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पूनम झा, कोटा (राजस्थान)

Uncategorized सप्ताह का कवि विशेषांक

पूनम झा, कोटा (राजस्थान)

Priti Surana September 8, 2018
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इस बार *सृजक-सृजन-समीक्षा विशेषांक* में प्रस्तुत है *पूनम झा, कोटा (राजस्थान)* की रचनाएँ। आप सभी की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।

*प्रस्तुतकर्ता*
*अन्तरा-शब्दशक्ति*

*परिचय*

नाम :- पूनम झा
पिता का नाम :- डा. उग्र नाथ मिश्र
माता का नाम :- श्रीमती ऊषा मिश्र
पति का नाम :- श्री दिनेश्वर झा
वर्त्तमान / स्थायी पता :- कोटा (राजस्थान)
वाटस एप नम्बर:- 9414875654
शिक्षा :- बी.ए.(ऑनर्स), बी.एड
जन्म :- 14. अगस्त 69
Email:-poonamjha14869@gmail.com

साहित्यिक परिचय :- डेढ़ वर्ष तक H for Hindi के संपादक

दो ब्लॉग :-
1. mannkibhasha.blogspot.in
2 . astitwa1.blogspot.in

प्रकाशित पुस्तक :-
1. चौंक क्यों गए ( लघुकथा संग्रह )
2. बेवफा हो तुम ( ई बुक )

कुछ काव्य संग्रह और लघुकथा संग्रह प्रकाशन की प्रक्रिया में है |

प्रकाशित साँझा संकलन –
1 . अमृत काव्य ( काव्य संग्रह )
2 नारी सागर ( काव्य संग्रह )
3. कुञ्ज निनाद ( काव्य संग्रह )
4. भारत के युवा कवि एवं कवयित्रियाँ (काव्य संग्रह )
5. वूमेन आवाज “ नारी से नारी तक “
6. “दृष्टि” महिला लघुकथाकार अंक ( लघुकथाएँ )
7. बेटियाँ’, साहित्यपीडिया (काव्य संग्रह )
8. परिंदों के दरमियान ( लघुकथाएँ )
9. साहित्य ऋचा, ( काव्य संग्रह )
10. काव्य कलश ( ई बुक )
11. अंतरा शब्द शक्ति ( ई बुक )
12. तेरे मेरे शब्द ( काव्य संग्रह )

सम्मान विवरण : –
1. अमृत काव्य सम्मान,
2. विश्व हिंदी श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान,
3. नारी सागर सम्मान ,
4. श्रेष्ठ शब्द शिल्पी सम्मान ,
5. साहित्यपीडिया काव्य सम्मान
6. मुक्तक लोक भूषण सम्मान
7. साहित्य सागर सम्मान
8. काव्य संपर्क सम्मान एवं फेसबुक समूहों पर कई सम्मान प्राप्त हुए हैं |
प्रकाशन विवरण :- दैनिक भास्कर , दैनिक नव ज्योति, नव एक्सप्रेस, लोकजंग, अंतरा शब्द शक्ति , ब्रज उपहार, संतुष्टि सेवा, साहित्य लोक, अमृत काव्य, हिंदी साहित्य सागर, नारी काव्य, भारत के युवा कवि एवं कवयित्रियाँ, अमर उजाला, दैनिक वर्तमान अंकुर, पूर्वाञ्चल प्रहरी, साहित्य धरोहर इत्यादि अखबार, पत्र – पत्रिकाओं में एवं कई वेब पत्रिकाओं में कविताएँ , मुक्तक , लघुकथाएँ इत्यादि प्रकाशित होती रहती है | 85-90 रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी है ( डेढ़ वर्ष में ) |

