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Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

मेघ योगी, इंदौर मप्र

Priti Surana 5 months ago
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  1. इस बार सृजक-सृजन-समीक्षा विशेषांक में प्रस्तुत है *मेघा योगी, इंदौर* का परिचय, आत्मकथ्य एवं रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता
*अन्तरा-शब्दशक्ति*

*परिचय*

नाम-मेघा योगी
साहित्यिक उपनाम-मेघा
पिता का नाम -श्री अशोक कुमार योगी
माता का नाम -श्री मति सरोज योगी
पति का नाम -उमेश योगी
जन्मतिथि-08जून
शहर -गुना
स्थाई पता-सोनी कॉलोनी शिमला गार्डन के पास गुना म प्र. 473001
राज्य-म. प्र.
वर्तमान पता,विजय नगर इंदौर
शिक्षा-Bsc biotechnology,PGDCA
कार्यक्षेत्र-विद्यार्थी
विधा -गीत, गजल, मुक्तक, छंद, लेख, लघुकथा, कहानी आदि ।
ईमेल-meghayogi306@gmail.c
मोबाइल/व्हाट्स ऐप -xxxxxxxxxx

प्रकाशन-
गुंजन साझा गजल संग्रह,
वुमन आवाज साझा काव्य संग्रह,
ई पत्रिकाओं सहित देश की अनेक पत्र पत्रिकाओं में समय समय पर रचनाओं का प्रकाशन।

सम्मान-अंतरा शब्द शक्ति सम्मान,
जिज्ञासा अलंकरण
ब्लॉग-यूथ की आवाज.

लेखन का उद्देश्य-आत्म संतुष्टि व हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार हेतु ।
***********

*आत्मकथ्य*

मध्यमवर्गीय साधारण परिवार में जन्म हुआ,
दादाजी म. प्र. पुलिस में सेवारत थे तथा पिताजी शिक्षक, पारिवारिक माहौल ऐसा रहा कि बचपन से ही पूजा पाठ तथा आध्यात्म में रुचि उत्पन्न हो गई, जिस दौर में स्त्रियों का घर की दहलीज़ लाँघना भी बहुत बड़ी बात हुआ करती थी, उस दौर में मेरी परदादी जो कि अनेक विद्याओं (गूढ़ सिद्धियों) की ज्ञाता थीं ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया,बचपन उनके यात्रा वृत्तांत और कहानियों को सुनकर बीता।
संध्या के समय दादा जी रामायण का पाठ किया करते थे, तुलसी रहीम के दोहे और हिंदू महानायकों की कथाओं ने बाल्य मन पर गहरा प्रभाव डाला, परोपकार की भावना का गुण दादा जी से प्राप्त हुआ, मुझे याद नहीं कि ऐसा भी कोई दिन रहा हो जिस दिन हमारे परिवार द्वार किसी को भोजन न कराया गया हो, बचपन में बहुत बातूनी और हर मुद्दे पर बहस करने में माहिर हुआ करती थी सो दादा जी ने मेरा नाम ही वकील साहब रख दिया। जैसे कि प्रत्येक संतान के लिए माता पिता आदर्श हुआ करते हैं,
इसी प्रकार मेरे व्यक्तित्व पर भी माता पिता का बहुत प्रभाव है। माँ घर बाहर के प्रत्येक कार्य में इतनी पारंगत कि पता ही नहीं चला कब उनके गुण मुझ में आ गये, दूसरों का सम्मान करने के साथ माँ ने खुद के आत्मसम्मान को बनाये रखने का मूल मंत्र भी दिया और साथ ही अपने निर्णय स्वयं लेने का अधिकार भी। पिताजी को पुस्तकों में रुचि थी उनके पुस्तक संग्रह से अनेक पुस्तकें पढ़ने का सौभाग्य मुझे मिला।
पिताजी को लेखन में भी रुचि रही संभवतः मुझे में भी लेखन का गुण पिताजी से ही मिला, परन्तु परिस्थितिवश पिताजी की रचनायें प्रकाशित न हो सकीं, मैं आशा करती हूँ अतिशीघ्र साहित्य जगत को उनकी रचनाओं का योगदान मिलेगा,
मैं बचपन से ही तुकबंदी कियाकरती थी, इसी क्रम में स्कूल, कॉलेज की पढ़ाई भी हो गई परंतु गंभीरता से लेखन के विषय में कभी सोचा भी नहीं था।
जिस प्रकार सफल पुरुष के पीछे स्त्री का हाथ होता है उसी प्रकार सफल स्त्री के पीछे भी पुरुष का हाथ होता है और वो पुरुष मेरे पति हैं जिन्होंने मुझे लेखन के लिए बहुत प्रोत्साहित किया और इसी क्रम में अंतराशब्द शक्ति और जिज्ञासा काव्य मंच से जुड़कर मैंने लेखन की विधाओं के विषय में जाना और इसका सारा श्रेय आ. भैया विनोद तिवारी मानस और आप सभी गुरुजनों को जाता है..।इस प्रकार मेरी लेखन यात्रा का आरंभ होता है….

