बिखरे हुए रंग धरती पर

बिखरे हुए रंग धरती पर
आधे और अधूरे कल के

अहंकार ऊँची चोटी पर
बना रहा है
अपने अड्डे
सोचे बिना खोद दी सड़कें
दीख रहे हैं
अनगिन खड्डे
उंगली उठा रही हैं गलियाँ
देखो बाहर जरा निकलके ।

चौपालों में असमंजस -सा
कोई संशय
दीख रहा है
युग का युवा नमस्कारों की
बदली भाषा
सीख रहा है
पग-पग पर पिछली पीढ़ी को
देने पड़ते निजी मुचलके ।

यहाँ मजूरी के लाले हैं
तरस रहा है
चूल्हा-चौका
वही झपटता है पाने को
जिसको मिला
जहाँ पर मौका
सीटी आकर कौन बजाये
इस मौसम में आगे चलके ।

-जगदीश पंकज

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee