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अनीता मिश्रा ‘सिद्धि’, पटना

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

अनीता मिश्रा ‘सिद्धि’, पटना

Priti Surana July 28, 2018
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इस सप्ताह *सृजन सृजक समीक्षा विशेषांक में प्रस्तुत है *अनीता मिश्र “सिद्धि”*, पटना के परिचय, आत्मकथ्य और रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है।

 

*प्रस्तुतकर्ता*

*अन्तरा-शब्दशक्ति*

 

*परिचय*

नाम – अनीता मिश्रा

पिता का नाम -श्री श्याम देव उपाध्याय

माता – श्री मती तारा देवी।

जन्म -स्थान बिहार

जन्म- तिथि  28 सितम्बर

पति-श्री मोहन मिश्रा (वन -अधिकारी झारखण्ड)

 

स्वतंत्र लेखन कविता, कहानी, लेख, संस्मरण, यात्रा वृतांत, लधु- कथा ।

मुक्त छंद और भाव ही लिखती हूँ।

हजारीबाग रेडियो में कविता कहानी

पाठ ।

1  -सचिव -भाषा सहोदरी, संपादक झारखण्ड पेज की।

आगमन समूह की झारखण्ड  अध्य क्ष, कई पंजीकृत संस्था की संस्था पक सदस्य ।

2 -सदस्य, कई राष्ट्रिय-अंतर राष्ट्रिय पेज

वेब पेज पर लेखन।

3 -सम्मान- 2014 में  साहित्ययुग सुरभि सागर

सम्मान

4–साझा संकलन ‘”अहसास एक पल के लिए।

2015 में – भाषा सहोदरी हिंदी सम्मान ,साझा-संकलन सोपान 2

के लिए प्रसिद्ध रचनाकारां मैत्री पुष्पा जी से सम्मानित दिल्ली में।

5 -प्रतिभा मंच काव्य सम्मान , गजल ए

कारवान के लिये साझा संकलन,

5 -2016 में साहित्य सुरभि सम्मान

6 -कलम के कदम, सत्य -प्रकाश  साझा संकलन के लिये। सुभाष चंदर द्वारा सम्मानित।

7–मन की बात , एक पृष्ठ मेरा भी साझा संकलन काव्य किताब।

 

कुजं- निनाद नूतन कुजं की सह-संम्पादक

 

और साझा संकलन भी ।2017 में प्रकाशित।

पटना  की लेख्य-मंजूषा की सदस्य

 

और त्रैमासिक पत्रिका में लेखन भी 2017 में ।

आदरणीय सतीश-पुष्पकर्ना जी से सम्मानित

लघुकथा के लिए  अखिल-भारतीय लघुकथा मंच के अंतर्गत  पटना बिहार में ।

नंदनी साझा काव्य संग्रह ।

कुजं निनाद संग्रह।

8 -साहित्य-संगम काव्य सम्मान

9-काव्य सागर संस्मरन सम्मान

10–सहोदरी नारी सम्मान

11 -साहित्य संगम नारी सम्मान ।

12 -संस्मरण -सम्मान पटना में ” प्रेम – नाथ खन्ना “संस्मरन सम्मान “” रत्ना – पुरकायस्थ और सामयिक – परिवेश पत्रिका के संपादक समीर परिमल द्वारा सम्मानित 29 जुलाई 17 को । पुरे भारत में 29 रचनाकारों को ये सम्मान मिला था।

13 –  मातृ-भाषा वेब में लेखन कविता ,लेख।

15- 29/11/17 को  बदलता बिहार बढ़ता बिहार के तहत   पटना में ” महिला- गौरव ” से सम्मामित ।

16-  5/ 10 / 17 को ” अखिल- भारतीय लघुकथा” के लिए सम्मान – पत्र  मिला ।

17- राष्ट्रिय- कवि -संगम  द्वारा धनबाद में आयोजित

18-काव्य-सम्मेलन में  “सारस्वत -सम्मान ” से सम्मानित ।

19- नेपाल से आये वरिष्ठ-साहित्यकार से लघुकथा के लिए पटना में  4 /6/2018 को लघुकथा के लिए सम्मान-पत्र पटना बिहार में मिला।