*रचनायें*

🌹🌹🌹*गीत 🌹🌹🌹
*पिता*

सुख की छाया सौंप सभी को,
तेज धूप में तपे पिता ;
कंटकपथ पर पुष्पमालिका,
बन पगतल में बिछे पिता!

गृह के सारे संतापों को,
धैर्य धारकर हर लेते;
अपने उर की गहराई में,
अगनित बातें धर लेते ;
अपने सब कर्तव्य निभाये,
कभी न विचलित हुये पिता;
कंटकपथ पर पुष्प मालिका,
बन पगतल में बिछे पिता!!

हर परिजन को मोती के सम,
धागा बन कर बाँधा है;
सब के सुख को लक्ष्य मानकर,
अर्जुन के सम साधा है;
अनुशासन के इतने पक्के,
पर्वत जैसे डटे पिता;
कंटक पथ पर पुष्प मालिका,
बन पग तल में बिछे पिता!!

रत्नाकर सा प्रेम हिया में,
बिना क्रोध नहिं काम चले;
जीवन धारा चले सुगम जब,
संतति में संस्कार पले;
है नवनीत हृदय,कोमल मन,
फिर भी कठोर दिखे पिता;
कंटक पथ पर पुष्प मालिका,
बन पग तल में बिछे पिता!!

अधरों पर मुस्कान सजाते,
नैनों के आँसू हरते;
सुख संपदा विराजे घर में,
कोटिक कोटि जतन करते;
कोने कोने की वायु में,
कस्तूरी बन घुले पिता;
कंटक पथ पर पुष्प मालिका,
बन पग तल में बिछे पिता!!

रचा के मेहँदी हाथों में,
ओढ़ चुनरिया सजती है;
सूरज जैसी बिंदी चमके,
पायल छन छन बजती है;
माँ के माथे पर सिंदूरी,
रेखा बनकर सजे पिता;
कंटकपथ पर पुष्पमालिका,
बन पग तल में बिछे पिता!

🌹🌹🌹गीत 🌹🌹🌹

******तुम हो *******

हुये सुरभित नये सौरभ
पवन के गीत में तुम हो
घुली बूँदो में है मदिरा
तड़ित संगीत में तुम हो

शरद के चंद्रमा हो तुम
तुम्हारी चाँदनी हूँ मैं
भोर का राग तुम प्रीतम
तुम्हारी रागिनी हूँ मैं
मेरे कर्तव्य लाखों पर
तुम्ही अधिकार हो मेरा
नहीं कोई कामना अब तो
तुम्ही संसार हो मेरा
हृदय हारा है मैंने पर
मेरी हर जीत में तुम हो
घुली बूँदों में मदिरा…….

तुम्हारी ही छवि अंकित
मेरे देखोे नयन दर्पण
मेरे जीवन का हर इक पल
सजन मेरे तुम्हें अर्पण
तुम्हारा ध्येय हो जैसे
अधर मुस्कान ये मेरी
तुम्हारा प्रेम हूँ,जग में
यही पहचान हो मेरी
मेरे भगवन मेरी पूजा
मेरी हर रीत में तुम हो
घुली बूँदों में है मदिरा…….

