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डॉ. वासिफ क़ाज़ी, इन्दौर (मप्र)

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

डॉ. वासिफ क़ाज़ी, इन्दौर (मप्र)

Priti Surana July 7, 2018
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इस बार *सृजक-सृजन-समीक्षा विशेषांक* में प्रस्तुत है *डॉ. वासिफ क़ाज़ी, इंदौर* का परिचय, आत्मकथ्य एवं रचनाएँ। आप सभी लो प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता

*अन्तरा-शब्दशक्ति*

*परिचय*

नाम – डॉ वासिफ क़ाज़ी

माता – श्रीमती शमा क़ाज़ी

पिता – स्व श्री बदरूद्दीन क़ाज़ी

पत्नी – श्रीमती शबाना क़ाज़ी

जन्मतिथि – 05 अगस्त,1981

जन्मस्थली – बड़वानी ( म .प्र.)

प्रारंभिक शिक्षा – कुक्षी नगर, जिला – धार

शैक्षणिक योग्यता –

एम.ए. ( हिंदी साहित्य)

एम.ए.( अंग्रेज़ी साहित्य)

एम.एस-सी. (रसायन)

पी-एच.डी.

शोध प्रबंध का विषय- ” हिंदी काव्य एवं कहानी की वर्तमान सिनेमा में प्रासंगिकता” ( Relevance of Hindi Poetry & stories in the modern Cinematic world )

कार्यक्षेत्र – वर्तमान में इस्लामिया करीमिया उच्चतर माध्यमिक विद्यालय इंदौर में उच्च माध्यमिक व उच्चतर माध्यमिक स्तर की कक्षाओं में कुशलतापूर्वक अध्यापन ।

अन्य गतिविधियां – विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में काव्य एवं आलेख लेखन ।

विधा – काव्य, ग़ज़ल, आलेख और समीक्षा ।

स्वलिखित पुस्तक –

१ संकल्पना

२ आग़ोश

प्रकाशक – अंतरा शब्द शक्ति प्रकाशन, वारासिवनी ।

रचनाओं का प्रकाशन –   नईदुनिया, नवभारत, लोकजंग, खबर हलचल में ।

फर्म – ओमेगा ट्यूटोरियल एवं काम्पीटिटीव विंग के नाम से कोचिंग विगत डेढ़ दशक से संचालित ।

पता – 28/3/2, अहिल्या पल्टन इक़बाल कालोनी इंदौर

भ्रमणभाष – 8085901021

सम्मान – भाषा सारथी सम्मान २०१८ से सम्मानित ।

मातृभाषा.कॉम के नियमित रचनाकार।

 

*आत्मकथ्य*

 

भाषा, भावों की अनुगामिनी होती है । मानव मन में विचारों का अंतर्द्वंद्व स्वाभाविक है । मैं कोई पेशेवर कवि नहीं हूं परंतु मनुष्य होने के नाते अनेकानेक संवेदनाएं भाव विचार मेरे मन में भी जन्म लेते हैं । इन्हीं भावपुष्पों को शब्दमाला में पिरोकर साहित्यिक यात्रा पर निकल पड़ा हूं ।

काव्य की सार्थकता तभी संभव है जब वह समाज में व्याप्त कुरीतियों वर्जनाओं एवं अक्षमताओं का दमन कर युवाओं में एक नई स्फूर्ति का संचार करे।

हिंदी को  राष्ट्रभाषा के रूप में पुनः प्राण प्रतिष्ठित करने के लिए वचनबद्ध हूं ।

हिंदी के प्रति पाठकों नागरिकों और साहित्य रसिकों के मन मस्तिष्क में रूचि और सम्मान की भावना उत्पन्न कर सका तो यही मेरे लेखन की सार्थकता होगी ।

जय हिन्द ! जय हिन्दी !!

 

रचनाएँ

 

*1. इंसान*

 

कुदरत की कारीगरी हो,

ख़ुद अपनी पहचान हो ।

मत भूलो वज़ूद अपना,

तुम भी एक इंसान हो ।।

 

मानवता का मंदिर हो तुम,

प्रेम की मिसाल हो ।

माटी के पुतले अजीब,

तुम भी एक इंसान हो ।।

 

मासूमियत की मूरत हो तुम,

छल कपट अज्ञान हो ।

दुनियादारी में उलझे हुए,

तुम भी एक इंसान हो ।।

 

पा लो मेहनत से सब कुछ,

लक्ष्य न अंजान हो ।

ओ अपने भाग्य विधाता,

तुम भी एक इंसान हो ।।

 

*2.नया सवेरा*

 

भय के बादल छंट जाने दो,

प्रेम की अब बात हो ।

अलविदा कहो आतंकी रात को,

एक नया प्रभात हो ।।

 

