साफ खतरे की सुनाई ,
दे रही आहट।
एक भी श्रोता नहीं है ,
बोलने वक्ता खड़ा है।
सुन रहे जो इन्हें उनके ,
कान में ताला जड़ा है।
लिख रखा उसको सुनाने ,
की लगी है रट।
पाँव में पहिया लगाकर ,
मंच पर बैठा बिजूका।
प्रेत जैसा डोलता है,
पहन कर आया सलूका।
आदमी लगता न पूरा,
लग रहा है नट।
अर्थ को जाने बिना ही ,
शब्द का रथ हाँकता है।
बिना समझे हर किसी को ,
एक जैसा आँकता है।
फिल्म से करने पड़ेंगे,
दृश्य ऐसे कट।
तालियों की चाह में यह ,
मुग्धता ओढ़े हुए है।
सामने नेता सरीखा ,
हाथ दो जोड़े हुए है।
देखिए गुणगान इसका ,
कर रहे उद्भट।
-मनोज जैन