*आत्मकथ्य*

मेरा बचपन झारखण्ड में बीता। डी.वी.सी.बोकारो थर्मल पावर स्टेशन के स्कूलों से मैंने पढाई की है। एल.एन.मिथिला यूनिवर्सिटी से बी.ए.ऑनर्स एवं बी.एड. किया।
बचपन से ही किसी विषय या किसी घटित घटनाओं पर लिखना मुझे पसंद रहा है । छोटी-छोटी कविताएँ भी लिख लिया करती थी और सहेलियों को सुनाया करती थी । सभी से सराहना भी मिलती थी । पर इसे मैं कभी भी गम्भीरता से नहीं ली और न ही उसे सहेज कर रखा । किन्तु जब कभी कोई विचार मन में घूमने लगता था तो उसे अपने शब्दों में लिखकर व्याख्या जरूर करती थी।
मनोविज्ञान मेरा प्रिय विषय रहा है। किसी के हाव-भाव से या बात करने की प्रक्रिया से उसके स्वभाव और उसके मन में क्या चल रहा है, ये समझ जाती हूँ उसे किसी काल्पनिक पात्र के माध्यम से अक्सर लिखती रही हूँ । मेरे इस शौक से मायके के लोग भी अनभिज्ञ रहे ।
विवाह के बाद पति ( दिनेश्वर झा, जो एक्सक्यूटिव इंजीनियर हैं ) की नौकरी स्थानांतरण वाली होने की वजह से सरकारी नौकरी ( शिक्षिका ) में चयनित होने पर भी नौकरी नहीं की । घर-परिवार में व्यस्त हो गयी और मेरा लिखना भी बिल्कुल बंद हो गया ।
मैं अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने में व्यस्त हो गयी । लेकिन बीच-बीच में एक इच्छा होती थी कि मैं आत्मकथा लिखूं और एक पुस्तक तैयार करूँ । पर ये विचार मन में ही दब जाता था ।
जब मेरी बेटी ( दिव्या प्रियम झा, साफ्टवेयर इंजीनियर ) नौकरी करने लग गई और बेटा ( अतुल्य रतन झा ) 2014 में आई.आई.टी. में दाखिला लेकर बाहर पढ़ने जाने लगा तो फेसबुक पर मेरा एकाउंट बना दिया ताकि मैं अब इसमें भी अपना कुछ समय व्यतीत किया करूँ, क्योंकि मैं फेसबुक से स्वयं को और बच्चों को भी दूर ही रखती थी ।
एकाउंट बनाने के बाद भी मेरा मन फेसबुक पर कम ही लगता था ।
कहते हैं न कि हमारे जो शौक होते हैं, वो हमेशा जिन्दा रहता है । मैं खाली समय में कविताएं, लेख और कहानी लिखने लगी ।
मेरे लेखन पर सबसे पहली प्रतिक्रिया मेरे बच्चों का ही रहा । अर्थात् प्रथम प्रसंसक मेरे बच्चे हैं। उन लोगों ने सराहा “वाऊ ! मम्मी बहुत अच्छा लिखती हो ।” फिर मेरी बेटी ने कहा कि ‘मम्मी ब्लॉग बनाओ और उस पर पोस्ट कर दिया करो ताकि तुम्हारी रचनाएँ एकत्रित भी रहेगी और गुगल पर कई पाठक इसे पढेंगे ।’ 2015 में मैंने दो ब्लॉग बनाया
1. mannkibhasha.blogspot.in
3. astitwa1.blogspot.in
इसके बाद मैं जो भी लिखती थी, उसे इस पर पोस्ट करने लगी । फिर मैं 2016 के मई से फेसबुक पर भी लेख, लघुकथा और कविताएँ पोस्ट करने लगी । लोगों ने बहुत सराहा। मैं फिर फेसबुक पर ही कई साहित्यिक समूहों से जुड़ी और कई लोग समूह में मुझे स्वयं जोड़ भी लिये । इसके बाद तो समूहों पर आयोजन के विषय पर लिखने लगी ।
