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श्रीमती मधु तिवारी, रायपुर छत्तीसगढ़

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

श्रीमती मधु तिवारी, रायपुर छत्तीसगढ़

Priti Surana July 21, 2018
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इस सप्ताह सृजक सृजन समीक्षा विशेषांक में प्रस्तुत है *श्रीमती मधु तिवारी, रायपुर छत्तीसगढ़* का परिचय, आत्मकथ्य एवं रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा रहेगी।

प्रस्तुतकर्ता

*अन्तराशब्दशक्ति*

*परिचय*

कवयित्री – श्रीमती मधु तिवारी

शिक्षिका

रायपुर छत्तीसगढ़।

योग्यता – एम ए हिंदी, अर्थशास्त्र, डी.एड., छत्तीसगढ़ सेट।

हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी कविताएं, गीत, गजल, सजल, भजन,कहानियां, लघु कथाएं लेखन में सक्रिय…..

 

*आत्मकथ्य*

मुझे अपने लेखन के बारे में याद नहीं है कि कब से मैंने लेखन प्रारंभ किया। छिटपुट हाई स्कूल से ही लिखना शुरु कर दी थी। क्योंकि मेरे पिताजी ” श्री सी. पी. तिवारी सावन” भी कवि हैं उन्हीं की कविताओं को पढ़कर मुझे प्रेरणा मिली । परंतु शिक्षिका बनने के बाद ही लेखन को गति मिली हमारे प्रशिक्षण में सभी शिक्षकों को कुछ भी सुनाने के लिए आमंत्रित किया जाता था तो मैं स्वरचित कविताएं सुनाया करती थी। तो सभी बहुत पसंद करते थे।और सुनाने का आग्रह करते थे। इससे उत्साहित होकर मैं निरंतर कविताएं लिखती चली गई ।और अपने शिक्षक बंधुओं बहनों को भी सुनाती गई।अब निरंतर लिखना जारी है।

दो तीन पुस्तकों के प्रकाशन का कार्य प्रगति पर है।

कविताओं के साथ लघुकथाएँ, कहानियां अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी और हिंदी मे लिखती हूँ। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती रहती है।

व्यस्तता बहुत रहती है जो भी लिखती हूं स्वांत सुखाय लिखती हूं जो मेरे दिल को तसल्ली दे,दिल छू जाए या दिल को झकझोर दे। ऐसी परिस्थितियाँ मुझे कलम चलाने को प्रेरित करती हैं। साथ ही प्रकृति से मुग्धता और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता यही मेरे काव्य विषय हैं।

 

रचनाएँ

 

*1. आवाज*

 

आवाज सुन मेरी आना तुम।

भाव सागर पार लगाना तुम।

 

द्रोपदी को सखी बनाए थे,

तुम उसकी चीर बचाए थे,

मेरी भी लाज बचाना तुम।

आवाज सुन मेरी आना तुम।

 

पार्थ को पाठ पढ़ाए थे,

सत्य को विजय बनाएं थे,

मुझे भी गीता सुनाना तुम।

आवाज सुन मेरी आना तुम।

 

विदुरानी भी भरमाई थी,

केले छिलके को खिलाई थी,

मुझको भी यूं भरमाना तुम।

आवाज सुन मेरी आना तुम।

 

कुंती में ममता जो जागी,

वह भक्ति में दुखड़ा मांगी,

मुझ में यह भाव जगाना तुम।

आवाज सुन मेरी आना तुम।

 

*2.दीवारें*

 

कहते हैं अब जमाना,

खूब बदल गया है।

तभी तो चीजों का,

रूप बदल गया है।

 

पहले तो दीवारें कच्ची,

मिट्टी के हुआ करते थे।

जो प्रेम और ममत्त्व से,

दिलों को छुआ करते थे।

 

दीवारें मिलकर के,

घर बनाया करते थे।

जो घरवालों के बीच,

विश्वास जगाया करते थे।

 

दीवारें मूक और प्रसन्न,

खड़े किनारे होते थे।

अंदर रहने वालों के,

मजबूत सहारे होते थे।

 

उष्णता से दूर वे,

शीतलता से ओतप्रोत थे।

समस्त कुटुंब के,

ममता आशीष के स्रोत थे।

 

अब जमाने के संग,

वह भी बदल गया है।

जमाने की तरह ही,

रहने को मचल गया है।

 

अब ईट कंक्रीट के,

मजबूत दीवारें बनने लगे।

रिश्ते भी अहम से,

उनके ही तरह तनने लगे।

 

दीवारों को बीच में,

आने की आदत हो गई।

अपनों से दूर प्रेम,

पूजा और इबादत हो गई।

 

दिवारें जरूरत से ज्यादा,

मजबूत होते जा रहे।

करके कमजोर जो,

रिश्तों को खोते जा रहे।

 

घरों को बनाने वाले,

अब  मकान बनाने लगे।

यहां केवल स्वार्थ से,

सब पैसा कमाने लगे।

 

बीच में बनी दीवारें,

अब दिलों में बैठ गए।

अपनों से ही लोग,

दूरी बनाकर ऐंठ गए।

 