हुआ जब भी ये जग बैरी
तभी तुम ढाल बन जाते
भटकती जब कभी नैया
तभी तुम पाल बन जाते
खुशी के हैं सभी साथी
मेरी तुम पीर चुनते हो
बड़ी वाचाल हूँ किन्तु
मेरा तुम मौन सुनते हो
मेरा मिलना मेरा विछुरन
मेरी हर प्रीत में तुम हो
घुली बूँदों में है मदिरा……

बंधी है प्रीत की डोरी
ये बंधन है बड़ा न्यारा
मेरे कहने पे आजाते
भुला भूगोल तुम सारा
कभी मैं रूठ जाऊं तो
मनाते मुझको आकर के
हृदय से तुम लगाते हो
मेरी त्रुटियाँ भुलाकर के
दुखों की हो दोपहरी पर
सुखों की शीत में तुम हो
घुली बूँदों में है मदिरा…….

सुगंधित हो गईं रातें
बसंती हो गये हैं दिन
लगे अभिशाप मुझको तो
जो पल बीते तुम्हारे बिन
भरे हैं तुमने खुशियों के
मेरे जीवन में सारे रँग
धरा पर आऊं मैं जब भी
जनम बीते तुम्हारे सँग
विलग संसार से सारे
हृदय की भीत में तुम हो
घुली बूँदों में है मदिरा..

💐💐💐गीत 💐💐💐
*राधे श्यामी छंदाधारित*
*शब्द कभी हथियार बने*

अस्तित्व हीन बंदूकें हैं,
जब शब्द कभी हथियार बने!
मानवता के हर बैरी को,
यह गीत नहीं ललकार बने!

अब क्षमा दया मूर्छित होकर;
बैठी निर्ममता के आगे!
अंतर ही जिसका सोया हो;
वह सूर्य उदय पर क्या जागे!
कण रुधिर जमें हैं धमनी में;
किस तरह साँस अंगार बने!
मानवता के हर बैरी को;
यह गीत नहीं ललकार बने!

मुट्ठी भर आताताई जब;
दुनिया में भय फैलाते हैं!
तब अहंकार की वेदी पर;
निर्दोष भेंट चढ़ जाते हैं!
ये धरा गगन हिल जाते हैं;
जब कोई आह चित्कार बने!
मानवता के हर बैरी को;
यह गीत नहीं ललकार बने!

श्लोक सिसकते पोथी में;
सम्मान नही छंदों का है!
आँखें लेकर हम बैठे हैं;
पर राज यहाँ अंधो का है!
धर छद्म वेष कोई शृगाल;
सिंहों का जब सरदार बने!
मानवता के हर बैरी को;
यह गीत नहीं ललकार बने!

कोटिक योजन चल कर आई;
टकराई झंझावातों से!
फिर खोज लिया पथ भी अपना;
लड़ कर के काली रातों से!
पर नाव डुबाने को आतुर;
उसकी ही निज पतवार बने!
मानवता के हर बैरी को;
यह गीत नहीं ललकार बने!

लाखों सैनिक नित सीमा पर;
जब अपने शीश कटाते हैं !
जयचंद घरों में बैठे जो;
भारत माँ को लजबाते हैं!
घर का भेदी लंका ढायें;
रिपु के निमित्त जयकार बने!
मानवता के हर बैरी को;
यह गीत नहीं ललकार बने!

तुम झूठ कहो सौ बार मगर;
वह सत्य नहीं हो सकता है!
इन बनावटी षडयंत्रों से;
अस्तित्व नहीं खो सकता है !
सच्चाई पर परदे लाखों ;
हर तुच्छ खबर अखबार बने!
मानवता के हर बैरी को;
यह गीत नहीं ललकार बने!

🌹🌹🌹गजल 🌹🌹🌹

*क्यों करते नहीं हो*

बू अराजकता की फैली,मंद क्यों करते नहीं हो;
विष बुझी हर गंध को मकरंद क्यों करते नहीं हो!!

लुट रही जब बेटियों की आबरू हर इक गली में;
जम गया क्या रक्त,भारत बंद क्यों करते नहीं हो!!

जो जला दे दिल में ज्वाला,गूँज से कप जाये अंबर;
आज उठ कर ऐसा सुरभित छंद क्यों करते नहीं हो!!