चूंकि फेसबुक पर हम परिवार वालों से भी जुड़े रहते हैं । मेरे परिवार के लोग मेरी रचनाएँ पढ़ते थे और अचंभित थे कि ये मैं कब से लिख रही हूँ ? वे लोग बहुत खुश हुए । मेरे पिता ( डा. उग्र नाथ मिश्र, जो अर्थशास्त्र के प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त हैं ) जो फेसबुक पर तो नहीं हैं किन्तु परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा उन्हें मालूम हुआ कि मैं लघुकथाएं और कविताएँ लिखती हूँ तो बहुत खुश हुए । फिर उन्होंने कहा कि “तुम इसे अखबार, पत्रिका वगैरह के लिए भेजो । तुम्हारी रचनाएँ अवश्य प्रकाशित होगी । बहुत अच्छा लिखती हो ।” उनका प्रोत्साहन मेरे लिए एक बुटी सा काम किया । मुझे जैसे एक उर्जा मिल गयी हो ।
मैं अपनी रचनाएं पत्रिकाओं और अखबारों के लिए भेजने लगी और मेरी रचनाएं छपने भी लगी । इसके बाद तो कई अखबार और पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ छपने लगी । जिसमें कविताएँ एवं लघुकथाएं दोनों ही शामिल है ।
कई सम्मान पत्र भी मिलते रहे और मैं समुद्र रूपी साहित्य में तैरना सीखने लगी।
मुझे लगता है कि लघुकथा के माध्यम से हम समाज के कई विसंगतियों को कम शब्दों में निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पाठकों को आकर्षित कर सकते हैं । आज के वक्त में हर व्यक्ति व्यस्त है । किसी के पास इतना समय नहीं है कि बहुत लम्बी कहानी पढ़े, किन्तु लघुकथा पढ़ने के लिए पाठक समय निकाल ही सकता है । इतना ही नहीं “लघुकथा” पाठक पर तीव्र गति से प्रभाव डालने में अधिक सक्षम होता है ।
मेरा शौक ( लेखन कार्य ) धीरे-धीरे जुनून बनता चला गया ।
कुछ समूहों की माडरेटर भी हूँ । एक साहित्यिक वेबसाइट H for Hindi के सम्पादक के रूप में डेढ़ वर्ष रह चुकी हूँ ।
दिसम्बर 2017 में फेसबुक पर अपना एक पेज भी बनाया है ।
मुझे लगता है कि किसी भी रचनाकार को लिखने की हमेशा तृष्णा रहती है, जो जरूरी भी है । मैं भी अपने आस-पास की घटनाएं या जिन्दगी से जुड़ी आम बातों को उभारकर लघुकथा में समेटने की कोशिश करती रहती हूँ । बड़े साहित्यकारों की लघुकथाओं को पढ़ती हूँ और उससे लघुकथा की बारीकियों को समझने की कोशिश करती रहती हूँ , क्योंकि सीखना तो जीवन पर्यन्त चलता रहता है ।
साथ-ही-साथ मेरा मानना है कि मेरी लघुकथा के माध्यम से यदि दो-चार लोगों में ही विसंगतियां दूर हो जाए, तो भी मेरा लिखना सार्थक हो जाएगा ।
धन्यवाद ।
पूनम झा
कोटा राजस्थान

