मजदूर दिवस पर अतुकांत रचना
ये हाथ हैं
जो सुबह से पहले जागते हैं।
धूप से पहले पसीना जानते हैं,
और छाले गिनते गिनते
रोटी का हिसाब लगाते हैं।
इन हाथों ने
ऊँची इमारतों की नींव रखी,
पर अपना घर
बारिश में टपकता छोड़ दिया।
सड़कों पर तारकोल बिछाया,
पर खुद के पाँव में
चप्पल तक न बचा सके।
ये हाथ
मशीनों से तेज चलते हैं,
ईंटों से बातें करते हैं,
सीमेंट में सपने गूँथते हैं।
थकते नहीं, रुकते नहीं,
क्योंकि इनके पीछे
कई भूखी आँखें इंतज़ार करती हैं।
1 मई का कैलेंडर
इनके लिए छुट्टी नहीं लाता।
लाता है बस एक सवाल:
क्या मेहनत की कीमत
सिर्फ दिहाड़ी है?
सलाम है उन हाथों को
जो दुनिया बनाते हैं
और बदले में
दुनिया से थोड़ी इज़्ज़त
थोड़ा सुकून
माँगते हैं।
इन हाथों को मत भूलना,
क्योंकि ये रुक गए
तो शहर रुक जाएगा।
-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
