लिख चुकी हूँ देश में,
गाँवों के गाँव।
गाँव में लिख चुकी हूँ,
शहर जाने की विडंबना।
शहर में लिखती रही,
गाँव से दूर जाने का दुख।
दुख में लिखती रही,
सुख से वंचित होने की दास्तां।
लिखती रही सुख में,
आने वाले दुख की संभावना।
आने वाले कल में,
डुबोती रही अतीत की स्मृतियों को।
स्मृतियों में लिखती रही,
पश्चाताप, आँसू, विरह।
विरह में लिखती रही प्रेम,
प्रेम में लिखती रही आँसुओं को।
आँसुओं में लिखती रही,
भरे हुए सागर-जलाशयों को।
जल में लिखती रही,
स्वच्छ प्रतिबिंब, दर्पण।
दर्पण की दूसरी ओर,
लिखती रही अदृश्य मनुष्य।
और मनुष्य में खोजती रही इंसानियत।
-ललितप्रसाद जोशी
छत्रपति संभाजीनगर (महाराष्ट्र)