*लघुकथाएँ*

*1″ गुब्बारा “*

मिस्टर एंड मिसेज शुक्ला माल से निकल कर अपनी गाड़ी की तरफ जाने लगे । मिस्टर शुक्ला थोड़ी तेजी से आगे बढ़ गए । मिसेज शुक्ला कुछ पीछे थी । तभी सामने से ………..
” ऐ माई जी ले लो गुब्बारा ” –एक चार-पाँच साल का छोटा सा बच्चा आगे – आगे चलते हुए कहे जा रहा था।
” हमें नहीं लेना बच्चे । गुब्बारा लेकर मैं क्या करूँगी ? ” –मिसेज शुक्ला ने कहा ।
बच्चा –” ले लो दस रुपए का ही है । “………
” नहीं लेना भई “—कहकर मिसेज शुक्ला चलने लगी ।
वो बच्चा एकदम से सामने आकर —” अरे ले लो न मुझे बहुत भूख लगी है । ”
उसकी आवाज में ऐसी मासूमियत थी कि मिसेज शुक्ला रुक गई और कहा —” ठीक है दे दो, दे दो। ”
दो गुब्बारा लिया मिसेज शुक्ला ने और उसे 20 रुपये दे दिए ।
मिस्टर शुक्ला गुब्बारा देखकर —” ये क्या करोगी ? क्यों लिया ये ? अपने बच्चे अब छोटे तो नहीं हैं । “…..
मिसेज शुक्ला –” वो बच्चा भूखा था इसलिए बेच रहा था । “……..
” पैसे दे देती । गुब्बारे लेने की क्या जरूरत थी । “—मिस्टर शुक्ला ने कहा ।…………
मिसेज शुक्ला — ” अजी ! यही गलती हमलोग करते हैं ।
वो बच्चा भीख नहीं मांग रहा था । कुछ बेचकर अपना पेट भरने की कोशिश कर रहा है । उससे गुब्बारा न लेकर यूं ही पैसा देकर क्या हम उसे भिक्षावृत्ति का
बढ़ावा नहीं देंगे ? ”

*2.”भूख और स्वाभिमान”*

“अरे जा रे घुनिया ऊ कार रुकल हई । देख देख
कुछ तो मिल जावेगा ।” कटनी बोली
“ऊंss हम नाही जाएब, तू जा रे ठल्ली ।”
“ऐ बाबूजी, कुछ पैसा दे दो ।” ठल्ली कार के कांच को ठकठकाते हुए ।
“जाओ-जाओ” कार के अंदर से आवाज़ आयी ।
ठल्ली भागकर कटनी के पास गई और “माई, ई काम हमका अच्छा नाही लागत है । टकटकी लगाए बैठल रही । कोनो मजूरी करत हैं ।”
कटनी–“हाँ तोहरे बाप के फैक्टरी हई ना, जा में मजूरी मिलत । ऊ एक घर बर्तन करे रही। ओके हमरे कामे पसंद नाही आवत रहे । काहे को मजूरी, बैठल मिल जात है । कोनो खराब नाही और ना ए से सेठ के कोनो कम पड़त है।”
“ऐ माई, तू झूठ नाही बोल ऊ बरतन करत बखत हूआं से तू पांच हजार रुपया चोरी करे रही । जे सेठानी भगा दई तोड़ा के ।” घुनिया तपाक से बोली ।
“चटाक…” एक चांटा जड़ दी कटनी और “चुप हमका सिखावत है ।”
तभी एक दुकानदार पांच रुपया हाथ में लिए –“ए छोरी ले ये ले ।”
“हमका कोनो काम देदो सेठ हम भीख नाही लेब ।” बैठे-बैठे घुनिया बोली ।

*3.”हुनर”*

“हैलो बहू कैसी हो ?”–सावित्री देवी ने कहा
“प्रणाम माँजी”–मालती जवाब दिया
“क्या बात है बहू तुम्हारी आवाज़ क्यों ऐसी है ?”–सावित्री देवी ने पूछा ।
“वो क्या कहूं आपको माँजी चिंटू को एक विषय का ट्यूशन करना है और विवेक कह रहे हैं कि इतना ट्यूशन फीस देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं । उसके भविष्य का सवाल है इसीलिए मन दुखी हो रहा है । विवेक को तो आप जानती ही हैं । अपनी परेशानी आपसे भी नहीं कहते और चिंटू को भी हिदायत दे रखी है कि आप लोगों से पैसा वगैरह नहीं मांगे ।”
“अरे तुम तो मुझे बताती।–चलो कोई बात नहीं मैं तुम्हारे ससुर जी से बात करती हूँ।”
सावित्री देवी अपने पति से –“सुनिये जी चिंटू को ट्यूशन करना है। आप उसके फीस के पैसे दे देते तो अच्छा होता।”
“क्यों विवेक ने कहा ?”
“नहीं जी विवेक कब कहता है ? वो तो बहु को दुखी देखकर मैंने ही पूछ लिया।”
“देखो सावित्री, बैंक में कुछ पैसे हैं वो मैं रामेश्वरम जाने के लिए रखा हूँ।”
“अजी बच्चे परेशान रहे तो हमें तीर्थ करने में भी कैसे अच्छा लगेगा ?”–सावित्री देवी ने कहा
“चलो ठीक है कल भेज दुंगा बहू को बता देना।”
सावित्री देवी ने मालती को फोन करके बता दिया ।
मालती ने अपने बेटे चिंटू से सावित्री देवी से फोन पर हुई सारी बात बताई।
चिंटू–“जवाब नहीं मॅाम आपके हुनर का । अब इतने में बाईक तो आ ही जाएगी।”

