आत्ममुग्ध युग की कबीर व्याख्या
कबीरदास ने बड़ी सादगी से कहा था —
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।”
पर आज के ‘सेल्फी युग’ में यह दोहा पूरी तरह ‘अपडेट’ हो चुका है —
अब इसकी नयी रीमिक्स पंक्तियाँ कुछ यूँ हैं —“बुरा जो देखन मैं चला, सब ही तो बुरे है होय।
जो दिल खोजा आपना, मैं तो बुरा न होय।।
क्योंकि अब आत्मचिंतन पुरानी बात है, आत्मप्रशंसा ही आधुनिक साधना है।
हम हर गलती के लिए समाज, परिस्थितियों,ग्रह-नक्षत्रों और कभी-कभी ईश्वर तक को ज़िम्मेदार ठहरा देते हैं,
पर अपने भीतर झाँकने का साहस किसी के पास नहीं।
आज “मैं ही सही हूँ” कहना
एक राष्ट्रीय धर्म बन चुका है।
स्वयं का बुरा देखने की प्रवृत्ति अब
“लो सेल्फ-एस्टीम” कहलाती है,और दूसरों का दोष निकालना हाई सेल्फ-अवेयरनेस” मानी जाती है।
कबीर ने कहा था — बुरा अपने भीतर खोजो,
पर हमने अर्थ बना लिया —
“खोजो जरूर, मगर दूसरों में!”
आज के इंसान की आत्मा इतनी चमकदार हो गई है कि उस पर कोई धूल टिकती ही नहीं। कबीर कहते थे, “दिल खोजो अपना।”
पर आज का मनुष्य कहता है,
“दिल खोजने जाऊँ अपना..!!!
पहले दूसरों की नीयत तो जाँच लूँ।”
अब तो लोग अपने दोष भी ऐसे पेश करते हैं जैसे किसी नेशनल अवार्ड की ट्रॉफी —
वह दूसरों के दोष देखने में इतना व्यस्त है
कि खुद के दोषों को आउटसोर्स कर देता है।
और जो हर किसी में बुराई खोज ले,
वह समाज में “विवेकी” कहलाता है।
जो खुद में झाँक ले,
वह “इमोशनल फूल” समझा जाता है।
आख़िर आत्ममुग्धता भी तो एक कला है,
जिसमें हम रोज़ दर्पण के सामने खड़े होकर
कहते हैं — “देखो! यही है सच्चाई,
बाकी सब तो बस नेगेटिव और ईर्ष्यालु लोग हैं!
-डॉ संगीता बिंदल
पूना (महाराष्ट्र)