20 –  सामयिक-प्रवेश में पत्रिका, और कई पत्रिकाओं

में कविता , लघुकथा प्रकाशित ।

21 – काव्य -सागर वेब-साइट में  संस्मरण -सम्मान से सम्मानित ।

22- बेटी कविता काव्य-सागर से सम्मानित के लिए सम्मानित ।

सवेरा ई पत्रिका में , गजल -गुँजन आह्लाद

साहित्य-सँगम के ई पत्रिका में कविताएँ लिखी ।

मॉरीशस  में होने वाले ” विश्व- हिंदी साहित्य सम्मेलन के लिए” चुनी गई हूँ ।

सितंबर माह में  होने वाली है।

पटना की पत्रिका “लेख्य- मंजूषा ” की सदस्य।

अटूट- बन्धन पत्रिका में लेखन ।

अर्णव- कलश  द्वारा कई सम्मान

काव्य दिग्गज सम्मान

यात्रा संस्मरण सम्मान

लघुकथा सम्मान

साक्षात्कार सम्मान

हिंदी-साहित्य सम्मान

रितोपार्ज सम्मान

एकांकी लेखन सम्मान।

 

साहित्य-सँगम  लोक-भाषा

भोजपुरी सम्मान ।

भोजपुरी में भी लिखती हूँ।

कलमकार पत्रिका में लघुकथा प्रकाशित ।

कई बार श्रेष्ठ-टिप्पणीकार

और रचनाकार सम्मान।

2018  का मंच- कविता पाठ करने के लिए।

संगम -साहित्य द्वारा कई सम्मान

कई ऑनलाइन कवि सम्मेलन सम्मान।

नूतन- कुजं ,जनचेतना , जिज्ञासा मंच द्वारा

कई बार लेखन के लिए सम्मानित ।

 

देल्ही के कई प्रतिष्ठित अख़बार और पत्रिकाओं में लेखन।

हिंदी की सभी साहित्यिक -,संस्था से मेरा जुड़ाव हमेशा रहेगा । नव-प्रदेश , सौरभ -दर्शन , दैनिक मेट्रो देल्ही,

 

मातृ-भाषा .कॉम, काव्य-सागर , कई वेबसाइट से जुडी हूँ।

कई किताबो का साझा संपादन भी किया।

बर्नाली एक साझा उपन्यास  भी लिखा।

 

साहित्य-सँगम संस्थान के सँगम सुहास नारी मंच के लिये।

कितने सम्मान मिले याद नही मुझे ।

100 से ज्यादा मंचों पर हिंदी के लिए जुड़ी हूँ ।

*आत्म-कथ्य*

लेखन में मेरी अभिरुचि बचपन से ही थी। पहले रेडियो सुनती थी, और गीतों को डायरी में लिखती थी । कुछ भाव जो मेरे मन में आते थे उसे सँजोती थी ।

 

फिर शादी हुई, पति वन-अधिकारी मिले ।

विज्ञान की छात्रा थी,पर हिंदी साहित्य को पढ़ती ।

प्रेम-चंद , महादेवी, निराला ,दिनकर , शिवमंगल -सुमन जी , शिवानी  , पंत , निर्मल-वर्मा , ममता कालिया ,

कबीर के दोहे , सुर के पद । कई लेखकों ने मुझे प्रभावित किया ।

झारखण्ड के हजारी बाग़ में ज्यादा समय बिता मेरा । प्रकृति के सानिध्य में अपने बड़े से बगीचे में पलाश के पेड़ को देखती और कविता रचती ।

जब बच्चे मुझसे दूर हुए ,मैंने यूँ ही फेसबुक ज्वाइन किया ,और भाव लिखने लगी ।

दो बेटे है मेरे ।

दोनों  इंजिनियर है।

मेरा मार्गदर्शन कई फेसबुक के मित्रो ने किया लेखन में ।

कविप्रतापसिंह नेगी जी , अमरजी , ब्रजेश -विफल जी , कई मित्रो ने ।कुसुमेश जी ।

मैं कोई कवियत्री नहीं हूँ ,बस मन के भाव लिखती हूँ ।

हर विधा पर मैंने लिखा है। मेरे प्रेरणा-स्रोत मेरे दादाजी आदरणीय डॉ बालदेव उपाध्याय जी रहे जिन्हें लेखन के लिए “पदम्- श्री ” सम्मान से सम्मानित किया गया है।

सबसे पहली साझा कविता मेरी “अहसास एक पल थी “।

पति-पुत्र माता- पिता बहन -भाइयों का सहयोग रहा।

सबसे ज्यादा मेरे फेसबुक के मित्रों का रहा जिन्होंने सदा  उत्साह बढ़ाया मेरा लेखन के लिए ।

आद 0 प्रीती जी का शुक्रिया अदा करती हूं  आभाऱ भी आज ये आत्म-कथ्य आप सभी के सामने है।