मिट्टी की दीवारों सा,

इसमें कोमल भाव कहां।

परिवारों में पहले का,

. प्यार और लगाव कहां।

 

कर रही है ये “मधु”,

अब भी तुम संभल जाओ।

समेट लो परिवार को,

दूर नअधिक निकल जाओ।

 

*3.शमा*

 

शमा! तुम तो जलती रहना।

तम न हरुँ, कभी न कहना।

 

है रोशन करना तेरा धर्म

करती जाना तू अपना कर्म

पर उपकार में रत रहकर,

सदा  सरिता धारा सी  बहना।

शमा! तुम तो जलती ही रहना।

 

तभी तू जग से न्यारी है

लगती सभी को प्यारी है

जलते-जलते ढल जाना

अगन को तुम सीने में सहना।

शमा!तुम तो जलती ही रहना।

 

परवाने कई अटकाने

आते राह से भटकाने

कर्म पथ पर चलो सदा ही

कर्म श्रृंगार,     कर्म ही गहना।

शमा! तुम तो जलती ही रहना।

 

जब आंधी तूफान आए

शमा तो उससे भी टकराए

कभी नहीं घबराओ समा,

न ही संग में उसके  बहकना।

शमा! तुम तो जल्दी ही रहना।

 

*4.हमसफर*

 

हमसफ़र तेरे साथ मैं, चलती ही गई।

बदला जमाना तो मैं, बदलती ही गई।

 

जनमी तेरे घर तो मायूसी थी वहाँ,

बेखबर उन बाहों में, मचलती ही गई।

 

स्पर्धी नहीं भाई, बहना थी तेरी मैं,

भेदभाव के साथ, सदा पलती ही गई।

 

कदम जो रखी नई दुनिया मे प्रीतम की,

कई ठोकरें खाकर, संभलती ही गई।

 

हुई थी बड़ी धन्य मैं बनकर के जननी,

ममता की वर्षा तुझ पर, उड़लती ही गई।

 

उगे जो पंख तो चला तू मुझे छोड़ कर,

जीवन की शाम यहीं, अब ढलती ही गई।

 

कमतर ही आंके बराबर थी मैं फिर भी,

बात ये जीवन भर मुझे, खलती ही गई।

 

हमसफ़र तेरे साथ मैं, चलती ही गई।

बदला जमाना तो मैं, बदलती ही गई।

 

5.सार*

 

राम नाम ही सार है।

मिथ्या यह संसार है।

 

रामभजन के सहारे,

होते  बेड़ा पार है।

 

सबसे बड़ा धर्म  कहें,

तो वह पर उपकार है।

 

कहते   गहरा रंग वो,

जिसको कहते प्यार है।

 

वही महान हो जग में ,

जिसके कंधे भार है।

 

खेल जीवन सुख दुख का,

पतझड़ या कि बहार  है।

 

6.बल*

 

वही बल होता काम का,

जो निर्बलों का साथ दें।

निस्सहायो को सदा वह,

जरूरत पड़े तो हाथ दे।

 

किसी पर अत्याचार हो,

या देखें हम कातरता।

दया दिखा कर चले गए,

है यही हमारी कायरता।

 

बेजुबानों,   बेसहारों,

पर हुआ गर अत्याचार।

बेशक बल दिखाओ वहां,

तुरत तुम करो प्रतिकार।

 

उसी ने पाया सम्मान,

सबको साथ जो ले चले।

जैसा देखा लोगों को,

वैसा उनके साथ ढले।

 

माना बलवानों पर ही,

टिका हुआ संसार है।

कमजोरों को गर सताया,

तुमको बली धिक्कार है।

 

राम जैसा हो बलवान,

श्याम सा रहे जो न्यायी।

तो सुखी सब लोग होवे,

और वतन हो सुखदाई।

 

*7.वार करो*

 

उठाओ कुल्हाड़ी!   वार करो।

अब किसी से न,तकरार करो।

बनाओ,     बर्बादी का मंजर,

तुरत उसको,    साकार करो।

 

रोके तुझे जो भी हाथ

दे रहा जो   मेरा साथ

उन सभी को  लाचार करो।

उठाओ कुल्हाड़ी वार करो।

 

भूकंप आय  तो सहना

बाढ़ तूफान संग बहना

अपना जीवन  दुश्वार करो।

उठाओ कुल्हाड़ी वार करो।

 

बिना वर्षा के जीना तुम

सूर्यतप को    पीना तुम

इस दुनिया को बेजार करो।

उठाओ कुल्हाड़ी वार करो।

 

वन उजड़ेगा हरा-भरा

बंजर होगी    वसुंधरा

प्रलयंकर  यह संसार करो।

उठाओ कुल्हाड़ी वार करो।

 

मिट जाएगी   हरियाली

खत्म हुई तब खुशहाली

अपने माथे सब  भार करो।

उठाओ कुल्हाड़ी वार करो।

 

श्रीमती मधु तिवारी, रायपुर छत्तीसगढ़।

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