गोली चली, ख़ून बहा

जमीं भी लाल हो गई ।

हर चप्पा ख़ामोश हुआ,

हर गली वीरान हुई ।।

 

फिर से गूंजे पूजा के सुर,

प्रेम की अज़ान हो ।

अलविदा कहो काली रात को

एक नया प्रभात हो ।।

 

अहिंसा की तपोभूमि पर ,

जनमानस खुशहाल हो ।

अलविदा कहो आतंकी रात को,

एक नया प्रभात हो ।।

 

*3.तन्हाईयां*

 

इश्क में तेरे ग़ुम हूं मैं,

ख़ामोश और गुमसुम हूं मैं ।

नाम से तेरे इश्क मुकम्मल,

बिन तेरे गुमनाम हूं मैं ।।

 

तुमसे मोहब्बत की थी मैंने,

तुमको ही बस चाहा था ।

दुनिया की इस भीड़ में मैंने,

बस अपना तुमको माना था ।।

 

तन्हाइयों के ये स्याह अंधेरे,

हरदम बढते जाते हैं ।

ज़िंदा है कहने को बस हम,

पल पल मरते जाते हैं ।।

 

तेरी यादों के तेज़ भंवर,

दिल के दरिया में बनते हैं ।

साये की तरह ही पल पल,

हम साथ तेरे चलतें है ।।

 

*4.सहर*

 

शब जुदाई की गुज़र जायेगी,

सहर मिलन की फ़िर आयेगी

बैठें हैं ज़िन्दगी के साहिल पर

लहर इश्क की फ़िर आयेगी ।।

 

ख़्वाबों में दीदार किये थे मैंने,

रुबरु वो एक दिन जरूर आयेगी ।

न करेगी कद्र मेरे प्यार की तो

इश्क में यूं ही ठोकरें खायेगी ।।

 

मायूसी का घना अंधेरा है ज़िन्दगी,

बन कर शमा वो झिलमिलाएगी ।

उलझनें बहुत हैं किरदार में मेरे,

आकर उसे वही सुलझाएगी ।।

 

बैचैनी ,बेताबी, बेकरारी बहुत है ,

तुमसे मिलकर ही दूर हो पायेगी ।

मेरी रूह को नहीं सुकून अब तो,

तेरे दीदार से राहत आयेगी ।।

 

*5.नतीजा*

 

कोशिशें हज़ार की पाने की,

तेरी बेरूख़ी नहीं मिटती है ।

नतीजा मिलता नहीं कुछ भी ,

मेरी चाहत यूं ही बिखरती है।।

 

दिल में तड़प, आंखों में यक़ीं,

अब भी बाकी है ।

तेरी नज़रों से पीते हैं जाम,

तू ही मयक़दा है,साक़ी है ।।

 

नतीजा देखकर इश्क हमसे,

किया नहीं जाता है ।

तेरी यादों में खोया हूं मैं

तेरे बिन जीया नहीं जाता है ।।

 

तुझे देखकर सुकून पा लेता हूं

बांहे तेरा इंतज़ार करती है ।

तेरे इकरार, तेरे प्यार से है सहारा,

तुझे पाकर मोहब्बत मेरी निखरती है ।।

 

*6.देश प्रेम की सुगंध.

 

मुल्क की मोहब्बत को अब,

दिल में बसाइये ।

ज़ात पात भूल कर अब,

एक हो जाइये ।।

 

बंध गए मज़हब हमारे,

रंगों की जंजीर में ।

देशप्रेम खो गया है ,

नफ़रतों की भीड़ में ।।

 

देशभक्ति को दिनों का

मोहताज मत बनाइये ।

खेल में जीते पाकिस्तान तो

जश्न मत मनाइये ।।

 

गांधी के आदर्शों को अब,

गले से लगाइये ।

खोया हुआ सम्मान अब,

हिंदी को दिलाइये ।।

 

*7.पलाश के फूल*

 

जब तुम मेरे घर आना,

फूल पलाश के ले आना ।

उन फूलों में तुम अपनी,

मुझको ख़ुशबू दे जाना ।।

 

ये फूल नहीं सौग़ात है दिल की,

लम्हात प्यार के ले आना ।

अपने प्यार की भीनी खुशबू,

सांसों में तुम दे जाना ।।

 

इंतज़ार में तेरे नज़रें हैं अब,

अपनी आहट दे जाना ।

दिल की दुनिया बंजर है मेरी,

चाहत की बारिश ले आना ।।

 

फूल पलाश के मुझको,

अब तेरी याद दिलाते हैं ।

किताबों में मुरझा कर भी,

जीवन में बहारें लाते हैं ।।

डॉ वासिफ क़ाज़ी

 

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