*4.” भरोसा “*

” माँ कब चलोगी घर ? ऊँऊँss ” बार-बार मुनिया लक्ष्मी ( कामवाली ) से कह रही थी ।
” बस हो गया थोड़ी सी सब्जी काट लूं । तुम टी. वी. देख लो
न तब तक । “.लक्ष्मी बोली
सविता ( मालकिन ) ” लक्ष्मी तेरी बेटी रोज घर जाने के लिए रोती रहती है । घर पर तुम्हारे कोई नहीं रहता ? यदि रहता है तो क्यों नहीं छोड़ देती हो । इस तरह परेशान तो नहीं होगी । ”
” घर पर कई लोग हैं बीबी जी , लेकिन मुझे भरोसा नहीं है । मैं अपने जैसी स्थिति में बेटी को नहीं डालना चाहती हूँ बीबी जी। “………. एक सांस में लक्ष्मी कहती जा रही थी :- ” मेरी सास है जो गठिया के मारे चलना-फिरना मुश्किल है ।
दो ननदें हैं जो मेरी तरह काम पर निकल जाती है । आदमी बैंक में चपरासी है वो नौ बजे से दिनभर उधर ही रहता है ।तीन चाचा हैं इसके जो कोई छोटी-मोटी मजूरी करता कभी नहीं करता । किसके पास छोड़ूं इस नासमझ को ? “…. चाचा हुंह ( बुरा सा मुँह बनाती हुई ) मुझे भरोसा नहीं इन मर्दों पर , रिश्ते को ताख पर रख देते हैं ये लोग और इसे तो अभी कोई समझ भी नहीं है । “…… एक गहरी सांस लेते हुए सोचने लगी — ” कैसे कहूं बीबी जी को कि आज भी पीहर जाती हूं तो अपने काका को देखकर खून खौलता है। जी करता है गोली मार दूं । इतनी ही छोटी तो थी तब मैं नासमझ । ”
लक्ष्मी की आंखों के पोरों पर आए आंसू अंगार की तरह धधक रहे थे।

*5.रेगिस्तान*

” सबके गहने और साड़ियाँ फीकी पर जाती है किटी में रोमा के सामने”—रितु ने कहा । सभी ने एक साथ हामी भरी ।
आखिर होता भी क्यों नहीं उसके गहने और साड़ियां होती भी लाजवाब थी ।
रितु — “रोमा तुम्हारे पति देव तुमसे सचमुच बहुत प्यार करते हैं जो इतनी महंगी-महंगी साड़ियाँ और गहने दिलाते रहते हैं । कुछ तो हमें भी सिखा दो जिससे हमारे पति भी हमें ऐसे ही प्यार करे ।”…….
” छोड़ो भी मेरा मजाक मत बनाओ “—कहते हुए रोमा खिलखिलाकर हँस दी|
सभी तम्बोला में व्यस्त हो गए और रोमा अपने अतीत में खो गई । पहली रात ही रवि ने कह दिया था –“देखो मैं किसी और के साथ प्रेम करता हूँ । तुम्हें प्यार के सिवा सबकुछ दुंगा , तुम्हें मंजूर है तो ठीक नहीं तो तुम स्वतंत्र हो अपना निर्णय लेने के लिए।”…… रोमा सुन्न हो गई थी । मगर कहती कैसे अपने गरीब माता पिता को । बड़ी मुश्किल से इतना अच्छा रिश्ता मिला था उनकी बेटी के लिए । ऐसी बातें सुनकर वे सदमा कैसे झेलेंगे ? यही सोचकर रोमा चुप्पी साध ली और 11 साल से गृहस्थी की उस रेगिस्तान में बस अकेले चलती आ रही है । पर रवि भी वचन का पक्का निकला । प्रेम के सिवा सबकुछ दिया यहाँ तक कि हमें माँ बनने का सुख भी । तभी रवि का फोन आया — “रोमा आज मैं रात को घर नहीं आ पाऊंगा । शालिनी के घर रुकूंगा , बच्चों को अपने तरीके से समझा देना ।”…….रोमा ने एक सीधा सपाट जवाब –“जी” और सभी सहेलियों की फीकी साड़ियों से आती गहरी प्रेम की आभा को अपलक निहारने लगी|