निम्न होती मानसिकता औ मनुजता खो गई है;
ऐ युवा खुद को विवेकानंद क्यों करते नहीं हो!!

हिंदु मुस्लिम राजनीति,धर्म पर नारे लगाते;
काम इनसे आके बाहर चंद क्यों करते नहीं हो!!

द्वेष ईर्ष्या छल कपट का अब दिलों पर राज “मेघा”;
गैर की खुशियों में भी आनंद क्यों करते नहीं हो!!

🌹🌹🌹गजल 🌹🌹🌹

*गजल कहूँगी*

मिटा के हस्ती मैं अपनी सारी तुझे खुदा कर गजल कहूँगी;
सनम ये साँसो की रौनकें सब तुझे अता कर गजल कहूँगी !!

हाँ जिस्म महिवाल सोणियो का,डुबा गई थी वो कच्ची माटी;
मिटा न पाई जो इश्क़ उनका वही वफा कर गजल कहूँगी !!

लगी हुई है जो मेरी जानिब,वही तुझे भी जला रही है ;
जो और भड़का दे इश्क़े आतिश,मैं वो हवा कर गजल कहूँगी!!

फिरे फकीरों सा रात भर तू,है तुझको आख़िर तलाश किस की ;
ऐ चाँद सानो पे मेरे आजा तुझे सुला कर गजल कहूँगी!!

सनम तू ईमान मेरा अब से,ये जिस्मों जाँ सब निसार तुझ पर ;
मैं तेरी राहों में सुर्ख गुल सा ये दिल बिछा कर गजल कहूँगी !!

है मुझ पे उस रब की ये इनायत,जो उसने “मेघा” कलम है बख़्शी;
कलम जो गुलजार बन के महके,मैं मुस्कुरा कर गजल कहूँगी !!

🌹🌹🌹गजल 🌹🌹🌹

*क्यों न कुछ नेक काम कर जायें*

क्यों न कुछ नेक काम कर जायें;
इससे पहले कि हम गुजर जायें !

अब्र कुछ देर को ठहर जा अब;
लौट के पंछी अपने घर जायें!

इनको अक्सर कुरेद लेती हूँ ;
जख्म ऐसा न हो कि भर जायें!

और अब कौन सा ठिकाना है;
उनके दामन में ही बिखर जायें !

अब भी इंसान बसते हों जिसमें;
हम भी ऐसे किसी नगर जायें !

खौफ घर में भी और बाहर भी ;
बेटियाँ अब भला किधर जायें !

आज सच को बयान कर देंगे ;
इस से पहले कि हम भी डर जायें!

उनको सजदे भला करे कैसे ;
जो कि नजरों से ही उतर जायें !

जिनकी उजली कमीज़ है मेघा ;
काश भीतर से भी निखर जायें!

🌹🌹🌹गजल 🌹🌹🌹

*क्या किया जाए*

मुझी तक लौटतीं मेरी सदायें क्या किया जाए;
नहीं सुनता खुदा मेरी दुआयें क्या
किया जाए!!

हरिक लम्हा यहाँ बस खौफ का मंजर दिखाई दे;
लगें सहमी हुई चारों दिशायें क्या किया जाए!!

यहाँ बेटों पे है उन्माद,बंदिश है नहीं कोई;
मिलें बेटी को ही हरदम सजायें क्या किया जाए!!

वो रांझा हीर के यारों हुये किस्से पुराने हैं;
न अब वो इश्क़ है न वो वफायें क्या किया जाए!!

कभी आँधी,कभी तूफां,कभी लहरें,सुनामी हैं;
नहीं चलतीं मेरे हक में हवायें क्या किया जाए!!

मुआ ये हिज्र अब मुझ को न जीने दे न मरती हूँ;
नहीं लगतीं मुझे कोई दवायें क्या किया जाए!!

न झाँके जो गिरेवां में है ऊँगली दूसरों पर ही;
उसे शीशा भला कैसे दिखायें क्या किया जाए !!

तड़पती रूह है जिनमें जो दिल पर बोझ हैं “मेघा”;
वो रिश्ते तोड़ दें या कि निभायें क्या किया जाए!!

मेघा योगी गुना म. प्र.

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