बिखरे हुए रंग धरती पर
आधे और अधूरे कल के
अहंकार ऊँची चोटी पर
बना रहा है
अपने अड्डे
सोचे बिना खोद दी सड़कें
दीख रहे हैं
अनगिन खड्डे
उंगली उठा रही हैं गलियाँ
देखो बाहर जरा निकलके ।
चौपालों में असमंजस -सा
कोई संशय
दीख रहा है
युग का युवा नमस्कारों की
बदली भाषा
सीख रहा है
पग-पग पर पिछली पीढ़ी को
देने पड़ते निजी मुचलके ।
यहाँ मजूरी के लाले हैं
तरस रहा है
चूल्हा-चौका
वही झपटता है पाने को
जिसको मिला
जहाँ पर मौका
सीटी आकर कौन बजाये
इस मौसम में आगे चलके ।
-जगदीश पंकज