कई मंचों को सँवारा है मैंने हिंदी के लिए, अभी भी सहयोग करती हूँ।

पर व्यथित हूँ आज साहित्य-बाजार बन गया है ।

जीवन में ज्यादा खुशियां ही मिली , दुःख कम देखे। मेरे गुरुदेव की कृपा है।

भोजपुरी में भी लिखती हूँ मैं।

मैं कुछ भी नहीं आप है तो मैं हूँ ।

माँ शारदे की कृपा बनी रहे मुझपर।

नमन ।

“सिद्धि”

मेरा साहित्यिक नाम है मेरा।

अनीता मिश्रा “सिद्धि”

 

*रचनाएँ*

*1.नन्हीं कली हूँ खिलने दो।*

 

नन्हीं कली हूँ खिलने दो ,

चाहती हूँ उड़ना नभ पर ,

मेरे सपनो को  नये पर दो ।

 

ढेर सारे चाहत मेरे तितली जैसे

रंग- बिरंगे ,

कुछ करने की कुछ बनने की ।

दिल में लगन लगी है मेरे,

मेरी चाहत को मचलने दो ।

नन्हीं कली हूँ खिलने दो ।

 

मत-तोड़ो मत मसलो मुझको,

धरा भी मेरी आसमान भी मेरा ।

माँ – बाबा का आँगन भी मेरा ,

तेरे बगिया की पायल हूँ,

रुन- झुन संगीत बिखरने दो ।

नन्हीं कली हूँ खिलने दो।

 

मत देखो वहशी नजरो से,

मैं एक पावन प्रेम हूँ ।

महक उठेगा ये जग सारा ,

वो मधुरिम नेह हूँ ।

फूल बन महकने दो ,

नन्हीं कली हूँ खिलने दो।

 

*2.अर्पण  मैं सारा प्यार कँरु।*

 

चंचल -चित था मेरा ,

हर रात था बहुत घनेरा ।

मिला जब से बाँहो का घेरा ,

सिंदूरी हो गया सवेरा ।

हर पल तुमको याद करूँ ।

अर्पण मैं —

 

तेरी सुगन्ध से मैं महकूँ,

आँगन में बुल-बुल बन चहकूँ ।

पोर-पोर तेरे प्यार से भींगा ,

नींद मेरी चैन है छिना ।

अब कैसे इजहार करूँ

अर्पण मैं  सारा प्यार करूँ ।

 

तेरे बिन  सुर नहीं सधते ,

गीत सभी अधूरे लगते।

मेंहन्दी के रंग है फिके ,

रात है सुनी दिन भी रीते ।

बोलो कैसे  मैं धीर धरूँ

अर्पण मैं —

 

हृदय में तू ही तू रमता

आँखों में तू ही तू बसता ।

कैसे तुझे बताऊँ साजन ,

मन में है हल-चल हरदम ।

तू आइना हो मैं सिंगार कँरूँ,

अर्पण मै सारा प्यार कँरु।

 

*3. बेटी*

बेटी तू हमार मन में बसेलु ,

आंख के पुतरी जइसन लागेलु ।

 

तोहरा खातिर हम सब कुछ त्याग देब ।

सुनर घर आउर वर साथे प्यार देब ।

 

हमरा घर के आँगन में चहके लू तू।

चंदा चमेली अइसन महके लू तू ।

 

लागेला तहार मुखवा भगवती अईसन।

जगत जननी दुर्गा – माई जईसन ।

 

बेटी नेछावर तोहके सबे प्यार  करेनी ।

हम तहरा के अपना हृदया में राखेनी ।

 

*4. गुलाबी खत।*

 

अभी तक याद है वो गुलाबी खत,

पह्ली बार मिली मुझे

जब तुमसे दूर होकर

मायके आयी

थी।

 

वो जमाना था,डाकिया खत लाता,हम बैठे करते रहते इंतजार।  मानो डाकिया देवदुत हो

?

 

बाबुजी से कांपते हाथो से

खत लेना,भाभी बहनो से छुप कर रात मे देर तक खत के शब्दो के साथ महशुस  करना तुम्हे ।

 

क्या दिन थे वो लिखना तुम्हारा देखो जंगल मे हूँ ,

पता है ना यहाँ बिजली नहीं,लालटेन की रौशनी मे लिख रहा हूँ ुं,शीघ्र जवाब देना!!

खत खोली सुखीपत्ती गिरी खत से,समझ गयी फूल ना सही पत्ती तो मिली!!

 

कितना प्रेम था,कितनी अनकही बाते सब बंया हो जाती थी खत  मे!!