*6.”कथा का प्रभाव”*

” अरे ओ भाग्यवान, अभी छोड़ो ये लिखना । आराम से टी. वी. देखो। इसे लिखने से क्या मिलता है ? इसमें केवल काल्पनिक बातें होती हैं । टी. वी. देखो ज्ञान की बातें, कई खबरें या फिर मनोरंजन चैनल ही देखा करो । तुम्हारे लिखने से कुछ भी परिवर्तन नहीं होगा ।”— मिस्टर डी कहते जा रहे थे |
मिसेज डी ( मुस्कुरा कर ) —“अजी मैं टी वी भी देखती हूँ । रचना के माध्यम से विशेष बातों पर प्रकाश डालना हमारा धर्म है । साथ ही साथ मुझे इससे आत्मिक सुख भी मिलता है ।”
तभी मिसेज डी के मोबाइल पर काल आ रहा था ।
मिसेज डी — “हैलो !”
” हैलो ! नमस्कार , मैं सुधा बोल रही हूँ । आपको धन्यवाद करना चाह रही थी । इसलिए आपकी सहेली से आपका मोबाइल नंबर ली हूँ |”….
” किस बात के लिए धन्यवाद ? “—-मिसेज डी ने पूछा ।
सुधा —-“कुछ दिन पहले आपकी लघु कथा अखबार में छपी थी । ‘रेगिस्तान ‘ मेरे जीवन से मिलती जुलती है । वो कथा मेरे पति ने भी पढ़ा था । उसके बाद से उनके व्यवहार में परिवर्तन हो गया है । वो अब छुट्टि के दिन भी हमारे साथ ही बिताते हैं । आप इसी तरह अच्छी-अच्छी कथाएं लिखती रहें । मेरी शुभकामनाएं हैं ।”
मिसेज डी —“धन्यवाद जी”
मिस्टर डी ( पत्नी से ) —-“भई, किसका फोन था ? ”
” सुधा नाम की महिला की थी । मेरी लघु कथा ‘ रेगिस्तान’ उसके जीवन से मिलती है । सुधा के पति ने जब से अखबार में छपी मेरी वो लघुकथा पढ़ा है तब से अपनी पत्नी की तरफ झुकाव हो गया है। इसी से खुश होकर मुझे धन्यवाद दे रही थी । — अच्छा जी तो बताईये कि क्या लघुकथा लिखना सार्थकता नहीं है ? इससे कोई परिवर्तन नहीं होने वाला है ? क्या कहेंगे ? “—एक पैनी नजर से मिस्टर डी को देखते हुए मिसेज डी ने कई सवाल छोड़ दिया ।

