माथे पे बूंदें श्रम कण की

माथे पे बूंदें श्रम कण की,हाथो में ताकत जीवन की

लहराते अपने खेत का सपना,बोझ तले बढ़ते ऋण की ।

खुद का खेत नहीं ले पाया ,अधिया पर काम करुं।

कड़ी मेहनत होती दिन भर, थोड़ा ही आराम करुं।

मैं मजदूर वर्ग का ,हरदम कमी बनी रहती धन की,

लहराते अपने खेत का सपना,बोझ तले बढ़ते ऋण की।

सिर पर टूटी फूटी छत है,नीचे छांव गरीबी की।

हल और बैल जमा पूंजी है,खाते रूखी सूखी ही।

कमियों में भी आस न छोड़े,परवाह नहीं उलझन की।

लहराते अपने खेत का सपना ,बोझ तले बढ़ते ऋण की।

अपना भाग्य स्वयं लिखते,मेहनत से न घबराते

स्वेद गिरा माटी के उर में,धरती को स्वर्ग बनाते ।

अंकुर लगते मोती जैसे बाली लगती कंचन सी।

लहराते अपने खेत का सपना, बोझ तले बढ़ते ऋण की।

चाहे तपती दोपहरिया हो ,चाहे गिरता पाला हो

आंधी या तूफान घिरा हो,या पानी आने वाला है

हर मौसम में खेत संवारें ,करे सुरक्षा बच्चों सी।

लहराते अपने खेत का सपना ,बोझ तले बढ़ते ऋण की।

-अमृता शुक्ला

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