आज तो चन्दमिनट मे सब

बाते खत्म, वो इन्त्जार,वो शब्द जो तुम्हारे उंगली से छुकर मेरे नाम तक जाते थे ।

कहाँ गयी वो कहानी!!

 

आज भी महकता है गुलाबी खत तुम्हारा हर पल मेरे यादो में ।

 

कश एक बार फिर वो खत लिखते मुझे लालटेन की रौशनी में तुम ?

 

*5.स्पर्श*

 

आज तक याद है

वो मीठा स्पर्श तेरा,

नव-यौवना संकुचित सी

दुल्हन बन आयी,

नये घर,नयेलोग,

नया परिचय तुम्हारा !!

 

अब तक मां-बाबा भाइ,

बहन से ही पाया स्नेहिल स्पर्श,

 

ये नया सा अहसास तेरे छुवन का,

हाथो मे हाथ लेकर मानो कह रहे हो,

 

आओ संगनी स्वागत है,

मेरे हृदय-कुंज में,

जी ले हम इस मधुर पल को,बना दे अमिट इस मौन रात्री को ?

कितने झंझावात  सहे जीवन मे

चाहत में तुम्हारे सब भूल सी जाती

मैं ,

वो स्पर्श याद कर मर कर भी जी जाती मैं ।

सांध्य -वेला है,ढलती उम्र की पहाडी पर खडी,

आज भी उस स्पर्श को याद कर जी लेती हूँ

तुम्हारे साथ सभी बीते  हुए पल को।

 

*5.ग़ज़ल*

 

शीत थी और बर्फ बारी भी।

रात ग़ुरबत ने यूँ गुज़ारी भी

 

वो जो बिछड़े तो रो दिये पल में

जान निकली है तब हमारी भी।

 

उसकी ग़लती तो थी मगर दिल ने

ख़ूब की उस पे जाँ निसारी भी

 

माँ को भूले तो यह भी भूल गये

माँ की हम पर है ज़िम्मेदारी भी

 

आज तो हर क़दम पे मिलते हैं

दोस्त के रूप में शिकारी भी।

 

जिस पे हुस्न-ओ -करम लुटा डाला

उसने करदी है मेरी ख़्वारी भी

 

बेजुबाँ  हो गये थे मुंसिफ तक

दास्ताँ जब सुनी  हमारी भी ।

 

*7.ले चलो ससुराल ।*

हास्य रचना।

 

साजन बोले सजनी से ले चलो हमे प्यारी ससुराल ।

मोदी के राज में बिगड़े है  मेरे हाल ।

 

साले -साली -सरहज से सेवा करवाऊंगा ।

सास -ससुर का माल खाकर थोड़ा तगड़ा हो जाऊँगा ।

 

 

तुम भी  प्यारी आराम करना ।

बहनों -भाभी के सँग  गप्पे मारना ।

रात -दिन चैन से कटेंगें हो जाऊँगा निहाल ।

ये सुनते ही श्रीमती बोली तत्काल ।सारे लोगों के कपड़े लेने साथ मेरे अब चलो  मॉल ।

तब  श्रीमान आपको ले चलती हूँ

ससुराल ।

पति – महाशय सुनकर रहे बहुत पछताय ।

बोले बड़े प्यार से अपने घर में है भले हम ।

क्यों हम” ससुराल “जाय ?।

 

8.मेरी लेखनी मचलती है।*

 

जब यह लेखनी मचलती है

तब मन को मेरे छलती है ।

 

बहुत सोचती यह

बहुत चाहती यह

मन के भावों को

रुष्ट अहसासो को

मेरे हृदय से निकलती है

तब मन को मेरे.छलती है।।

 

भारत के गद्दारो को

सेना के हत्यारो को

क्यों सहते हम रहते है

क्यों चुप चुप हम रहते है

यह बात शूल सी गड़ती है

तब मन को मेरे छलती है ।

 

छुपता सत्य भी आवरण में

लालच -हिंसा है बचपन में

गये मात-पिता वृद्ध-शाला

मानव बनता विष का प्याला

मेरी साँस अब सहमती है

तब यह लेखनी मचलती है ।

तब मन को मेरे छलती है।।

 

चाहे सत्य को सत्य लिखना

देश औ वचन पर मर  मिटना

कर्म कृष्ण सा करते रहना

मन , धैर्य उर्मिला सा धरना

मन से उदगार  निकलती है

तब मन को मेरे छलती है

जब यह लेखनी मचलती है।

 

अनीता मिश्रा “सिद्धि”

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