*7.”अहसास”*

दो साल बाद घर आये थे रवि कांत पत्नी शीला भी साथ थी । घर के लोग अनमने से उससे मिल रहे थे । मिल क्या रहे थे अनदेखा करने की कोशिश कर रहे थे । शीला अपने कमरे में गई । सभी सामानों के ऊपर धूल-मिट्टी भरा हुआ था, जिससे उसका रंग भी समझ में नहीं आ रहा था । पूरा कमरा जाले, धूल-मिट्टी से भरा हुआ और बिस्तर पर ही झाड़ू, कुर्सी-टेबल,तगारी आदि रखा हुआ था, मानो सोने का कमरा न हो कबारखाना हो । शीला मन ही मन–“पच्चीस वर्ष हो गए । शादी करके इस घर में आये हुए । जब से आयी, कभी किसी को पराया नहीं समझी । लेकिन यहाँ के लोगों में मेरे लिए कभी अपनापन नहीं देखी । दूर रहने की वजह से ससुराल आना तो साल में एक बार ही होता रहा, पर मैं अपने कमरे या सामानों को सबको उपयोग करने के लिए छोड़ती रही । कभी किसी को रोका नहीं क्योंकि सब मेरे लिए अपने थे । सबने उपयोग तो किया किन्तु पराये की तरह । खैर ….. ।”–एक लम्बी सांस ली ।
रवि कांत आंगन में एक कुर्सी पर बैठ गए । तभी रवि कांत के बचपन के मित्र ( देवेन्द्र ) आंगन में प्रवेश किया । बीस साल बाद मिले थे दोनों दोस्त, क्योंकि दोनों नौकरी बहुत दूर-दूर करते थे । एक घर आते तो दूसरे नहीं । इस बार संयोग से मुलाक़ात हो गयी । दोनों गले मिले एक दूसरे की कुशलक्षेम पूछी । बैठकर बातें करने लगे ।
देवेन्द्र–“कहो कहीं मकान वगैरह लिया या नहीं ?”
रवि कांत–“नहीं लिया है । पैसे कहाँ बचते हैं ।”
तभी घर के एक कमरे से आवाज आयी ।–“भविष्य के लिए बचाते तब बचते न ।”
ये आवाज रवि कांत की भाभी की थी ।
रवि कांत स्तब्ध हो गया और अतीत में खो गया–“नौकरी लगने के बाद से ही हमेशा जो भी पैसे बचते अपने बड़े भईया को भेज देते थे । बचते क्या थे, खुद और अपने परिवार कष्ट में रह कर भी उन्हें भेज देते थे, क्योंकि भैया की चिट्ठी जो आ जाती थी कि कभी छत बनवाना है, तो कभी दीवार टूट रही है, तो कभी किसी की शादी है तो, किसी का मुण्डन । हमारे लिए तो सब अपने थे । हमने तो हमेशा सबकी मदद की है, बिना किसी से कोई अपेक्षा किये । शीला मुझे आगाह करती रही कि पैसे भेजो मगर अपने भविष्य के लिए भी कुछ बचाया करो । तुम अपने भविष्य के लिए नहीं बचाकर बहुत बड़ी गलती कर रहे हो । पर मैं था कि ……। किन्तु ये उम्मीद नहीं थी कि मेरे अपनेपन के बदले मुझे ही नीचा दिखाने की कोशिश की जाएगी । मुझे मालूम है सभी भाईयों ने कहीं मकान, फ्लैट, प्लाॅट ले लिया है मगर सब मुझसे छिपाते हैं ।”
दोस्त ने हिलाकर कहा–“अच्छा अभी मैं चलता हूँ । फिर शाम को मिलते हैं ।”
रवि कांत ने जबरदस्ती हंसने की कोशिश की । फिर उठकर अपने कमरे में गए जहाँ शीला कमरे की सफाई में व्यस्त थी ।
रवि कांत–“शीला तुम बिल्कुल सही थी । तुम्हारा ये कहना कि तुम अपने भविष्य के लिए जो कुछ नहीं बचा रहे हो, तो देख लेना जब सबके काम निकल जाएंगें तब यही लोग तुम्हें ‘मूर्ख’ कहेंगे ।”
शीला ने एक नजर सामानों को देखा और हांफते हुए बुदबुदायी– “चलो, अब कमरे से धूल हटते ही सामानों का रंग साफ-साफ दिखाई देने लगा।”

–पूनम झा
कोटा ( राजस्थान )

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