रहा था मेरा आँगन
झन झन झन झनकार तुम्हारे आने पर।
महक उठी हर साँस तुम्हारे आने पर।।

*7. “प्रार्थना”*
गजानन आ जाओ एक बार
बन्द करो ये जल की धार।।
चार दिनों से हो रही वर्षा
सूरज के नहीं हो रहे दर्शा
मच रही सर्वत्र हाहाकार
गजानन आ जाओ एक बार

सड़कों पर पानी का रेला
लोगों का लग रहा है मेला
किससे करें अब पुकार
गजानन आ जाओ एकबार

घरों में घुस रहा है पानी
सामान की ना बची निशानी
हो रहे अब सभी लाचार
गजानन आःःःः

रास्तों में भर गया है पानी
जैसे थम गई हो कहानी
कैसे बचेगा ये संसार
गजानन आःःःःःः
नदी -नाले सब एक हो रहे
झोंपडियाँ नाव से बह रहे
कष्ट हो रहा अपार
गजानन आःःःःःः
गरीब बेचारे उदास हो रहे
जीवन की भीख मांग रहे
अंसुअन की बहरही धार
गजानन आःःःः
इन्द्र क्यों ऐसे कुपित हो गये
लोगों की भक्ति से रूठ गए
अब तो कृपा कर दो हमार
गजानन आःःः
पशु – पक्षी ह़ो रहे परेशाँ
जन मानस तक रहे आस्माँ
आशा की सुन लो पुकार
गजानन आ जाओ एक बार
बन्द करो ये जल की धार।।

*आशा जाकड़*

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